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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

समष्टि-व्यष्टि दोनोका ही समन्वय करके सर्वत्र सुख, धर्म शान्ति एव स्वतन्त्रताका साम्राज्य स्थापित करते हैं । उनके यहाँ प्रथम तो बेकारी एव शोषण फैलानेवाले महायन्त्रका ही बहिष्कार होता है, अतः सभीको स्थायीरूपसे योग्यता एव आवश्यकताके अनुसार काम, दाम, आरामकी व्यवस्था होती है । सबको विकासका पूर्ण स्वातन्त्र्य रहता है । सुख-शान्ति, लोक-परलोक, परम निःश्रेयसका मार्ग सभीके लिये प्रशस्त रहता है । दैव-दुर्विपाकसे महायन्त्रोंके विकास हो जानेपर भी पूर्वोक्त प्रकारसे शोषण हटाकर आर्थिक सन्तुलन स्थापित किया जाता है, जिससे आर्थिक संकट एव गतिरोधका कोई प्रसङ्ग ही नही आता । शोषकोके अन्यायोपार्जित द्रव्य तथा कर्तव्य-विमुख लोगोंके न्यायोपार्जित या दायप्राप्त द्रव्य राष्ट्रके हितार्थ छीन ही लिये जाते हैं, परंतु कर्तव्यपरायण लोगोंके न्यायोपार्जित द्रव्यके भी अतिरिक्त आयका स्वल्पांश ही स्वामीके काममे उपयुक्त होता है । पाँच हिस्सेमे चार हिस्सा राष्ट्रके ही काममे लगानेका नियम होता है। उसमे दान, पुण्य, यज्ञ, परोपकारका पूर्ण स्थान रहनेसे कथमपि आर्थिक असंतुलन हो ही नहीं पाता । किसीकी बेकारी या क्रय-शक्तिका ह्रास तथा मालके खपत न होने आदिका प्रसङ्ग ही नहीं उपस्थित होता । 'पञ्चधा विभजन् वित्तम्' के अनुसार पाँच हिस्सेमे चार हिस्सेका राष्ट्र-हितार्थ जो उपयोग कहा गया है, उसका यह तात्पर्य नहीं है कि चार भाग ही राष्ट्र-हितार्थ उपयुक्त हो, किंतु उसका तात्पर्य यह है कि सामान्य-जीवन-यात्रोपयोगी अंशसे अधिक सम्पूर्ण धन राष्ट्र-हितार्थ प्रयुक्त किया जाय । तभी तो कहा गया है कि जितनेमे पेट भरे उतना ही ग्रहण करना ठीक है, अधिकमे अभिमान करनेवाला चोरके तुल्य दण्डभागी है— यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् । अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥ ( श्रीमद्भा० ७ । १४ । ८ ) धनवान् होकर दान न करना पाप है और दरिद्र होकर सदाचारी तपस्वी न होना भी पाप है । ये दोनो ही दण्डके योग्य हैं— द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ( विदुरनीति ) अतएव उत्तरोत्तर यन्त्रोंके विकाससे जैसे-जैसे अल्प श्रम एव अल्प व्ययमे उत्पादन बढ़ता जायगा, जैसे-जैसे लाभ बढ़ता जायगा, वैसे-वैसे बेकारी एव आर्थिक असंतुलन दूर करनेके लिये कामके घंटोकी कमी, वेतनकी अधिकता एव मजदूरोकी संख्या भी बढती चली जायगी । साथ ही अतिरिक्त आय ( यहाँ मार्क्सवादियोके अर्थमे अतिरिक्त आयका प्रयोग नही है, किंतु टैक्स एव निर्वाहोपयोगी खर्च्च आदिसे बचा हुआ लाभ ही अतिरिक्त आय है ) से चार हिस्सा ही नहीं, किंतु उससे अधिक भी राष्ट्र-हितार्थ प्रयुक्त किया जा सकेगा ।

३९४ मार्क्सवाद और रामराज्य समाजवादी सब्जबाग व्यक्तिगत स्वतन्त्रता यदि अच्छी वस्तु है, उससे इतना बड़ा लाभ हुआ, तो कुछ दोष होनेसे ही वह हेय नहीं होती। बिजलीसे प्रकाश फैलाया जा सकता है, मशीन भी चलायी जा सकती है और आत्महत्या भी की जा सकती है। अतः बुद्धिमानोंका कर्तव्य है कि वे ऐसा मार्ग निकाले जिससे व्यक्तिगत स्वतन्त्रताकी रक्षा हो और गतिरोध भी मिटे। वैसे भी समाजवादी शासनमें ही नहीं, किंतु सभी ढंगके शासनोंमे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता एक सीमाके भीतर है। भाई-बहन और पिता पुत्रीका परस्पर शादी करने तथा आत्महत्या करनेमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रता मान्य नहीं है। इस प्रकार समाजका अहितकर काम करनेकी स्वतन्त्रता किसीकी भी मान्य नहीं। समष्टिके नामपर व्यक्तिको पंगु बना देना भी ठीक नहीं, साथ ही व्यक्तिगत स्वाधीनताके नामपर समष्टि-विरोधी कार्यवाही करनेकी छूट व्यक्तिको देना भी ठीक नहीं। इसी आधारपर व्यक्तिगत वैध-बपौती मिल्कियत या वैध- धनोंका अपहरण बिना किये भी समष्टि-हितके अनुकूल कानून बनाये जाते हैं। आज भी सभी शासनों एवं राष्ट्रोंमें संग्राम आदि संकटकालमे बहुत कुछ व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओंमे संकोच मान्य होता है। अमरीका आदिने भी अपने ढंगसे उक्त गतिरोध रोका ही है। रामराज्यशासनमे समष्टि-हितकी दृष्टिसे इस प्रकारकी व्यवस्था होती है कि किसीके दरिद्र होने या अपने परिश्रमका पूरा फल न पानेका प्रश्न ही नहीं उठता। मार्क्सवादियोंका कहना है कि 'पूंजीपतियोंके हाथसे भूमि-सम्पत्ति, कल-कारखानोंको छीन लेनेसे मजदूर ही पैदावारके साधनोंके मालिक हो जायेंगे। फिर जो भी पैदा करेंगे, वह सब उन्हींके काम आयेगा। इससे उनके भूखे नंगे रहनेका डर ही न रहेगा और पूँजीपतियोंका इकट्ठा किया हुआ धन-वैभव भी इन्हींके काममें आयेगा, फिर खरीदनेकी शक्ति बढ़ जायगी और काम करनेवाले अधिक-से-अधिक पदार्थ पैदा करेंगे तथा दूसरे पदार्थोंसे विनिमय करेंगे। पूँजीपतियोंके पास मजदूरोंकी मेहनतका बहुत बड़ा भाग न जा सकेगा और मजदूरोंकी अवस्था उन्नत होगी, जैसे रूसी किसानोंकी उन्नति पहलेसे तेरह गुनी अधिक हो गयी है। इस तरह मजदूर, इंजीनियर, डाक्टर आदिका भी अन्तर मिट जायगा। कठोर एवं अप्रिय कार्योंके लिये मशीने बन जायेंगी, जिससे किसीको कोई भी काम कठोर और अप्रिय नहीं प्रतीत होगा। सब कामकी शिक्षा देकर सभीको सब कामके योग्य बना दिया जायगा। किसीको किसी कामके लिये बाध्य नहीं किया जायगा। यदि मशीनोंकी उन्नतिसे हजार मजदूरोंका काम दस ही मजदूरोंसे हो सकेगा तो भी मजदूर बेकार नहीं होंगे, क्योंकि उनसे अन्य काम कराया जायगा। मजदूरोंके लिये अच्छे फर्नीचर, अच्छे मकान बनाये जायेंगे। आजकी तरह मजदूर दस घंटे काम न करके बारी- बारीसे एक या दो घंटे काम करेंगे, बाकी समयमे मौज लेंगे।'

इस तरह काल्पनिक सुख-स्वप्नका वर्णन करके समाजवादी धरातलमें स्वर्गधाम उतार देनेकी बात करते हैं, परंतु वस्तुस्थिति यह है कि जगत्की विचित्रताके साथ ही मनुष्योंमें भी विचित्रता होती है। सभी सब कामकी न सर्वाङ्गीण शिक्षा ही प्राप्त कर सकते हैं, न सब कामके विशेषज्ञ ही हो सकते हैं और न सब प्रमाद-आलस्यशून्य होकर शक्ति-चोर्य बिना ईमानदारीसे शक्तिभर परिश्रम ही कर सकते हैं । यह भी नहीं हो सकता कि सब अनिवार्य आवश्यकताभर ही पदार्थ ले, अधिकका संग्रह न करें । सभी व्यक्ति स्वतन्त्र व्यस्क, हम्बर, रोल्स मोटरकी इच्छा कर सकते हैं, सभी प्राइवेट हवाईजहाज चाह सकते हैं । सभी फर्स्टक्लासके मकान, फर्नीचर चाहेंगे, सभी वकील, जज या प्रधानमन्त्री होना चाहेंगे, फिर साधारण कार्यों एव वस्तुओंसे कोई क्यों सन्तुष्ट होगा ? अगर यह दशा सम्भव है तो किसी भी सिद्धान्तवादीको इसमें क्या आपत्ति होगी । आमतौरपर कोई भी ईमानदार मानवताके नाते अपने वैध सम्पत्तिसे सन्तुष्ट रहता है । अत्यन्त ग्राम्य लोगोंका भी यही विश्वास है कि अपनी वैध कमाईमे सूखी रोटीमें सन्तुष्ट रहना अच्छा है । दूसरोंकी वस्तुका अपहरण

३९६ मार्क्सवाद और रामराज्य आश्रय लेना ही पड़ेगा । सब लोग जितना कमाये उतना खा-उड़ा जायँ तो उपर्युक्त काम कैसे चलेगा ? एक व्यक्तिकी स्वतन्त्रताकी सीमा वहींतक है, जहाँतक कि दूसरोकी स्वतन्त्रतामे बाधा न पड़े । यह सभी सभ्य शासन मानते हैं, यह मार्क्सकी कोई नयी बात नहीं है । परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि परस्परका सेव्य- सेवकभाव या उपकार्य-उपकारकभाव समाप्त हो जाय । सभी सैनिक यदि निजी स्वतन्त्रताकी बराबरीका दावा करे तो सेनापतिकी आज्ञा ठुकरा सकते हैं, फिर तो सैनिक-संगठनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाय । समाजवादी किसी अन्यके चक्रवर्तित्वकी तो समालोचना करते हैं, परंतु मजदूर तानाशाही सम्पूर्ण विश्वपर कायम करनेके लिये आकाश-पातालका कुलाबा भिड़ा रहे हैं । आखिर सोवियतसंघके सभी राष्ट्र मास्कोके कुछ तानाशाहोंके इच्छानुसार ही चल रहे हैं, विश्व कम्युनिष्ट- संघ आखिर सम्पूर्ण संसारमे कम्युनिष्ट शासन-स्थापनका प्रयत्न करता ही है। फिर राम-जैसे जितेन्द्रिय, सदाचारी, धर्म-नियन्त्रित, चक्रवर्तीके निष्पक्ष शासनमे सम्पूर्ण विश्वमे शान्ति हो, छीना-झपटी बंद हो, सब सुखी हो तो क्या आश्चर्य है ? अपने विश्वासके अनुसार सब अपना धर्म पालन करें, अपनी शक्ति एवं बुद्धिके अनुसार अर्थोपार्जन करे, अपनी कमाई अपने इच्छानुसार अपनी संतानोंको दे सकें, दान-पुण्य कर सकें, लोक-परलोक बना सकें, कोई किसीके धर्म एवं सम्पत्तिपर हमला न करे, सभी उन्नत सभी सुखी हो—यही तो रामराज्य है । मार्क्सवादी कहते हैं कि 'दिखायी पड़नेवाली व्यक्तियोंमे सम्पत्ति एव योग्यताकी असमानता मौजूद है । अध्यात्मवादी इस असमानताका दूर होना असम्भव मानते हैं, परंतु मार्क्सवादी इस असमानताको दूर कर सकनेका दावा करते हैं । असमानता दूर होनेकी ही अवस्थाका नाम कम्युनिज्म या समष्टि- वाद है। इसमे यथासम्भव समानता दूर कर देनेके बाद संघटनका सिद्धान्त होगा, प्रत्येक मनुष्य अपनी सामर्थ्यभर परिश्रम करेंगे और प्रत्येक मनुष्यको अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थ मिलेगा । एतदर्थ योग्यता एवं शिक्षाकी असमानता दूर होनी आवश्यक है।' मार्क्सवादी जन्मान्तरीय कर्मोंकी विचित्रतासे असमानता नहीं मानते । वे परिस्थियोंको ही इसका मुख्य कारण मानते हैं । सबको शिक्षा, मस्तिष्क एवं स्वास्थ्यकी उन्नतिका समान अवसर देकर दिखायी देनेवाली असमानता दूर की जा सकती है । जन्मसे ही अल्पबुद्धि एव दुर्बल, गरीबोकी ही संतान होती है । अमीरोंकी संताने अधिक स्वस्थ एव बुद्धिमान् होती हैं। मार्क्सवादके अनुसार सबको समान अवसर मिलनेसे नयी पीढीके लोगोंमें असमानता बहुत कुछ कम हो जायगी । कुछ पीढींतक समान परिस्थियोंमे मनुष्यका जन्म होनेसे प्रायः सब एक-से ही बलवान्, बुद्धिमान् होगे । यदि पशुकी नस्लमे उन्नति की जा सकती है तो मनुष्यका सुधार क्यो नही होगा ? भले ही कुछ लूले-लँगड़े, अन्धे भी हों फिर भी नियम तो जन-साधारणकी दृष्टिसे ही बनते है ।'

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३९७ वस्तुतः यह तर्क बहुत ही निःसार है। 'अमीरोंके लड़के बुद्धिमान्, बलवान् होते हैं', यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रायः देखा जाता है कि अमीरोंके लड़के अधिक निर्बुद्धि एवं निर्बल होते हैं। व्यवहारमें धनवानोंको ही लक्ष्मीका वाहन अर्थात् उल्लू कहा जाता है। अधिकांश धनवान् विलासी होते हैं। निर्वीर्य होनेसे पहले तो उन्हें संतान ही कम होती है, जिससे इनमें दत्तकोंकी भरमार चलती है। संताने उत्पन्न भी होती हैं तो निर्बल एवं निर्बुद्धि। हम पहले कह चुके हैं कि व्यापारकी दक्षता, शोषणके हथकंडे, जाल-फरेबकी सब बातें, राजाओं, जमींदारोंके दीवान या कारिन्दे तथा सेठोंके मैनेजर-गुमास्ता लोग ही करते थे या करते हैं। आज भी ऐसे-ऐसे धनवान् हैं कि केवल धनके कारण ही उनका सम्मान किया जाता है। यदि उनको धन न होता तो कौड़ी-कीमतका भी उन्हें कोई न पूछता। हाँ, जहाँ सावधानीसे प्रयत्न किया जाता है, वहाँ धनवान्, बलवान्, बुद्धिमान् एवं धर्मनिष्ठ भी होते हैं। शास्त्रोंमें इसे पूर्वजन्मकी तपस्याओ एव योगाभ्यासका फल बताया है—'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।' (गीता ६।४१) योगभ्रष्ट अर्थात् योगकी पूर्ण सिद्धि-मुक्ति पानेके पहले मरनेवाले लोगोंका पवित्र श्रीमानोंके घरमें जन्म होता है। हरिश्चन्द्र, दिलीप, मान्धाता, अज, दशरथ, युधिष्ठिर, अर्जुन आदि इसके उदाहरण हैं। प्रायः लक्ष्मी-सरस्वतीका विरोध ही समझा जाता है। किसी ही पुण्यशालीके यहाँ लक्ष्मी-सरस्वतीका सहवास होता है, परंतु इससे भी उच्च पक्ष महातपस्या, महासौभाग्यसे अरण्यवासी विरक्तों, निष्किञ्चनों, उञ्छशिल- वृत्तिवालेके यहाँ जन्म होना माना गया है, क्योकि वहाँ बुद्धि-विवेककी बहुत ही प्रधानता रहती है— अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।••• तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्॥ (गीता ६।४२, ४३) भारतके जितने भी विशिष्ट विद्याएँ, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, शिल्प, साहित्य तथा नीति आदि सम्बन्धी ग्रन्थ हैं, सबके रचयिता अरण्यवासी कन्द-मूल-फलाशी वल्कलवसनधारी निष्किञ्चन लोग ही हुए हैं। वेदान्त, सांख्य, न्याय, मीमांसा, वैशेषिक, योग, भारत, रामायण, योगवाशिष्ठ तथा शुक्र, बृहस्पति, कणिक, कौटिल्य, कामन्दक आदि नीतिग्रन्थ हैं, सबके निर्माता अकिंचन लोग ही हैं, धनवान् या पूँजीपति नहीं। शंकराचार्य, उदयनाचार्य, भट्टपाद, श्रीहर्ष, वाचस्पति मिश्र, रामानुजाचार्य, तुलसीदास, सूरदास आदि कोई भी धनवान् आदमी नहीं थे। आजके भी विभिन्न देशोंके विभिन्न नेता उन्हीं वर्गोंमें हैं तथा यहाँतक कि मार्क्स भी अमीर नहीं था। सभी अकिंचन सरस्वतीके उपासक विद्वान् ही मान्य हैं। लक्ष्मीके उपासक सदा ही उनका अनुगमन करते थे। मान्धाता, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र आदि भी वसिष्ठ आदि ऋषियोंके ही नियन्त्रणमें रहते थे।

३९८ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव यहाँ उच्च शास्त्र-ज्ञानवाला निर्धन ब्राह्मण ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है। फिर यह भी तो देखते हैं कि एक ही अमीरके चार पुत्रोंको समान अवसर मिलनेपर भी कोई बहुत चतुर निकलता है, कोई भोदू निकलता है। जगत्की विचित्रताका आधार कर्मको मानना ही पड़ेगा। जहाँ इस जन्मके कर्म वैचित्र्यसे उपपत्ति न हो वहाँ जन्मान्तर-कर्मको वैचित्र्य मानना अनिवार्य है। उष्ट्र, गर्दभ, मनुष्यादिके वैचित्र्यका भी क्या कारण है ? इस प्रश्नका जन्मान्तरीय कर्मके सिवा अन्य कोई समाधान नहीं है। जो इन विचित्रताओंका कारण स्वभावको कहते हैं उनसे प्रश्न होगा, स्वभाव क्या है ?—सत् या असत् ? असत् कहे तो उसमे कार्य- क्षमता नहीं हो सकती, सत् है तो भी वह चेतन है या अचेतन ? अचेतनमे भी विवेकाभावात् विचित्र कार्यकरत्व नहीं हो सकता। चेतन कहे तो भी अल्पज्ञ या सर्वज्ञ ? अल्पज्ञमें भी विविध वैचित्र्योपेत विश्वका व्यवस्थापकत्व नहीं बन सकता। सर्वज्ञ कहे तो प्रश्न होगा कि वह सापेक्ष विचित्र सृष्टि करता है या निरपेक्ष ? निरपेक्ष कहे तो उसमे वैषम्य, नैर्घृण्य दोष आयेगा । सापेक्ष कहे तो वही कर्म-सापेक्षता माननी पडेगी। सदा ही अध्यापको, इजीनियरों, डाक्टरो, जजों, प्रधानमन्त्रियोंके स्थान थोडे ही रहेगे। मजदूरो, छात्रो, न्यायार्थियो तथा गरीवलोगोकी सख्या ही अधिक रहेगी। अतः चींटींको कनभर और हाथीको मनभरका सिद्धान्त बिना माने काम चलना सर्वथा ही असम्भव होगा। फिर भी समता या विषमता असंतुलित न रहनी आवश्यक है। अति विषमता, अति समता दोनो ही अव्यवहार्य हैं। जैसे अङ्गमे भी सब बराबर नही होते, हाथकी अगुलियाँ भी सब एक-सी नही होती हैं। फिर भी उनकी समता-विषमता संतुलित रहती है। यही स्थिति समाजकी भी उचित है। यदि कम्युनिष्ट काल्पनिक समताके आधारपर सिद्धान्त बनाना चाहते हैं तो अध्यात्मवादीके यहाँ आत्मा ही वास्तविक समानता स्वतन्त्रता भ्रातृत्ताकी आधारभित्ति है। इतना ही नहीं, अध्यात्मवादी ही ऐसी भी अवस्थाका आना अनिवार्य मानते हैं, जब सभी परमानन्द ब्रह्मस्वरूप ही होगे, विषमताकी गन्ध भी कही उपलब्ध नहीं होगी। परंतु व्यवस्था तो करनी है वर्तमान स्थितिकी, अतः हम कल्पनाओको छोड़कर उपस्थित अवस्थामे क्या हो सकता है, यही विचार करना उचित समझते हैं। वैधानिक साधनों एव धार्मिक, आध्यात्मिक साधनोसे समष्टि जगत्को उच्च-से-उच्च स्तरपर पहुँचाना रामराज्यका आदर्श है। 'रामभगति रत सब नर नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥' 'हृष्टः पुष्टः प्रमुदितः 'नाकुण्डली नास्रग्वी १' इत्यादि श्लोकोमे कहा गया है कि 'रामराज्यमें सभी हृष्ट-पुष्ट, प्रमुदित रहते थे। सभीके गृहोमें हीरकादिजटित स्वर्णमय कपाट लगे रहते थे।' फिर भी वास्तविकता यह है कि पदार्थोंकी उत्पत्तिकी कुछ सीमाएँ हैं। यदि सभी स्वतन्त्र हवाईजहाज, सभी हम्बर, रोल्स, व्यूक मोटर चाहे, सब-के-

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३९९ सब उच्चस्तरीय साधन चाहेंगे तो उसकी पूर्ति तो हजारो नहीं लाखो वर्षतक हो सकना सम्भव नही। गली-गलीमे बिजलीका फैल जाना या मिलोंके द्वारा कपडा जितना सरल है उतना भारतके पैंतीस करोड आदमियोंको एक-एक वायुयान, एक-एक ब्यूक मिलना सरल नही। इसी तरह केसर, कस्तूरी, हीरा आदिका मिलना भी सम्भव नही है। जब सभी लोग सब चीज बना नहीं सकते तो विनिमयद्वारा वस्त्वन्तर प्राप्त करनेकी आवश्यकता रहेगी ही। फिर वस्तुओकी विनिमय-सुविधाके लिये रुपया या मुद्राका व्यवहार आवश्यक होगा। स्थानान्तरसे वस्तु स्थानान्तरमे पहुँचाना आवश्यक होगा। इसपर कुछ व्यय एव श्रम भी होगा। व्यक्ति या सरकार जो भी यह कार्य करेगा कुछ-न-कुछ लाभ अवश्य चाहेगा। हाँ, यह ठीक है कि मुनाफा सीमित हो, अव्यवस्था फैलानेवाला न हो। आजके विस्तृत यातायात-सम्बन्धोंका यह भी एक महान् लाभ है कि संसारके किसी कोनेमे कोई वस्तु क्यो न उत्पन्न हो और कहीं भी किसी वस्तुकी कमी क्यो न हो, फिर भी देशान्तरकी वस्तु देशान्तरमे पहुँचनेमें कोई कठिनता नहीं। अतिवृष्टि, अनावृष्टिसे कही भी भुखमरी नही हो सकती। परंतु यदि क्रय-विक्रयका व्यवहार मिट जायगा तो यह सब सम्भव न होगा। अनेक रोजगारोंके समान ही क्रय-विक्रय भी एक धंधा है। लाभ बिना उसे कौन अपनायेगा? हाँ, लाभ सीमित हो, उसपर नियन्त्रण हो, यह तो आवश्यक ही है। भुखमरी मिटाना अमीर, गरीब सबके ही अभ्युदयका प्रयत्न करना अपेक्षित वस्तुओका उत्पादन बढ़ाना अत्यावश्यक है ही। समाजवादी कहते हैं कि 'रूसमें रोटीकी कमी नहीं है। सम्भव है कुछ ही दिनोमे वहाँ रोटी सबको मुफ्त मिलने लगे, जैसे होटलोमे पानी मुफ्त मिलता है। परंतु रामराज्यका तो आदर्श यह था कि किसी भी जगह पानी माँगनेपर दूध ही पिलाया जाता था। देनेवाले सदा ही देनेकी कोशिश करते थे, परंतु लेनेवाले अपनी गाढी कमाईका ही खाना पसंद करते थे। प्रतिग्रहसे हर तरहसे बचनेका प्रयत्न करते थे। रूसी तो फिर भी यह कहते रहेंगे कि जो काम न करे उसको खाना मिलना ही न चाहिये। फिर जहाँ लोगोकी व्यक्तिगत सम्पत्ति ही न रहेगी, वहाँ काम लेकर रोटी देनेका प्रसङ्ग ही क्या है? रामराज्यमें वृद्ध, बालक काम न कर सकनेवालोको भी भोजनादिकी सुविधा रहेगी। जिस व्यक्तिगत सम्पत्तिमे सबकी कमाई नही सम्मिलित है, उसके द्वारा लोगोको मुफ्त रोटी देनेकी विशेषता ही मुख्य विशेषता है। साम्यवादी व्यवस्थामें तो सबकी कमाई सम्मिलित ही रहती है। रामराज्यकी सभ्यता ही थी कि रोटी एव दूध आदिका कोई गृहस्थ विक्रय करना पाप समझता था। क्षीर-विक्रय, रस-विक्रय तो स्पष्ट निषिद्ध है। रामराज्यमें आवश्यक उपयोगी पदार्थ सबको सरलतासे सुलभ करना ध्येय ही है। समाज-

४०० मार्क्सवाद और रामराज्य वादी कहते हैं कि गैरसमाजवादी देश व्यापारमें होड़ करते हैं। दूसरे देशोंके बाजारोंपर कब्जा करना चाहते हैं, जिससे सबको युद्धके लिये तैयार रहना पडता है। पूँजीवादी शासन-प्रणाली रहते-रहते यदि कोई देश निःशस्त्र हो जाय तो खूँखार पूँजीवाद देश उसे झपट लेते हैं। युद्धकी तैयारीमे लगे रहनेसे पैदावारमे बाधा पडती ही है। प्रायः सभी देशोंकी आमदनीका बहुत बड़ा भाग शस्त्रास्त्र एव फौजोंपर खर्च हो जाता है। धनके इस भागका फल मिलता है भय, कष्ट एव अकालमृत्यु । यह सब धन मनुष्योंकी हालत सुधारनेमे लगानेसे बहुत लाभ हो सकता है। लाखो बलवान् जवान युद्धकी तैयारीमे फँसे रहते हैं, पैदावारका काम नही कर सकते । इनका सम्पूर्ण समय मरना, मारना, सिखने-सिखानेहीमे खर्च होता है। यदि मुनाफा कमानेकी भावना छोड़कर उपयोगके लिये ही माल तैयार किया जाय तो अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी होड समाप्त हो जायगी । फिर न दूसरे देशोकी बाजारोकी जरूरत रहेगी और न युद्ध आवश्यक होगा । आधुनिक पूँजीवादी या समाजवादी सभी शासन धर्महीन होनेका ही महत्त्व समझते हैं । इसीलिये व्यक्तिगत स्वार्थकी इतनी प्रधानता हो गयी है कि एक दूसरेकी हत्या उनकी दृष्टिमे साधारण-सी बात होती है । धर्म,नियन्त्रित रामराज्यमें युद्धकी अपेक्षा शान्तिका ही सर्वातिशायी महत्त्व होता है। साम, दान, भेद तीनो नीतियोसे ही सब काम चलाना श्रेष्ठ है, परंतु सर्वथा तीनो नीतिके विफल होने एव अनिवार्य होनेपर ही चतुर्थ दण्ड-नीतिका प्रयोग करना उचित बतलाया गया है। अहिंसा एव सत्यसे सम्पूर्ण व्यवहार चलाया जाय, विरोधियोंका भी भाव ही बदलनेका प्रयत्न उचित है, परंतु फिर भी तो आखिर समाजवादी रूसको भी तो द्वितीय महायुद्धमे कूदना पडा ही और लालसेनाके करोडो सैनिकोको भरती करना ही पडा। परमाणु बम, हाइड्रोजन बम आदि घातक अस्त्र-शस्त्रोपर अरबो रुपये खर्च करने पड रहे हैं । आखिर जो युद्ध अनुचित समझता है उसकी इस प्रकारकी चेष्टा क्यो-? जैसे समाजवादी कहते हैं कि 'जब विश्वभरमे कम्युनिष्ट राज्य कायम हो जायगा, तब कोई खतरा न रहेगा, तब युद्ध-तैयारी बंद की जा सकेगी। उसके पहले तैयारी न रखनेसे तो पूँजीवादी राष्ट्र रूसको हडप लेगे ।' किंतु यह तो कोई भी कह सकता है कि 'जब विश्वभरमें एक चक्रवर्ती सरकार बन जायगी, तब युद्ध आवश्यक न रहेगा' परंतु प्रश्न तो यह है कि जबतक दोनोके मनोरथ नहीं पूरे होते, तबतक क्या होना चाहिये ? वस्तुतः इस समय क्या पूँजीवादी, क्या समाजवादी अपना-अपना गुट बलवान् बनानेमें लगे हैं । इस समय उपनिवेशवाद समाप्त हो रहा है, परंतु अपने-अपने प्रभाव-क्षेत्रके विस्तारमें सब लगे हैं। अमेरिका अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ा रहा है, रूस अपना । इसके लिये ही शस्त्रास्त्रकी तैयारी एवं कूटनीतिक दाँव-पेच दोनों ओरसे चले जा रहे हैं, परंतु रामराज्यवादी

इस सम्बन्धमें व्यापक दृष्टिकोणसे विचार करते हैं । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदिके नियम विश्वव्यापी एवं विश्वके हितार्थ हैं । प्रत्येक व्यक्तिको समाज, राष्ट्र एवं विश्वके हानिकारक किसी काममें नहीं प्रवृत्त होना चाहिये । समष्टिके अविरोधेन ही व्यष्टिकी चेष्टा आदरणीय है । अहिंसा आदि समष्टि सामाजिक समझौतेका आदर सबको करना चाहिये ।

मार्क्सवाद एवं राष्ट्र

परंतु जबतक सभी राष्ट्र एवं समाज इस उच्चकोटिके सिद्धान्तको मान नहीं लेते, तबतक क्या किसी सज्जन व्यक्ति या राष्ट्रको किसी कूटनीतिक व्यक्ति या राष्ट्रकी कूटनीतिका शिकार बन जाना चाहिये ? रामराज्यवादी ऐसे अवसरके लिये अनिवार्यरूपसे आनेवाले युद्धका स्वागत करता है । मायावीके साथ निरी साधुतासे काम नहीं चलता । यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्य साध्वाचार साधुना प्रत्युपेयः ॥ (महा० शा० प० १०९ । ३० ) समाजमें जब कृतयुगके प्रारम्भमें सत्त्वगुणका पूर्ण प्रभाव था, सभी धर्म नियन्त्रित थे, तब युद्धकी आवश्यकता नहीं थी । परंतु समाज त्रिगुणात्मक है, इसमें रज और तम भी हैं ही । फिर कभी उनका भी उद्भव सम्भव है । जब अत्यन्त तामस, राजस, आदमीपर उपदेशका असर नहीं पड़ता, तब वहाँ दण्डविधान अनिवार्य ही होता है । तभी तो प्रत्येक राष्ट्रमें कानून, दण्डविधान, पुलिस, थाना, जेल आदिकी व्यवस्था है । ये ही व्यष्टिके उपद्रव समष्टिमें भी फैलते हैं । तब बड़े युद्धोका रूप बन जाता है । समाजवादियोंको ही अपने विरोधियोंके दमनार्थ क्या-क्या नहीं करना पड़ता है । कितने गुप्तचर, कितनी पुलिस, पर्ज (सफाया ) में संलग्न है । रामराज्यमें अन्यायी रावणको भी पहले अन्यायसे विरक्त होनेके लिये समझाया-बुझाया गया था । जब अनेक प्रकारसे समझाने-बुझानेपर भी रावण रास्तेपर नहीं आया, तब उसे दण्ड देना अनिवार्य हो गया । यही रामराज्यका युद्ध है । ऐसा युद्ध निरावरण साक्षात् स्वर्गका द्वार है, इससे पराङ्मुखकी अकीर्ति तथा पुण्यलोकोंका नाश ध्रुव है— अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ (गीता २ । ३३ ) समष्टि-हितके लिये महायन्त्रका प्रवर्त्तन बन्द होना चाहिये । रामराज्यशासनमें उत्पादनमें मुनाफाको प्राथमिकता न देकर राष्ट्रकी आवश्यकताको प्राथमिकता दी जायगी । सरकारद्वारा निर्धारित राष्ट्रहितानुतूल योजनाका अनुसरण करना सभी उद्योगपतियोंका कर्तव्य होगा । अतः आधुनिक जड़वादियोंके समान बाजारों, मा० रा० २६—

यन्त्रो, पेट्रोल आदिके लिये रामराज्यमें युद्ध नहीं होंगे । धर्म, संस्कृति तथा गरीबोके हित-स्वत्वोंकी रक्षाके लिये अनिवार्य होनेसे युद्धका स्वागत किया जायगा । ससारमें आर्तनाद न हो, अन्याय-अत्याचार न हो, किसीकी बहू बेटियोंके सम्मानपर आँच न आवे, इसीलिये बलवानोका बल एव अस्त्र-शस्त्र आदि अपेक्षित होते हैं और अपेक्षित होते रहेगे । मार्क्सवादी कहते हैं, 'आज मजदूरोंके लिये देशभक्तिकी बात व्यर्थ है। जब कोई पूँजी देशमें लगती थी, तब कुछ मजदूरोंको लाभकी सम्भावना भी थी । परंतु, जब पूँजीपति अपनी पूँजीको उन विदेशोंमें लगाना पसंद करते हैं, जहाँ मजदूरी कम देनी पडे और कच्चे माल सस्ते पड़े, तब ऐसे पूँजीपतियोंके देशके मजदूर देशभक्तिके नामपर अपनी जान क्यो दें ?' मार्क्सवादीकी दृष्टिमें 'जिसकी कोई सम्पत्ति नहीं, उसका कोई खास देश नहीं होता । केवल दो हाथ ही उसकी अपनी सम्पत्ति है। जहाँ मजदूरी मिल जाय, वही उसका देश है । पूँजीपति भी अपने लाभके लिये लाखो किसानो-मजदूरोंको तोपकी आगमें झुलसा डालते हैं । इनकी जीतोंमें मजदूरोंका कोई लाभ नहीं होता ।' उपर्युक्त बाते किसी देश-कालके लिये सही हो सकती हैं, परंतु यह व्यापक सत्य नहीं है । आस्तिक लोग जननी, जन्मभूमिको स्वर्गसे भी श्रेष्ठ मानते हैं—'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' उञ्छशिल वृत्तिवाले अकिंचन महर्षि—जिनकी भौतिक सम्पत्ति कुछ नहीं—उन्हें भी मातृभूमिकी भक्ति मान्य होती है । देशधर्मकी रक्षा और कल्याणके लिये वे भी अपने सर्वस्वका त्याग करते ही रहते हैं । भारतीयोंमें तो प्रातःकाल ही धरित्रीपर पाद-विन्यास करनेके पहले धरित्रीकी वन्दना की जाती है, परंतु वे मातृभूमिकी भक्तिके साथ मातृपति परमेश्वरको नहीं भूलते । उनकी मातृभक्ति संकीर्ण एव किसीकी हानि पहुँचानेवाली नहीं होती । इसीलिये वे समुद्रवसना पर्वतस्तनमण्डला धरित्रीको विष्णुपत्नी मानते हैं— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥ कहीके भी मजदूर कोई राष्ट्रसे बाहरकी वस्तु नहीं—विशेषतया भारतमें तो उच्च खानदानके ब्राह्मण, क्षत्रियादि ही मजदूर बनकर अपना जीवन बिता रहे हैं। उनको अपने देश, धर्म, जातिका ध्यान रहता है, उसका रक्षण उन्हे अभीष्ट है। पूँजीपतिके लिये नहीं, अपने लिये, अपने धर्मके लिये भी उन्हे देशभक्ति आवश्यक होती है । वस्तुतः इसीलिये धार्मिक तथा सास्कृतिक इतिहासोंके सस्कारोंमे ओतप्रोत भावनाके बिना राष्ट्रीयताका कोई महत्त्व नहीं होता । जो जडवादी विश्वस्रष्टाको ही नहीं मानता; अपने माता-पिताका ही महत्त्व नहीं

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४०३ मानता, वह देशका महत्त्व क्या मानने लगा ? जिनका मत है कि 'माता अपने स्वार्थसे दूध पिलाती है; क्योंकि दूध बिना निकले उसे कष्ट होता है । शिशु भी क्षुधासे पीड़ित होकर स्तन पीने लगता है', उन्हे देशभक्तिसे क्या लेना ? पर जलमें मेढक भी होता है, मीन भी होती है । मेढकका जल-स्नेह नगण्य है, परंतु मत्स्य जलका अनुरागी है । जड़वादियोको जहाँ रोटी मिले, वही उनका देश है, परंतु धार्मिक-सांस्कृतिक भावनावाले तो अपने पूर्वजो तथा अपनी जन्मभूमिके प्रदेशको, अपने पावन तीर्थों, अवतारों, देवताओं, महापुरुषोके तपःपूत लीलाभूमिको बड़ी आदरकी दृष्टिसे देखते हैं और उसकी रक्षा तथा सम्मानके लिये उन्हें आत्मबलिदान करनेमें कुछ भी संकोच नहीं होता । गोस्वामी तुलसीदासके राम कहते हैं— जद्यपि सब बैकुंठ बखाना । वेद पुरान विदित जगु जाना ॥ अवध पुरी सम प्रिय नहिं सोऊ । यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥ जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥ मार्क्सवाद एवं युद्ध मार्क्सवादी कहते हैं कि 'युद्ध जंगलीपनका चिह्न है । स्वयं कमाकर खानेके बजाय दूसरोंसे छीनकर पेट भरना ही युद्धका स्वरूप है । सामाजिक भावना एवं सहयोगकी बुद्धि होनेसे परिवारके रूपमे संगठित होते ही आपसी लड़ाई बंद हो गयी । एक परिवारके आदमी एक हित समझकर आपसमें न लड़कर दूसरे परिवारसे लड़ने लगे फिर लड़ाईके बजाय परिवारोंमें भी सहयोगकी भावना हुई । फिर गाँवभरका एक हित समझनेकी बुद्धि हुई तो परिवारोंका भी युद्ध बंद होकर गाँवोंका युद्ध होने लगा । मनुष्यकी आवश्यकताओ एवं पैदावार-साधनोंके बढनेसे आत्मीयताका क्षेत्र बढ़ गया और फिर देशका संगठन होने लगा । परंतु अब तो वैज्ञानिक विकासके युगमें कोई भी देश दूसरे देशकी सहायताके बिना अकेले रह नहीं सकता । सभी देशोंके परस्पर सम्बन्ध हैं, अतः उनमे भी सहयोगका सम्बन्ध होना चाहिये । इतिहासके क्रमको देखते हुए अब वह समय आ गया है कि देशो एवं राष्ट्रोंको मिटाकर सम्पूर्ण संसार एक राष्ट्रका रूप धारण कर सके । पूँजीवादी-प्रणालीमें साम्राज्यवादके रूपमे देशोके संगठनका प्रयत्न होता है; परंतु उसके मालिक दूसरे-दूसरे देशों एवं उपनिवेशोंका शोषणकर स्वार्थसिद्धिकी चेष्टा करते हैं । अतः अन्य देशोंके असंतोष एव बगावतकी भावना बनी ही रहती है । अतः समाजवादी प्रणालीके आधारपर ही यह संगठन सम्भव है । इसीलिये अन्ताराष्ट्रिय कम्युनिष्ट-संघकी चेष्टाएँ सभी राष्ट्रोंमे चलती रहती हैं । संसारके प्रत्येक देशको विश्वव्यापी समाज और राष्ट्रका अङ्ग बन जाना चाहिये और उनका परस्पर सहयोग होना चाहिये । इस तरह युद्धोंका भय सदाके लिये दूर हो सकता है । एक देशके किसानों-मजदूरोंमें दूसरे देशके किसानों-मजदूरोंसे कोई द्वेष नहीं रहता, अतः उनका ही राज्य होना ठीक है ।'

४०४ मार्क्सवाद और रामराज्य

इस सम्बन्धमे रामराज्यवादीका कहना है कि 'युद्धका खतरा मिटे, विश्व व्यापी संगठन बने, विश्व सरकार बने', यह सब बात अच्छी है, परंतु वह समाजवादकी ही सरकार हो ऐसा आग्रह क्यो ? भौतिकवादी अपना विचार सभी राष्ट्रो एवं सभी व्यक्तियोपर लादना चाहते हैं, परंतु संसारमें आज भी अरबो मनुष्य ईश्वर, धर्म एव अपने वेद, बाइबिल, पुराण, कुरान, अवेस्ता एवं मन्दिर, मसजिद, गिरजा, गुरुद्वारामें विश्वास रखते हैं। अपने शास्त्रोके अनुसार अपने धर्म, कर्म, संस्कृति, सभ्यताका पालन करते हैं। वे अपने पूर्वजोंके ऐतिहासिक गौरव तथा अपनी बपौती, मिल्कियतके स्वामी होनेका विश्वास रखते हैं तथा अपनी कमाई अपने वेटो-पोतोके लिये छोड़ना उचित समझते हैं । फिर सबको तिलाञ्जलि देकर अपनी सभ्यता, संस्कृति, सम्पत्तिसे हाथ धोकर जडवादकी पराधीनता स्वीकार करना किसे अभिमत हो सकता है, जहाँ अपना विचार व्यक्त करने, प्रचार करनेकी भी स्वाधीनता नही है और न प्रेस-पत्र, भूमि, सम्पत्ति आदि सामग्री ही है । वस्तुतः पारिवारिक संगठनमें भी व्यक्ति मिट नहीं जाता, उसे कभी भी पृथक् रहनेकी स्वाधीनता रहती है । इसीलिये वृहस्पतिने भी सम्मिलित कुटुम्ब-प्रथाका पोषण करते हुए भी कहा है कि सम्मिलित कुटुम्बमें पृथक् पृथक् व्यक्ति अग्निहोत्र, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध आदि नहीं कर सकता। एक गृहपति—घरका पुरखा ही सब करता है— एकपाकेन वसतां पितृदेवद्विजार्चनम् । एकं भवेद् विभक्तानां तदेव स्याद् गृहे गृहे ॥ ( बृहस्प० स्मृ० गायक० सं० २६।५) अतः पृथक् धर्मानुष्ठानकी दृष्टिसे पृथक् भी रह सकते हैं । एवं सह वसेयुर्वा पृथग् वा धर्मकाम्यया । पृथग् विवर्धते धर्मस्तस्माद् धर्म्या पृथक्क्रिया ॥ ( मनु० ९।१११ ) वस्तुतः वृक्षोंका समुदाय ही वन होता है । ऐसे ही व्यक्तियोका समुदाय ही समाज होता है । वृक्षोके कटनेसे वन कट जाता है, अतः व्यक्तियोके परतन्त्र एवं जडप्राय होनेसे समाजकी भी वही दशा होगी । केवल समाजके नामपर कुछ तानाशाहोंके हाथमें ही विश्वका जीवन डाल देना कौन बुद्धिमान् ठीक समझेगा ? अतः इसकी अपेक्षा रामराज्यकी व्यवस्था कही श्रेष्ठ होगी, जिसमें सभी व्यक्तियो, जातियो, सम्प्रदायो एवं राष्ट्रोंके अपने विश्वासके अनुसार अपना धर्म, ईश्वर एव शास्त्र मानने, विचार व्यक्त करनेकी पूर्ण स्वाधीनता होगी । पुराण, कुरान, वेद, बाइबिल, मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा—सबका सम्मान रहेगा । सभी अपने तीर्थों, देवस्थानोका आदर कर सकेंगे । सभीका

अपनी बपौती—मिल्कियतपर अधिकार रहेगा । अपने विचारका प्रचार करने, सगठन, प्रेस-पत्र आदि स्थापित करनेकी सबको छूट होगी, अर्थात् व्यष्टि एव समष्टि सभीको लौकिक, पारलौकिक अभ्युत्थान एव परम निःश्रेयस प्राप्त करानेकी सुविधा उपस्थित की जायगी । समष्टि व्यष्टिका उपोद्वलक होगा । व्यष्टि समष्टिके अविरोधेन आत्मोन्नतिका लिये प्रयत्न करते हुए समष्टि-सेवामें स्वेच्छासे ही प्रवृत्त होंगे । जैसे कुटुम्बका विश्वासभाजन, ईमानदार, निष्पक्ष, सर्वहितैषी व्यक्ति गृहपति (घरका पुरखा) होता है, इसी प्रकार मण्डल, राज्य, राष्ट्र एव विश्वका पालन करनेवाले व्यक्तियो या व्यक्ति-समूहोको भी सबका विश्वासभाजन, निष्पक्ष, सर्वहितैषी एव ईमानदार होना अनिवार्य होगा । फिर भी यह भूलना न चाहिये कि परिवार बन जानेपर भी परिवारके सदस्योमें लडाई होती है, ग्राम बन जानेपर भी ग्रामीणोंमें लडाई होती है, राष्ट्र बननेपर भी राष्ट्रके भीतर सब उपद्रव होते हैं । रूसमें भी एक दूसरेको हटाकर अधिकारारूढ होनेका प्रयत्न करते ही हैं, उसी तरह आगे भी यह सघर्ष रहेगा । अतः जबतक अविवेक, अविचार, अभिमान, अधर्मको रोकनेके लिये सत्य एवं सात्विक अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि गुणो तथा शास्त्रो एवं आध्यात्मिक जीव-ब्रह्मादिकी भावना दृढ न होगी, तबतक कुटुम्बका भी सगठन असम्भव है, विश्व-सगठनकी बात तो दूर है । वस्तुतः इस मार्गसे ही राष्ट्र एवं विश्वका सघटन सम्भव है । रामराज्यका तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्'का सिद्धान्त है ही । किं बहुना, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मक विश्वको ममताका आस्पद बनाकर अभेद-भावना करके उसे आत्मस्वरूप समझना एक उदात्त उपासना है । फलतः तदनुसार चेष्टा ठीक ही है । समष्टि-अविरोधेन राष्ट्र, समाज या व्यक्तिका अपने विकासकी स्वाधीनता होनेसे उनपर जिम्मेदारी होगी, अपनी हानि और लाभकी बाते सोचना, आलस्य-प्रमादका छोडना, सावधानी-तत्परताके साथ पुरुषार्थके लिये अग्रसर होना सम्भव हो सकेगा । तभी विश्वकी उन्नति और शान्ति होगी । तानाशाही-शासन यन्त्रका कल-पुर्जा बन जानेसे सभी व्यक्ति या देश जड-यन्त्रवत् हो जायेंगे । उनका विकास रुक जायगा । समाजवादी कहते हैं कि 'अपने लाभके लिये ही परिश्रम करना, शक्तिसचय करना, यह मनुष्यकी प्रकृति नहीं है—यह तो एक अभ्यास है, जो मनुष्यकी परिस्थितियोके अनुसार बन जाती है । प्राचीन कालमे युद्ध होनेपर हारनेवाले व्यक्तियोको मारकर खा जाते थे । बलवान् कमजोरोंके धन, स्त्रियाँ आदि छीन लेते थे । स्त्रियोंके लिये राजा लोग चढाई करते थे । उस समय समाजका यही अभ्यास था, परतु आजका मनुष्य इसे नहीं सहन कर सकता । असभ्य लोगोंमें आज भी लूटपाट चलती रहती है, परतु आज मनुष्यका स्वभाव बदल गया है ।

४०६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतः हानिके डर एवं लाभके लोभसे काम करनेकी आदत बदल सकती है। आज दिन प्राणी कमाता है। खर्च करनेसे अधिक बटोरकर भी रखता है; क्योकि उसे भय है कि उसे आगे शायद पदार्थ न मिल सके पर यह ठीक नहीं, इसका उत्तर पीछे विकासवादके खण्डनमे विस्तारसे आ चुका है।' अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमें पूँजीवाद मार्क्सके अनुसार 'वैज्ञानिक साधनोके विकाससे पैदावारकी शक्तिके बहुत अधिक बढ जानेपर जब भिन्न-भिन्न देशोके पूँजीपति अपनीपैदावारको अपने देशमें नहीं खपा सकते, तब उन्हे दूसरे देशोके बाजारोमें अपना माल पहुँचाना पड़ता है। पूँजीपति अपना माल दूसरे देशोंमें बेचकर मुनाफा उठाना तो पसन्द करते हैं, परंतु अपने देशमें दूसरे देशके पूँजीपतियोंका माल आकर बिकना पसन्द नही करते; क्योकि इससे उनके मुनाफेका क्षेत्र घट जाता है । इसके अतिरिक्त प्रकृतिने उपयोगी पदार्थोंको सभी देशोमे समानरूपसे नहीं बॉट दिया है या प्रकृतिने अलग-अलग देशोको अपना-अपना निर्वाह अकेले कर सकनेके योग्य नहीं बनाया । व्यापार, व्यवसाय और पैदावारके कुछ पदार्थ एक देशमें बहुत अधिक मात्रामें मिल सकते हैं, और कई ऐसे पदार्थ हैं, जो उस देशमे नही मिल सकते । जापानमें लोहा नहीं मिलता, इंग्लैंडमें रूई नहीं पैदा होती, जर्मनीको पेट्रोल बाहरसे लेना पडता है । स्वीडनको अपना लोहा बाहर भेजना जरूरी है। कनाडा अपनी लकड़ीको नहीं खपा सकता; अमेरिका अपनी रूईको बेचनेके लिये जगह ढूंढता रहता है। ये पदार्थ इन देशोंको दूसरोंसे लेन-देने पड़ते हैं । कोई देश अकेले अपना निर्वाह नहीं कर सकता, परतु प्रत्येक देशके पूँजीपति अपने-अपने व्यवसायमें मुनाफा कमानेके लिये दूसरे देशोंके व्यापारिक आक्रमणसे बचाना चाहते हैं और दूसरे देशोंपर आक्रमण करना चाहते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि "साम्राज्यवादके ऐतिहासिक विकासकी तुलना हम पूँजीवादसे इस प्रकार कर सकते है। पूँजीपति व्यक्तिकी ही तरह किसी उन्नत देशके पूँजीपति अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमें कम हैसियतके पूँजीवादी राष्ट्रोको कुचलकर शोषण-क्षेत्रपर अपना एकाधिकार कायम करनेका यत्न करते हैं। जिस प्रकार पूँजीपति एक व्यापारीकी अवस्थासे औद्योगिक साधनोंद्वारा पैदावारके पदार्थोंको बनानेवाला बनकर मुनाफेके जरिये भारी पूँजी इकट्ठी कर चुकनेके बाद स्वयं कुछ भी न कर, रुपयेके रूपमें अपनी पूँजीकी शक्तिको उधार देकर पैदावारका मुख्य भाग स्वयं खींचता रहता है, उसी प्रकार पूँजीपति देश अन्तर्राष्ट्रिय बाजारमें पहले केवल व्यापार, वाणिज्यद्वारा पूँजी इकट्ठी करते हैं । उसके बाद अपनी औद्योगिक पैदावार दूसरे देशोपर लादते हैं और इस अवस्थासे उन्नति कर दूसरे देशोको अपनी पूँजीमें जकड़ना आरम्भ करते हैं । ऐसी अवस्थामे पहुँचकर पूँजीपति देश स्वाधीन देशा और उपनिवेशोकी पैदावारमे कोई भाग नही लेते ।

वे देश पैदावारका मुख्य साधन पूँजी उन देशोंमें लगाकर मुनाफेका भाग खींचते रहते हैं और उन देशोंकी आर्थिक प्रगति और राजनीतिपर अपना नियन्त्रण रखते हैं। जिस प्रकार पैदावारके साधनोंके मालिक, पूँजीपति और परिश्रम करनेवाली साधनहीन श्रेणीके हितोंमें विरोध होता है, पूँजीपति श्रेणी परिश्रम करनेवाली श्रेणीके परिश्रमको मुनाफेके रूपमें निगलती रहती है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय पूँजीवाद अर्थात् एक देशके पूँजीपतियोंद्वारा दूसरे देशपर अधिकारका अर्थ हो जाता है--पराधीन देशके परिश्रमका शोषण। "जिस प्रकार परिश्रम करनेवाली श्रेणीके शोषणसे पूँजीपति अपनी शक्तिको बढ़ाकर अपने शोषणका क्षेत्र बढ़ाता है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्य- वादी देश एक देशका शोषणकर दूसरे देशोंको पराधीन बनाकर शोषण करनेकी शक्ति प्राप्त करते हैं। मार्क्सवादके अनुसार जिस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्थाका अन्त एक देशमे उसे समाप्त कर देनेसे नहीं हो सकता, उसी प्रकार साम्राज्यवादका अन्त भी किसी एक देशके प्रयत्नसे नहीं हो सकता। उसके लिये साधनहीनोंके संगठित अन्तराष्ट्रिय प्रयत्नकी आवश्यकता है। जिस प्रकार एक देशमें पूँजीवाद साधनहीन श्रेणीको पैदाकर अपनी विरोधी शक्ति पैदा कर लेता है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्यवादी देश शोषणके क्षेत्रको घेरकर नये शोषित देश पैदाकर अपना विरोध करनेवाली शक्ति पैदा कर देते हैं। जिस प्रकार पूँजीपति अपने देशमें पैदावारके साधनोंपर अधिकार जमाकर मेहनत करनेवाली श्रेणीको जीवन-उपायोंसे हीन कर देता है, उसी प्रकार एक पूँजीवादी देशके साम्राज्यका विस्तार व्यापारके क्षेत्रोंको अपने वशमें कर नये उगते हुए राष्ट्रों और पराधीन राष्ट्रोंके जीवनको असम्भव कर देता है। जिस प्रकार एक देशमें आर्थिक संकट लाकर पूँजीवादी व्यवस्थाकी अयोग्यताको स्पष्ट कर देता है और नयी व्यवस्था लानेकी आवश्यकता उपस्थित कर देता है, उसी तरह अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्यवादी देश साम्राज्यवादके आगे विस्तारको असम्भव कर देते हैं और नयी व्यवस्था लानेको बाध्य करते हैं। काट्स्कीका कहना है कि 'साम्राज्य-विस्तारका यत्न पूँजीवादका आवश्यक परिणाम नहीं। साम्राज्य-विस्तार नीतिकी जिम्मेदारी पूँजीवादी देशोंके कुछ एक पूँजीपतियोंपर है। इस विषयमे यदि पूँजीवादी देश समझौता करके अपने मालको खपानेके लिये और कच्चा माल प्राप्त करनेके लिये संसारको बाँट ले तो सभी पूँजीवादी राष्ट्रोंकी आवश्यकता पूरी हो सकती है और अन्तराष्ट्रिय युद्धोंका होना जरूरी नहीं रहेगा। परन्तु मार्क्सवादियोके विचारमें काट्स्कीका यह सिद्धान्त न तो इतिहासके अनुभवपर पूरा उतरता है और न पूँजीवादके विकासके मार्गके अनुकूल ही है। काट्स्की इस बातको भूल जाता है जिस प्रकार एक देशमें आर्थिक हितोंकी

४०८ मार्क्सवाद और रामराज्य क्षाके लिये श्रेणियाँ राजनैतिक शक्तिका व्यवहार करती हैं, उसी प्रकार अन्ता- राष्ट्रिय क्षेत्रमें पूँजीवादी राष्ट्र अपने आर्थिक हितोंकी रक्षाके लिये अपने राष्ट्रोकी सैनिक शक्तिका व्यवहार करते है । जबतक पूँजीवादी राष्ट्रोके सामने अन्ताराष्ट्रिय क्षेत्रमे मुनाफा कमानेका प्रश्न है, उनमें समझौता हो ही नही सकता । प्रत्येक राष्ट्र इस लूटमे सबसे बड़ा भाग लेनेका यत्न करेगा । जबतक बलवान् पूँजीवादी देशोका भय रहेगा, निर्बल पूँजीवादी देश लूटके बाजारमें कम भाग लेना स्वीकार करेंगे । परन्तु अन्ताराष्ट्रिय लूटद्वारा उनकी सैनिक शक्ति बढ़ते ही वह और अधिक बाजारों और उपनिवेशोंकी माँग पेश करेंगे । अभी हालकी अन्ताराष्ट्रिय घटनाएँ इस बातको प्रमाणित कर देती हैं । अपनी पूँजीकी शक्ति और सैनिक शक्ति पहले बढ़ाकर इटलीने अबीसीनियाको हड़प लिया, बादमे अन्ताराष्ट्रिय शान्तिकी रक्षाके लिये उसका और फ्रांसका समझौता टूट गया । दूसरा उदाहरण हमारे सामने जर्मनीका है । अपनी सीमाके देशोंको अपनी पूँजीवादी लूटका क्षेत्र बना चुकनेके बाद भी जब जर्मनीकी पूँजीपति-श्रेणीकी भूख शान्त नही हुई, तब जर्मनीने दूर देशों और उपनिवेशोंकी माँगपर जोर देना आरम्भ किया । मानो निर्बल और पिछड़े हुए देशोंका जन्म जर्मनीके अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादका शिकार बननेके लिये ही हुआ हो । “यदि काट्स्कीके अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी साम्राज्यवादके सिद्धान्तके अनुसार पूँजीवादी राष्ट्र परस्पर समझौतेद्वारा ससारके निर्बल राष्ट्रोको शोषणके लिये परस्पर बाँट भी ले तो भी वह समझौता ससारमे चिरशान्ति स्थापित नहीं कर सकता; क्योकि शोषित राष्ट्रोकी जनताका भी अपने जीवनके अधिकारोंके लिये प्रयत्न करना आवश्यक और स्वाभाविक है और इस कारण उपनिवेशो तथा पराधीन देशोंमें अन्ताराष्ट्रिय अशान्तिका कारण बना ही रहेगा ।” पर धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके दृष्टिकोणसे व्यष्टि-समुदाय ही समष्टि है, जैसे वृक्षोका समुदाय ही वन है । प्रत्येक वृक्षके ह्रास, विकास व्यक्तिगत होते हुए भी परिणामतः वनका ह्रास, विकास बन जाता है । व्यक्तिगत विकास-शक्ति नष्ट हो जानेपर वन कभी भी टिक नहीं सकता । इसी तरह प्रत्येकव्यक्ति बुद्धिमानी सावधानीसे व्यक्तिगत एव सामूहिक विकासका प्रयत्न करे तो कुटुम्ब, समाज एव राष्ट्र विकसित हो जाता है । समाजके हितका ध्यान रखते हुए ही व्यक्तिगत विकासका प्रयत्न उचित है। कितने कार्य ऐसे भी होते हैं, जिनमें व्यक्तिगतप्रयत्नसे काम नहीं चलता, वहाँ सामूहिक तोरपर ही कार्य किया जाता है । शुभ, अशुभ कर्मोंका फल व्यक्तिगत रूपसे प्राणियोंको भोगना पड़ता है । छोटी-छोटी इकाइयोमें कार्य करनेमे सुविधा होती है । भोजन-वस्त्रादिका प्रबन्ध भिन्न-भिन्न कुटुम्बोंमें बँटे रहनेसे स्वास्थ्य तथा रुचिकी अनुकूलता अधिक होती है । करोड़ो

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४०९

या लाखों आदमियोंका एक स्थानमें भोजन बनाना, बाँटना असम्भव है। पूँजीवादी राज्योंमें भी जनसंख्या, उसकी आवश्यकता तथा पैदावारकी मात्रा और उसके सन्तुलनका विचार किया जाता है। उत्पादन-उपयोग, आय-व्यय, आयात-निर्यात आदि सब बातोंका ज्ञान और उनके आँकड़े सभी राज्योंमें रखे जाते हैं। अतः 'पूँजीवादीराज्यमें भोक्ताओं एवं खाद्यकी मात्राका परिज्ञान नहीं रहता'--यह कहना असङ्गत है। जहाँ व्यक्तिगत सम्पत्तिका सिद्धान्त मान्य है, वहाँ स्वाभाविकरूपसे उत्पादक या व्यापारी दोनों ही मुनाफा चाहेंगे और यही सहज वितरणका मार्ग भी है। व्यापारी जहाँ जिस वस्तुकी बहुतायत है, वहाँसे उसे खरीदकर जहाँ कमी है, वहाँ पहुँचा देता है। इसके बदले उसे कुछ लाभ भी हो जाता है। प्राचीन समयमें प्रत्येक कार्य इसी ढंगसे होते रहे हैं, जिससे समाजका भी कार्य चले और व्यक्तिका लाभ भी होता चले। अध्यापन, याजन, प्रतिग्रह, व्यापार, कृषि, गोरक्षा, शिल्प आदि सभी कामोंसे निर्माता, प्रयोक्ता सभीको लाभ होता है। राम-राज्य-प्रणालीके अनुसार कभी आर्थिक असन्तुलन न होनेसे बेकारी, बेरोजगारी न होगा और राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकका जीवनस्तर ऊँचा होगा। क्रयशक्तिके घटनेका कोई प्रश्न ही न रहेगा, फिर मालके खपत न होनेकी भी शिकायत न होगी। जो कहा गया है कि 'समाजमें मेहनत करनेवाले ही पैदावार करते हैं और वे ही तैयार मालकी खपत करते हैं, अतः समाजमें जो पैदावारके लिये परिश्रम करनेवाले हैं, वे ही पैदावारको खर्च करनेवाले हैं। यदि परिश्रम करनेवालोंको अपने परिश्रमका पूरा फल मिल जाय तो पैदावार फालतू पड़ी नहीं रह सकती।' यह ठीक नहीं है, क्योंकि पैदा करनेवालों और उप- भोक्ताओंकी श्रेणियोंमें भेद है। यों तो राष्ट्रका कोई भी नागरिक कुछ-न-कुछ करता ही है। बिना कुछ किये तो कोई क्षणभर भी टिक नहीं सकता। फिर मिल- मजदूरोंद्वारा की गयी पैदावारका उपभोग किसान भी करता है। किसानद्वारा की गयी पैदावारका मिल-मजदूर भी उपभोग करता है। अध्यापक, इंजीनियर, छात्र, सिपाही, सरकारी कर्मचारी, फिल्म-कार्यकर्ता तथा विभिन्न कार्य करनेवाले होते हैं। इस तरह समाजके घटक विभिन्न व्यक्तियोंके कार्यों और शक्तियोंमें भेद होता है। इसीलिये उन्हें काम, दाम, आराममें भी कुछ वैषम्य मानना पड़ता है। अध्यापक, इंजीनियर उत्पादनका कार्य नहीं करते, फिर भी उत्पादकोंसे अधिक उपभोग-सामग्री उन्हें मिलती है। एक फावड़ा चलानेवालेको इंजीनियरके बराबर वेतन कहीं भी नहीं दिया जाता। यदि सम्पूर्ण लाभ उत्पादकका ही है, उसे ही मिल जाय तब तो भूमि, मशीन, मकान तथा मुद्रा लगानेवालेको लाभमें

कुछ भी हिस्सा न मिलेगा । परंतु उत्पादनमें इन वस्तुओका महत्त्वपूर्ण स्थान है—ये सब बाते विस्तारसे पहले सिद्ध की जा चुकी हैं । परिश्रम करनेवालेका वही फल है जो मजदूर और मालिकके समझौते या पञ्चायत अथवा न्यायालयद्वारा वेतन निर्धारित होता है । मुनाफा श्रमका फल नहीं; किंतु कच्चे माल, मशीन तथा पूँजीका फल है । श्रमका फल श्रमिकको वेतनके रूपमें मिल चुका । यदि सम्पूर्ण मुनाफा मजदूरको दे दिया जाय तो पैदावार करनेके साधन; नये यन्त्र, कल, कारखाने आदि विकसित न हो सकेगे न बढ ही सकेगे । मजदूरको जो मिलेगा, वह खर्च कर डालेगा । मजदूर-सरकार भी यदि लागत खर्च निकालकर सब लाभ मजदूरोको बाँट दे तो वह भी कल, कारखानोका विकास न कर सकेगी । अतः मजदूर सरकार भी विकासके लिये लाभांश बचाती है और वह विकास भी समाजके हितके लिये ही होता है । यही बात दूसरे पक्षमें भी कही जा सकती है । अतएव पूँजीवादी भी तो लाभका उपयोग कल, कारखानोंके विस्तारमे—उद्योगोंके विस्तारमें लगाता है । उससे समाजका जीवनस्तर विकसित होता है । कोई भी पूँजीपति रुपयोंको निश्चल जमा रखनेमें लाभ नहीं समझता । पूँजीपतिका अपना निजी खर्च मजदूर-देशके मन्त्रियोसे कम ही होता है । रूसी नेता बुल्गानिन और क्रुश्चेवके स्वागतमें करोड़ों रुपये खर्च हो गये । वे भी मजदूर ही हैं । कहा जा सकता है कि यह सम्मान व्यक्तिका नहीं; किंतु एक राष्ट्रका था । इसपर दूसरे लोग भी कह सकते हैं कि एक राजाका भी स्वागत उसके व्यक्तिगत न होकर राज्यका ही होता है । किसी भी विद्वान् या धनवान्पर जो भी खर्च होता है, वह राष्ट्र एव उसकी विद्या तथा सम्पत्तिपर ही खर्च होता है । जिन पुराने बादशाहोका हजारों रुपये रोजका खर्च था, वह भी क्या था ? उनके हजारों नौकरोंकी जीविका इसीसे चलती थी । उत्तमोत्तम वस्तुके खरीदनेमें जो रुपये खर्च होते थे, वह कारीगरो, कलाकारो और निर्माताओके पास जाता था । अस्तु, रामराज्य-प्रणालीसे उत्पादनवृद्धिके अनुसार कामके घटोंमें कमी, मजदूरोकी संख्या और वेतनवृद्धिका क्रम लगा रहता है । अतः समाज या मजदूरोंके क्रय-शक्तिके घटनेका कोई भी प्रश्न नही खड़ा होता । बेकारी एवं भूखे, नंगे रहनेका किसीको अवसर ही नहीं होगा । व्यक्ति और समाज सबका कर्तव्य है कि समाजमें कोई भी भूखा, नगा, बेरोजगार, बेकार न रहने पाये । पूँजीपति, उत्पादन-साधन, उत्पादक, श्रमिक तथा अन्य बुद्धिजीवी लोगोके हितके स्वत्वरक्षणका प्रयत्न होगा । 'मार्क्सवादियोके अनुसार प्राकृतिक अवस्थाओके कारण सभी देशोमे औद्योगिक विकास समानरूपमे नही हो पाता । औद्योगिकरूपसे जिन देशोका विकास कम हुआ है,

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४११ उनमें खेतीद्वारा कच्चे मालकी पैदावार अधिक होती है और वह देश अपने कच्चे मालकी पैदावारको खपा सकनेमें असमर्थ रहते हैं। इन देशोंमें कच्चा माल सस्ता मिल सकता है और औद्योगिक मालको बेचकर मुनाफा कमानेकी गुंजाइश रहती है। इसलिये औद्योगिकरूपसे उन्नत देश कम उन्नत देशोंपर प्रभुत्व जमाकर आर्थिक लाभ उठानेका यत्न करते हैं। कम उन्नत देश पूँजीवादी देशद्वारा अपने शोषण- को रोक न सके, या दूसरे उन्नत पूँजीवादी देश उन देशोंमे आकर उनका बाजार खराब न कर सके, वहाँ उनका पूरा एकाधिकार और ठेका कायम रहे, इसलिये औद्योगिकरूपसे उन्नत पूँजीवादी देश कम उन्नत देशोको अपने राजनैतिक अधिकारमे रखनेका यत्न करते हैं। कम उन्नत देश या तो उन्नत पूँजीपति देशोके अधीन हो जाते हैं या उन्हे उपनिवेश बना लिया जाता है या उन्हे सरक्षणमें ले लिया जाता है। इस प्रकार यूरोपके कुछ देशोने औद्योगिक विकास और पूँजीवाद- की उन्नतिके बाद सन् १८७६ से लेकर १९१४ के महायुद्धसे पूर्व कम उन्नत देशो अफ्रीका, एशिया आदिमें यूरोपके क्षेत्रफलसे दुगुनी भूमिपर अपना अधि- कार कर लिया । इसमें सबसे अधिक भाग था इंग्लैंड और फ्रासका। इंग्लैंड इससे पूर्व भी भारत, ब्रह्मा आदि देशोको अधीन कर चुका था और कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीकामें अपने उपनिवेश बसा चुका था। जर्मनी और इटलीमें पूँजीवादका विकास बादमे होनेके कारण उनके होश सँभालनेसे पहले ही इंग्लैंड और फ्रांस पृथ्वीका बड़ा भाग सँभाल चुके थे। भूमिकी एक सीमा है, उसे पूँजीवाद देशोंके शोषणके लिये आवश्यकतानुसार बढाया नहीं जा सकता; इसलिये पूँजीवादी देशोंमें झगडा होना आवश्यक हो जाता है।' पूँजीवादी साम्राज्यवाद मार्क्सवादके अनुसार 'किसी देशका पूँजीवाद जब मुनाफेके लिये अपने देशसे बाहर कदम फैलाता है, तब वह साम्राज्यवादका रूप धारण कर लेता है। प्राचीन समयका साम्राज्यवाद सैनिक आक्रमणके रूपमें आगे बढ़ता था और पराधीन देशोका शोषण भूमि-करके रूपमें बरतता था। पूँजीवादका साम्राज्य-विस्तार आरम्भ होता है व्यापारसे। फिर अपने व्यापारको दूसरे देशोंके मुकाबलेमें सुरक्षित रखनेके लिये और पिछड़े हुए देशोंके कच्चे मालपर एकाधिकार रखनेके लिये साम्राज्यवादी देशोंमे परस्पर झगड़ा और युद्ध होता है।' मार्क्सवादके अनुसार पूँजीवादके ऐतिहासिक विकासका परिणाम है साम्राज्यवाद। जिस प्रकार पूँजीवाद, व्यक्ति-स्वतन्त्रतासे आरम्भ होकर पूँजी- पतियोंके एकाधिकारमें परिवर्तित हो जाता है, उसी प्रकार साम्राज्यवाद भी अन्तर्- राष्ट्रिय स्वतन्त्र व्यापारसे आरम्भ होकर बलवान् पूँजीपति राष्ट्रके एकाधिकारमें

परिवर्तित हो जाता है और इस एकाधिकारको प्रत्येक पूँजीवादी राष्ट्रके पूँजीपति अपने ही अधिकारमें रखना चाहते हैं।' रामराज्य-प्रणालीके अनुसार एक सार्वभौम शासन अन्ताराष्ट्रिय शासन होता है। उसके द्वारा सभी राष्ट्रोंके परस्पर समन्वय एवं सामञ्जस्यका सफल प्रयत्न होता है। उसके अनुसार अन्ताराष्ट्रिय व्यापारकी भी सुविधा होती है। अपने प्रयोजनयोग्य वस्तु रखकर शेष वस्तु उन देशोंमें भेजी जाती है, जहाँ उस वस्तुकी कमी होती है। इसी तरह एक देशमें अधिक उत्पादन होनेपर अन्य देशोंमें माल भी उसी व्यापारद्वारा सहजमें पहुँचाया जा सकता है। स्वभावसे ही जहाँ जिस वस्तुकी कमी होती है, व्यापारी वहीं लाभके लिये माल पहुँचाते हैं। राष्ट्रहितकी दृष्टिसे अपने यहाँसे भी यदि माँग पूर्ति हो सकती है तो बाहरके मालपर प्रतिबन्ध लगाया जाता है। तदनुसार ही व्यापारिक समझौता होता है। इसी समझौतेके द्वारा जिस देशमें जिस वस्तुकी बहुतायत है, वहाँसे उसका निर्यात होता है। जिस वस्तुकी किसी देशमें कमी है, उसमें उस वस्तुका देशान्तरसे आयात होता है। इसी आधारपर जापानको लोहा, इंगलैंडको रूई, जर्मनीको पेट्रोल अन्य देशोंसे मिलता है। इसी आधारपर स्वीडन लोहा, कनाडा लकडी, अमेरिका रूईका निर्यात करता है। अवश्य पाश्चात्य साम्राज्यवादियोंने व्यापारके लिये अनेक देशोंको गुलाम बनाया और उपनिवेशके रूपमें राजनीतिक प्रभावक्षेत्रमें रखकर विविध प्रकारका लाभ उठानेका प्रयत्न किया और अब भी कर रहे हैं। यद्यपि अब उपनिवेशवाद मिट रहा है, फिर भी कई साम्राज्यवादी अभी भी उसका मोह छोड़नेमें असमर्थ हैं। भारतीय अंश गोवाको पुर्तगाली अब भी उपनिवेश बनाये हैं। अमेरिकाके कई क्षेत्रोंमें अब भी उपनिवेशवाद है। उपनिवेशवादके रूपमें न सही, परंतु राजनीतिक प्रभावक्षेत्र बनानेकी दृष्टिसे तो मार्क्सवादी राष्ट्र रूस, चीन आदि भी प्रयत्नशील हैं। इस समय पूँजीवादी अमेरिका एवं मार्क्सवादी रूसकी ही होड है। दोनों ही अपने-अपने प्रभावक्षेत्रके विस्तारके लिये प्रयत्नशील हैं। इनके व्यापारिक समझौते भी उन्हीं क्षेत्रोंमें होते हैं। सिद्धान्तके विचारसे देखा जाय तो किसी देशमें कम्युनिज्म रहे तो भी पूँजीवादी राष्ट्रका कोई नुकसान, नहीं। परंतु कम्युनिष्ट राज्य तो सिद्धान्ततः तबतक किसी देशमें कम्युनिज्मकी स्थापना असम्भव समझते हैं, जब- तक सारे संसारमें उसकी स्थापना न हो जाय। ऐसी दशामें जब हम मार्क्सवादियोंके द्वारा सह-अस्तित्वकी घोषणा सुनते हैं—तो आश्चर्य होता है। अन्ताराष्ट्रिय कम्युनिष्टराज्य या विश्व-मजदूर-सरकार बनाना कम्युनिष्टों- का ध्येय है और जैसे एक राष्ट्रमें तानाशाही मजदूर-शासन होता है, वैसे ही विश्व- भरमें नानाशाही मजदूर-शासन होगा। इसकी अपेक्षा रामराज्य-प्रणालीके अनुसार सार्वभौम विश्व-सरकारकी योजना कहीं श्रेष्ठ है। जिसमें केवल शान्ति, सामञ्जस्य,