मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमष्टि-व्यष्टि दोनोका ही समन्वय करके सर्वत्र सुख, धर्म शान्ति एव स्वतन्त्रताका साम्राज्य स्थापित करते हैं । उनके यहाँ प्रथम तो बेकारी एव शोषण फैलानेवाले महायन्त्रका ही बहिष्कार होता है, अतः सभीको स्थायीरूपसे योग्यता एव आवश्यकताके अनुसार काम, दाम, आरामकी व्यवस्था होती है । सबको विकासका पूर्ण स्वातन्त्र्य रहता है । सुख-शान्ति, लोक-परलोक, परम निःश्रेयसका मार्ग सभीके लिये प्रशस्त रहता है । दैव-दुर्विपाकसे महायन्त्रोंके विकास हो जानेपर भी पूर्वोक्त प्रकारसे शोषण हटाकर आर्थिक सन्तुलन स्थापित किया जाता है, जिससे आर्थिक संकट एव गतिरोधका कोई प्रसङ्ग ही नही आता । शोषकोके अन्यायोपार्जित द्रव्य तथा कर्तव्य-विमुख लोगोंके न्यायोपार्जित या दायप्राप्त द्रव्य राष्ट्रके हितार्थ छीन ही लिये जाते हैं, परंतु कर्तव्यपरायण लोगोंके न्यायोपार्जित द्रव्यके भी अतिरिक्त आयका स्वल्पांश ही स्वामीके काममे उपयुक्त होता है । पाँच हिस्सेमे चार हिस्सा राष्ट्रके ही काममे लगानेका नियम होता है। उसमे दान, पुण्य, यज्ञ, परोपकारका पूर्ण स्थान रहनेसे कथमपि आर्थिक असंतुलन हो ही नहीं पाता । किसीकी बेकारी या क्रय-शक्तिका ह्रास तथा मालके खपत न होने आदिका प्रसङ्ग ही नहीं उपस्थित होता । 'पञ्चधा विभजन् वित्तम्' के अनुसार पाँच हिस्सेमे चार हिस्सेका राष्ट्र-हितार्थ जो उपयोग कहा गया है, उसका यह तात्पर्य नहीं है कि चार भाग ही राष्ट्र-हितार्थ उपयुक्त हो, किंतु उसका तात्पर्य यह है कि सामान्य-जीवन-यात्रोपयोगी अंशसे अधिक सम्पूर्ण धन राष्ट्र-हितार्थ प्रयुक्त किया जाय । तभी तो कहा गया है कि जितनेमे पेट भरे उतना ही ग्रहण करना ठीक है, अधिकमे अभिमान करनेवाला चोरके तुल्य दण्डभागी है— यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् । अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥ ( श्रीमद्भा० ७ । १४ । ८ ) धनवान् होकर दान न करना पाप है और दरिद्र होकर सदाचारी तपस्वी न होना भी पाप है । ये दोनो ही दण्डके योग्य हैं— द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ( विदुरनीति ) अतएव उत्तरोत्तर यन्त्रोंके विकाससे जैसे-जैसे अल्प श्रम एव अल्प व्ययमे उत्पादन बढ़ता जायगा, जैसे-जैसे लाभ बढ़ता जायगा, वैसे-वैसे बेकारी एव आर्थिक असंतुलन दूर करनेके लिये कामके घंटोकी कमी, वेतनकी अधिकता एव मजदूरोकी संख्या भी बढती चली जायगी । साथ ही अतिरिक्त आय ( यहाँ मार्क्सवादियोके अर्थमे अतिरिक्त आयका प्रयोग नही है, किंतु टैक्स एव निर्वाहोपयोगी खर्च्च आदिसे बचा हुआ लाभ ही अतिरिक्त आय है ) से चार हिस्सा ही नहीं, किंतु उससे अधिक भी राष्ट्र-हितार्थ प्रयुक्त किया जा सकेगा ।