मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन | ४३६ | बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन | ४९७ |
| १२६- सूर्य-रथपर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति | ४४० | १४०- देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय | ५०१ |
| १२७- ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा | ४४६ | १४१- पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृ-तर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण | ५०८ |
| १२८- देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन | ४४८ | १४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन | ५१५ |
| १२९- त्रिपुर-निर्माणका वर्णन | ४५४ | १४३- यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिको वर्णन | ५२० |
| १३०- दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना | ४५८ | १४४- द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन | ५२४ |
| १३१- त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार | ४६० | १४५- युगानुसार प्राणियोंकी शरीर-स्थिति एवं वर्ण-व्यवस्थाका वर्णन, श्रौत-स्मार्त, धर्म, तप, यज्ञ, क्षमा, शम, दया आदि गुणोंका लक्षण, चातुर्होत्रकी विधि तथा पाँच प्रकारके ऋषियोंका वर्णन | ५३२ |
| १३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना | ४६५ | १४६- वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान | ५४० |
| १३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान | ४६८ | १४७- ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक | ५४७ |
| १३४- देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी | ४७३ | १४८- तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुरसंग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन | ५४९ |
| १३५- शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्धविमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश | ४७६ | १४९- देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ | ५५८ |
| १३६- मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश | ४८३ | १५०- देवताओं और असुरोंकी सेनाओंमें अपनी-अपनी जोड़ीके साथ घमासान युद्ध, देवताओंके विकल होनेपर भगवान् विष्णुका युद्धभूमिमें आगमन और कालनेमिको परास्त कर उसे जीवित | |
| १३७- वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शङ्करजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश | ४८८ | ||
| १३८- देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध | ४९१ | ||
| १३९- दानवराज मयका दानवोंको समझा- |