मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
[ ८ ]
| अध्याय विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन | ४३६ | बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन | ४९७ |
| १२६- सूर्य-रथपर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति | ४४० | १४०- देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय | ५०१ |
| १२७- ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा | ४४६ | १४१- पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृ-तर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण | ५०८ |
| १२८- देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन | ४४८ | १४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन | ५१५ |
| १२९- त्रिपुर-निर्माणका वर्णन | ४५४ | १४३- यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिको वर्णन | ५२० |
| १३०- दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना | ४५८ | १४४- द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन | ५२४ |
| १३१- त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार | ४६० | १४५- युगानुसार प्राणियोंकी शरीर-स्थिति एवं वर्ण-व्यवस्थाका वर्णन, श्रौत-स्मार्त, धर्म, तप, यज्ञ, क्षमा, शम, दया आदि गुणोंका लक्षण, चातुर्होत्रकी विधि तथा पाँच प्रकारके ऋषियोंका वर्णन | ५३२ |
| १३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना | ४६५ | १४६- वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान | ५४० |
| १३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान | ४६८ | १४७- ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक | ५४७ |
| १३४- देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी | ४७३ | १४८- तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुरसंग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन | ५४९ |
| १३५- शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्धविमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश | ४७६ | १४९- देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ | ५५८ |
| १३६- मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश | ४८३ | १५०- देवताओं और असुरोंकी सेनाओंमें अपनी-अपनी जोड़ीके साथ घमासान युद्ध, देवताओंके विकल होनेपर भगवान् विष्णुका युद्धभूमिमें आगमन और कालनेमिको परास्त कर उसे जीवित | |
| १३७- वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शङ्करजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश | ४८८ | ||
| १३८- देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध | ४९१ | ||
| १३९- दानवराज मयका दानवोंको समझा- |
[ ९ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| छोड़ देना | ........ ५६० | वीरकद्वारा रोका जाना | ........ ६५६ | ||
| १५१- | भगवान् विष्णुपर दानवोंका सामूहिक आक्रमण, भगवान् विष्णुका अद्भुत युद्ध-कौशल और उनके द्वारा दानवसेनापति ग्रसनकी मृत्यु | ........ ५७८ | १५८- | वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शङ्करका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति | ........ ६५८ |
| १५२- | भगवान् विष्णुका मथन आदि दैत्योंके साथ भीषण संग्राम और अन्तमें घायल होकर युद्धसे पलायन | ........ ५८१ | १५९- | स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति | ........ ६६२ |
| १५३- | भगवान् विष्णु और इन्द्रका परस्पर उत्साहवर्धक वार्तालाप, देवताओंद्वारा पुनः सैन्य-संगठन, इन्द्रका असुरोंके साथ भीषण युद्ध, गजासुर और जम्भासुरकी मृत्यु, तारकासुरका घोर संग्राम और उसके द्वारा भगवान् विष्णुसहित देवताओंका बंदी बनाया जाना | ........ ५८४ | १६०- | तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध | ........ ६६६ |
| १५४- | तारकके आदेशसे देवताओंकी बन्धन-मुक्ति, देवताओंका ब्रह्माके पास जाना और अपनी विपत्तिगाथा सुनाना, ब्रह्माद्वारा तारक-वधके उपायका वर्णन, रात्रिदेवीका प्रसङ्ग, उनका पार्वतीरूपमें जन्म, काम-दहन और रतिकी प्रार्थना, पार्वतीकी तपस्या, शिव-पार्वती-विवाह तथा पार्वतीका वीरकको पुत्ररूपमें स्वीकार करना | ........ ६०१ | १६१- | हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश | ........ ६६८ |
| १५५- | भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान | ........ ६५० | १६२- | प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध | ........ ६७५ |
| १५६- | कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आदि दैत्यका पार्वती-रूपमें शङ्करके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप | ........ ६५२ | १६३- | नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति | ........ ६७८ |
| १५७- | पार्वतीद्वारा वीरकको शाप, ब्रह्माका पार्वती तथा एकानंशाको वरदान, एकानंशाका विन्ध्याचलके लिये प्रस्थान, पार्वतीका भवनद्वारपर पहुँचना और | १६४- | पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्का उत्तर | ........ ६८५ | |
| १६५- | चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन | ........ ६८८ | |||
| १६६- | महाप्रलयका वर्णन | ........ ६९० | |||
| १६७- | भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद | .... ६९२ | |||
| १६८- | पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति | ........ ६९७ | |||
| १६९- | नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव तथा उस कमलका साङ्गोपाङ्ग वर्णन | ........ ६९८ | |||
| १७०- | मधु-कैटभकी उत्पत्ति, उनका ब्रह्माके |
[ १० ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| साथ वार्तालाप और भगवान्द्वारा वध | ७०० | और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति | ७४४ | ||
| १७१- | ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति, दक्षकी बारह कन्याओंका वृत्तान्त, ब्रह्माद्वारा सृष्टिका विकास तथा विविध देवयोनियोंकी उत्पत्ति | ७०२ | १८१- | अविमुक्तक्षेत्र-(वाराणसी) का माहात्म्य | ७५३ |
| १७२- | तारकामय-संग्रामकी भूमिका एवं भगवान् विष्णुका महासमुद्रके रूपमें वर्णन, तारकादि असुरोंके अत्याचारसे दुःखी होकर देवताओंकी भगवान् विष्णुसे प्रार्थना और भगवान्का उन्हें आश्वासन | ७०७ | १८२- | अविमुक्त-माहात्म्य | ७५५ |
| १७३- | दैत्यों और दानवोंकी युद्धार्थ तैयारी | ७११ | १८३- | अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर | ७५७ |
| १७४- | देवताओंका युद्धार्थ अभियान | ७१३ | १८४- | काशीकी महिमाका वर्णन | ७६५ |
| १७५- | देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति | ७१७ | १८५- | वाराणसी-माहात्म्य | ७७० |
| १७६- | चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य, भगवान् विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन | ७२३ | १८६- | नर्मदा-माहात्म्यका उपक्रम | ७७६ |
| १७७- | देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्भुत मुठभेड़, कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय | ७२७ | १८७- | नर्मदा-माहात्म्यके प्रसङ्गमें पुनः त्रिपुराख्यान | ७८० |
| १७८- | कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति | ७३२ | १८८- | त्रिपुर-दाहका वृत्तान्त | ७८४ |
| १७९- | शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध | ७३८ | १८९- | नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य | ७९१ |
| १८०- | वाराणसी-माहात्म्यके प्रसङ्गमें हरिकेश यक्षकी तपस्या, अविमुक्तकी शोभा | १९०- | नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ | ७९२ | |
| १९१- | नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य | ७९४ | |||
| १९२- | शुक्लतीर्थका माहात्म्य | ८०३ | |||
| १९३- | नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर प्रदान | ८०६ | |||
| १९४- | नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य | ८१२ | |||
| १९५- | गोत्रप्रवर-निरूपण-प्रसङ्गमें भृगुवंशकी परम्पराका विवरण | ८१६ | |||
| १९६- | प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि अङ्गिराके वंशका वर्णन | ८१९ | |||
| १९७- | महर्षि अत्रिके वंशका वर्णन | ८२३ | |||
| १९८- | प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि विश्वामित्रके वंशका वर्णन | ८२४ | |||
| १९९- | गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि कश्यपके वंशका वर्णन | ८२५ | |||
| २००- | गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि वसिष्ठकी शाखाका कथन | ८२७ | |||
| २०१- | प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन | ८२९ | |||
| २०२- | गोत्रप्रवरकीर्तनमें महर्षि अगस्त्य, पुलह, पुलस्त्य और क्रतुकी |
[ ११ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| शाखाओंका वर्णन | ८३२ | २२६- | सामान्य राजनीतिका निरूपण | ८८७ | |
| २०३- | प्रवरकीर्तनमें धर्मके वंशका वर्णन | ८३३ | २२७- | दण्डनीतिका निरूपण | ८८९ |
| २०४- | श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन | ८३४ | २२८- | अद्भुत शान्तिका वर्णन | ९०५ |
| २०५- | धेनु-दान-विधि | ८३६ | २२९- | उत्पातोंके भेद तथा कतिपय ऋतुस्वभावजन्य शुभदायक अद्भुतोंका वर्णन | ९०८ |
| २०६- | कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य | ८३७ | २३०- | अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय | ९१० |
| २०७- | उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व | ८४० | २३१- | अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय | ९११ |
| २०८- | सावित्री और सत्यवान्का चरित्र | ८४३ | २३२- | वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय | ९१२ |
| २०९- | सत्यवान्का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना | ८४५ | २३३- | वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय | ९१४ |
| २१०- | यमराजका सत्यवान्के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप | ८४८ | २३४- | जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय | ९१५ |
| २११- | सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति | ८५० | २३५- | प्रसवजनित विकारका वर्णन और उसकी शान्ति | ९१५ |
| २१२- | यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति | ८५२ | २३६- | उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति | ९१६ |
| २१३- | सावित्रीकी विजय और सत्यवान्की बन्धन-मुक्ति | ८५४ | २३७- | पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति | ९१७ |
| २१४- | सत्यवान्को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति | ८५६ | २३८- | राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाश-सूचक लक्षण और उनकी शान्ति | ९१८ |
| २१५- | राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण | ८५७ | २३९- | ग्रहयागका विधान | ९१९ |
| २१६- | राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन | ८६४ | २४०- | राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान | ९२२ |
| २१७- | दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण | ८६७ | २४१- | अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल | ९२४ |
| २१८- | दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन | ८७३ | २४२- | शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण | ९२६ |
| २१९- | विषयुक्त पदार्थोंके लक्षण एवं उससे राजाके बचनेके उपाय | ८७६ | २४३- | शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण | ९२८ |
| २२०- | राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन | ८७८ | २४४- | वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें श्रीभगवान्-द्वारा अदितिको वरदान | ९३० |
| २२१- | दैव और पुरुषार्थका वर्णन | ८८२ | २४५- | बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्लादका उन्हें शाप, बलिकी अनुनय, ब्रह्माजी-द्वारा वामनभगवान्का स्तवन, भगवान् वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान | ९३४ |
| २२२- | साम-नीतिका वर्णन | ८८३ | २४६- | बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्वारा उन्हें तीन | |
| २२३- | नीति चतुष्टयीके अन्तर्गत भेद-नीतिका वर्णन | ८८४ | |||
| २२४- | दान-नीतिकी प्रशंसा | ८८५ | |||
| २२५- | दण्डनीतिका वर्णन | ८८६ |
[ १२ ]
| अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान ........ ९४२ | २६५- प्रतिमाके अधिवासन आदिकी विधि ..... १०१३ |
| २४७- अर्जुनके वाराहावतारविषयक प्रश्न करनेपर शौनकजीद्वारा भगवत्स्वरूपका वर्णन ........ ९४८ | २६६- प्रतिमा-प्रतिष्ठाकी विधि ...... १०१७ |
| २६७- देव (प्रतिमा)-प्रतिष्ठाके अङ्गभूत अभिषेक-स्नानका निरूपण ...... १०२२ | |
| २४८- वराहभगवान्का प्रादुर्भाव, हिरण्याक्षद्वारा रसातलमें ले जायी गयी पृथ्वीदेवीद्वारा यज्ञवराहका स्तवन और भगवान्द्वारा उनका उद्धार ........ ९५२ | २६८- वास्तु-शान्तिकी विधि ...... १०२५ |
| २६९- प्रासादोंके भेद और उनके निर्माणकी विधि ...... १०२८ | |
| २४९- अमृतप्राप्तिके लिये समुद्र-मन्थनका उपक्रम और वारुणी (मदिरा)-का प्रादुर्भाव ........ ९५७ | २७०- प्रासाद-संलग्न मण्डपोंके नाम, स्वरूप, भेद और उनके निर्माणकी विधि ...... १०३२ |
| २७१- राजवंशानुकीर्तन ...... १०३५ | |
| २५०- अमृतार्थ समुद्र-मन्थन करते समय चन्द्रमासे लेकर विषतकका प्रादुर्भाव ........ ९६३ | २७२- कलियुगके प्रद्योतवंशी आदि राजाओंका वर्णन ...... १०३७ |
| २५१- अमृतका प्राकट्य, मोहिनीरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा देवताओंका अमृत-पान तथा देवासुरसंग्राम ........ ९६८ | २७३- आन्ध्रवंशीय, शकवंशीय एवं यवनादि राजाओंका संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण ... १०४० |
| २७४- षोडश दानान्तर्गत तुलादानका वर्णन ...... १०४६ | |
| २५२- वास्तुके प्रादुर्भावकी कथा ........ ९७१ | २७५- हिरण्यगर्भदानकी विधि ...... १०५३ |
| २५३- वास्तु-चक्रका वर्णन ........ ९७३ | २७६- ब्रह्माण्डदानकी विधि ...... १०५५ |
| २५४- वास्तुशास्त्रके अन्तर्गत राजप्रासाद आदिकी निर्माण-विधि ........ ९७७ | २७७- कल्पपादप-दान-विधि ...... १०५७ |
| २७८- गोसहस्र-दानकी विधि ...... १०५९ | |
| २५५- वास्तुविषयक वेधका विवरण ........ ९८१ | २७९- कामधेनु-दानकी विधि ...... १०६२ |
| २५६- वास्तु-प्रकरणमें गृह-निर्माणविधि ........ ९८३ | २८०- हिरण्याश्व-दानकी विधि ...... १०६३ |
| २५७- गृहनिर्माण (वास्तुकार्य)-में ग्राह्य काष्ठ ..... ९८६ | २८१- हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि ...... १०६५ |
| २५८- देवप्रतिमाका प्रमाण-निरूपण ........ ९८८ | २८२- हेमहस्तिरथ-दानकी विधि ...... १०६६ |
| २५९- प्रतिमाओंके लक्षण, मान, आकार आदिका कथन ........ ९९३ | २८३- पञ्चलाङ्गल (हल) प्रदानकी विधि ...... १०६८ |
| २६०- विविध देवताओंकी प्रतिमाओंका वर्णन .... ९९६ | २८४- हेमधरा (सुवर्णमयी पृथ्वी)-दानकी विधि ...... १०७० |
| २६१- सूर्यादि विभिन्न देवताओंकी प्रतिमाके स्वरूप, प्रतिष्ठा और पूजा आदिकी विधि ...... १००१ | २८५- विश्वचक्र-दानकी विधि ...... १०७१ |
| २८६- कनककल्पलता-दानकी विधि ...... १०७३ | |
| २६२- पीठिकाओंके भेद, लक्षण और फल ..... १००५ | २८७- सप्तसागर-दानकी विधि ...... १०७५ |
| २६३- लिङ्गके निर्माणकी विधि ...... १००७ | २८८- रत्नधेनु-दानकी विधि ...... १०७६ |
| २४६- प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्गमें यज्ञाङ्गरूप कुण्डादिके निर्माणकी विधि ...... १०१० | २८९- महाभूतघट-दानकी विधि ...... १०७८ |
| २९०- कल्पानुकीर्तन ...... १०७९ | |
| २९१- मत्स्यपुराणकी अनुक्रमणिका ...... १०८२ | |
| पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म ...... १०८४ |
१- मङ्गलाचरण, शौनक आदि मुनियोंका सूतजीसे पुराणविषयक प्रश्न, सूतद्वारा मत्स्यपुराणका वर्णनारम्भ, भगवान् विष्णुका मत्स्यरूपसे सूर्यनन्दन मनुको मोहित करना, तत्पश्चात् उन्हें आगामी प्रलयकालकी सूचना देना
ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः
श्रीमद्वेदव्यासप्रणीत
मत्स्यमहापुराण
पहला अध्याय
मङ्गलाचरण, शौनक आदि मुनियोंका सूतजीसे पुराणविषयक प्रश्न, सूतद्वारा मत्स्यपुराणका वर्णणारम्भ, भगवान् विष्णुका मत्स्यरूपसे सूर्यनन्दन मनुको मोहित करना, तत्पश्चात् उन्हें आगामी प्रलयकालकी सूचना देना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रचण्डताण्डवाटोपे प्रक्षिप्ता येन दिग्गजाः।<br>भवन्तु विघ्नभङ्गाय भवस्य चरणाम्बुजाः ॥ १<br><br>पातालादुत्पतिष्णोर्मकरवसतयो यस्य पुच्छाभिघाता-<br>दूर्ध्वं ब्रह्माण्डखण्डव्यतिकरविहितव्यत्ययेनापतन्ति।<br>विष्णोर्मत्स्यावतारे सकलवसुमतीमण्डलं व्यश्नुवाना-<br>स्तस्यास्योदीरितानां ध्वनिरपहरतादश्रियं वः श्रुतीनाम् ॥ २¹ | प्रचण्ड वेगसे प्रवृत्त हुए ताण्डव नृत्यके आवेशमें जिनके द्वारा दिग्गजगण दूर फेंक दिये जाते हैं, उन भगवान् शंकरके चरणकमल (हम सभीके) विघ्नोंका विनाश करें। मत्स्यावतारके समय पाताललोकसे ऊपरको उछलते हुए जिन भगवान् विष्णुकी पूँछके आघातसे समुद्र ऊपरको उछल पड़ते हैं तथा ब्रह्माण्ड-खण्डोंके सम्पर्कसे उत्पन्न हुई अस्त-व्यस्तताके कारण सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलको व्याप्त करके पुनः नीचे गिरते हैं, उन भगवान्के मुखसे उच्चरित हुई श्रुतियोंकी ध्वनि आपलोगोंके अमङ्गलका विनाश करे। |
| नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ ३<br><br>अजोऽपि यः क्रियायोगान्नारायण इति स्मृतः।<br>त्रिगुणाय त्रिवेदाय नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ॥ ४ | नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा सरस्वतीदेवीको नमस्कार कर तत्पश्चात् जय² (महाभारत, पुराण आदि)-का पाठ करना चाहिये। जो अजन्मा होनेपर भी क्रियाके सम्पर्कसे 'नारायण' नामसे स्मरण किये जाते हैं, त्रिगुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) रूप हैं एवं त्रिवेद (ऋक्, यजुः, साम) जिनका स्वरूप है, उन स्वयम्भू भगवान्को नमस्कार है ॥ १–४ ॥ |
| सूतमेकाग्रमासीनं नैमिषारण्यवासिनः।<br>मुनयो दीर्घसत्रान्ते पप्रच्छुर्दीर्घसंहिताम् ॥ ५ | एक बार दीर्घकालिक यज्ञकी समाप्तिके अवसरपर नैमिषारण्यनिवासी शौनक आदि मुनियोंने एकाग्रचित्तसे बैठे हुए सूतजीका बारंबार अभिनन्दन करके उनसे |
१. ग्रन्थकारके दो मङ्गल-श्लोकोंमें शिव-विष्णुकी वन्दनासे ग्रन्थकी गम्भीरता एवं शिव-विष्णु-उभयपरकता सिद्ध होती है। ४। २८ आदिमें भी शिवसे ही सृष्टि निर्दिष्ट है।
२. महाभारतकी नीलकण्ठी व्याख्या एवं भविष्यपुराण १। ४। ८६–८८ के 'अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा। विष्णुधर्मादयो धर्माः शिवधर्माश्च भारत ॥ कार्ष्णं वेदं पञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः। ॰॰॰'जयेति नाम चैतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥'—इस वचनके अनुसार रामायण, महाभारत तथा सभी पुराण, विष्णुधर्म, शिवधर्म आदि 'जय' कहे जाते हैं।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
| १४ | * मत्स्यपुराण * |
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| प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्म्यासु ललितासु च।<br>कथासु शौनकाद्यास्तु अभिनन्द्य मुहुर्मुहुः॥ ६<br><br>कथितानि पुराणानि यान्यस्माकं त्वयानघ।<br>तान्येवामृतकल्पानि श्रोतुमिच्छामहे पुनः॥ ७<br><br>कथं ससर्ज भगवाँल्लोकनाथश्चराचरम्।<br>कस्माच्च भगवान् विष्णुर्मत्स्यरूपत्वमाश्रितः॥ ८<br><br>भैरवत्वं भवस्यापि पुरारित्वं च केन हि।<br>कस्य हेतोः कपालित्वं जगाम वृषभध्वजः॥ ९<br><br>सर्वमेतत् समाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्।<br>त्वद्वाक्येनामृतस्येव न तृप्तिरिह जायते॥ १०<br><br>सूत उवाच<br><br>पुण्यं पवित्रमायुष्यमिदानीं शृणुत द्विजाः।<br>मात्स्यं पुराणमखिलं यज्जगाद गदाधरः॥ ११<br><br>पुरा राजा मनुर्नाम चीर्णवान् विपुलं तपः।<br>पुत्रे राज्यं समारोप्य क्षमावान् रविनन्दनः॥ १२<br><br>मलयस्यैकदेशे तु सर्वात्मगुणसंयुतः।<br>समदुःखसुखो वीरः प्राप्तवान् योगमुत्तमम्॥ १३<br><br>बभूव वरदश्चास्य वर्षायुतशते गते।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच प्रीतः स कमलासनः॥ १४<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् राजा प्रणम्य स पितामहम्।<br>एकमेवाहमिच्छामि त्वत्तो वरमनुत्तमम्॥ १५<br><br>भूतग्रामस्य सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च।<br>भवेयं रक्षणायालं प्रलये समुपस्थिते॥ १६<br><br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तत्रैवान्तरधीयत।<br>पुष्पवृष्टिः सुमहती खात् पपात सुरार्पिता॥ १७ | पुराणसम्बन्धिनी धार्मिक एवं सुन्दर कथाओंके प्रसङ्गमें इस दीर्घसंहिता (अर्थात् मत्स्यपुराण)-के विषयमें इस प्रकारकी जिज्ञासा प्रकट की—'निष्पाप सूतजी! आपने हमलोगोंके प्रति जिन पुराणोंका वर्णन किया है, उन्हीं अमृततुल्य पुराणोंको पुनः श्रवण करनेकी हमलोगोंकी अभिलाषा है। मुने! ऐश्वर्यशाली जगदीश्वरने कैसे इस चराचर विश्वकी सृष्टि की तथा उन भगवान् विष्णुको किस कारण मत्स्यरूप धारण करना पड़ा? साथ ही शंकरजीको भी भैरवत्व एवं पुरारित्वकी पदवी किस निमित्तसे प्राप्त हुई? तथा वे वृषभध्वज कपालमालाधारी कैसे हो गये? सूतजी! इन सबका क्रमशः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि इस विषयमें आपके अमृत-सदृश वचनोंको सुननेसे तृप्ति नहीं हो रही है॥ ५-१०॥<br><br>सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! पूर्वकालमें भगवान् गदाधरने जिस मत्स्यपुराणका वर्णन किया था, इस समय उसीका विवरण (आपलोग) सुनें। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र और आयुवर्धक है। प्राचीनकालमें सूर्यपुत्र महाराज (वैवस्वत) मनुने*, जो क्षमाशील, सम्पूर्ण आत्मगुणोंसे सम्पन्न, सुख-दुःखको समान समझनेवाले एवं उत्कृष्ट वीर थे, पुत्रको राज्य-भार सौंपकर मलयाचलके एक भागमें जाकर घोर तपका अनुष्ठान किया था। वहाँ उन्हें उत्तम योगकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार उनके तप करते हुए करोड़ों वर्ष व्यतीत होनेपर कमलासन ब्रह्मा प्रसन्न होकर वरदातारूपमें प्रकट हुए और राजासे बोले—'वर माँगो!' इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर वे महाराज मनु पितामह ब्रह्माको प्रणाम करके बोले—'भगवन्! मैं आपसे केवल एक सर्वश्रेष्ठ वर माँगना चाहता हूँ। (वह यह है कि) प्रलयके उपस्थित होनेपर मैं सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमरूप जीवसमूहकी रक्षा करनेमें समर्थ हो सकूँ।' तब विश्वात्मा ब्रह्मा 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय आकाशसे देवताओंद्वारा की गयी महती पुष्पवृष्टि होने लगी॥ ११-१७॥ |
* भागवतादिके अनुसार ये सत्यव्रत राजा हैं, जो आगे वैवस्वत मनु हुए हैं।
- अध्याय १ * | १५ --- | ---:
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कदाचिदाश्रमे तस्य कुर्वतः पितृतर्पणम्।<br>पपात पाण्योरुपरि शफरी जलसंयुता ॥ १८<br>दृष्ट्वा तच्छफरीरूपं स दयालुर्महीपतिः।<br>रक्षणायाकरोद् यत्नं स तस्मिन् करकोदरे ॥ १९ | एक समयकी बात है, आश्रममें पितृ-तर्पण करते हुए महाराज मनुकी हथेलीपर जलके साथ ही एक मछली आ गिरी। उस मछलीके रूपको देखकर वे नरेश दयार्द्र हो गये तथा उसे उस कमण्डलुमें डालकर उसकी रक्षाका प्रयत्न करने लगे। |
| अहोरात्रेण चैकेन षोडशाङ्गुलविस्तृतः।<br>सोऽभवन्मत्स्यरूपेण पाहि पाहीति चाब्रवीत् ॥ २० | एक ही दिन-रातमें वह (वहाँ) मत्स्यरूपसे सोलह अङ्गुल बड़ा हो गया और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों कहने लगा। |
| स तमादाय मणिके प्राक्षिपज्जलचारिणम्।<br>तत्रापि चैकरात्रेण हस्तत्रयमवर्धत ॥ २१ | तब राजाने उस जलचारी जीवको मिट्टीके एक बड़े घड़ेमें डाल दिया। वहाँ भी वह एक (ही) रातमें तीन हाथ बढ़ गया। |
| पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम्।<br>स मत्स्यः पाहि पाहीति त्वामहं शरणं गतः ॥ २२ | पुनः उस मत्स्यने सूर्यपुत्र मनुसे आर्तवाणीमें कहा—'राजन्! मैं आपकी शरणमें हूँ; मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' |
| ततः स कूपे तं मत्स्यं प्राहिणोद् रविनन्दनः।<br>यदा न माति तत्रापि कूपे मत्स्यः सरोवरे ॥ २३<br>क्षिप्तोऽसौ पृथुतामागात् पुनर्योजनसम्मिताम्।<br>तत्राप्याह पुनर्दीनः पाहि पाहि नृपोत्तम ॥ २४ | तदनन्तर उन सूर्य-नन्दन (वैवस्वत मनु)-ने उस मत्स्यको कुएँमें रख दिया, परंतु जब वह मत्स्य उस कुएँमें भी न अँट सका, तब राजाने उसे सरोवरमें डाल दिया। वहाँ वह पुनः एक योजन बड़े आकारका हो गया और दीन होकर कहने लगा—'नृपश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' |
| ततः स मनुना क्षिप्तो गङ्गायामप्यवर्धत।<br>यदा तदा समुद्रे तं प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥ २५ | तत्पश्चात् मनुने उसे गङ्गामें छोड़ दिया। जब उसने वहाँ और भी विशाल रूप धारण कर लिया, तब भूपालने उसे समुद्रमें डाल दिया। |
| यदा समुद्रमखिलं व्याप्यासौ समुपस्थितः।<br>तदा प्राह मनुर्भीतः कोऽपि त्वमसुरेश्वरः ॥ २६<br>अथवा वासुदेवस्त्वमन्य ईदृक् कथं भवेत्।<br>योजनायुतविंशत्या कस्य तुल्यं भवेद् वपुः ॥ २७ | जब उस मत्स्यने सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लिया, तब मनुने भयभीत होकर उससे पूछा—'आप कोई असुरराज तो नहीं हैं? अथवा वासुदेव भगवान् हैं, अन्यथा दूसरा कोई ऐसा कैसे हो सकता है? भला, इस प्रकार कई करोड़ योजनोंके समान विस्तारवाला शरीर किसका हो सकता है? |
| ज्ञातस्त्वं मत्स्यरूपेण मां खेदयसि केशव।<br>हृषीकेश जगन्नाथ जगद्धाम नमोऽस्तु ते ॥ २८ | केशव! मुझे ज्ञात हो गया कि 'आप मत्स्यका रूप धारण करके मुझे खिन्न कर रहे हैं। हृषीकेश! आप जगदीश्वर एवं जगत्के निवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है।' |
| एवमुक्तः स भगवान् मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>साधु साध्विति चोवाच सम्यग्ज्ञातस्त्वयानघ ॥ २९ | तब मत्स्यरूपधारी वे भगवान् जनार्दन यों कहे जानेपर बोले—'निष्पाप! ठीक है, ठीक है, तुमने मुझे भलीभाँति पहचान लिया है। |
| अचिरेणैव कालेन मेदिनी मेदिनीपते।<br>भविष्यति जले मग्ना सशैलवनकानना ॥ ३० | भूपाल! थोड़े ही समयमें पर्वत, वन और काननोंके सहित यह पृथ्वी जलमें निमग्न हो जायगी। |
| नौरियं सर्वदेवानां निकायेन विनिर्मिता।<br>महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थं महीपते ॥ ३१ | इस कारण पृथ्वीपते! सम्पूर्ण जीव-समूहोंकी रक्षा करनेके लिये समस्त देवगणोंद्वारा इस नौकाका निर्माण किया गया है। |
| स्वेदण्डजोद्भिदो ये वै ये च जीवा जरायुजाः।<br>अस्यां निधाय सर्वांस्ताननाथान् पाहि सुव्रत ॥ ३२ | सुव्रत! जितने स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज जीव हैं तथा जितने जरायुज जीव हैं, उन सभी अनाथोंको इस नौकामें चढ़ाकर तुम उन सबकी रक्षा करना। |
| युगान्तवाताभिहता यदा भवति नौर्नृप।<br>शृङ्गेऽस्मिन् मम राजेन्द्र तदेमां संयमिष्यसि ॥ ३३ | राजन्! जब युगान्तकी वायुसे आहत होकर यह नौका डगमगाने लगेगी, उस समय राजेन्द्र! तुम उसे मेरे इस सींगमें बाँध देना। |
२- मनुका मत्स्यभगवान्से युगान्तविषयक प्रश्न, मत्स्यका प्रलयके स्वरूपका वर्णन करके अन्तर्धान हो जाना, प्रलयकाल उपस्थित होनेपर मनुका जीवोंको नौकापर चढ़ाकर उसे महामत्स्यके सींगमें शेषनागकी रस्सीसे बाँधना एवं उनसे सृष्टि आदिके विषयमें विविध प्रश्न करना और मत्स्यभगवान्का उत्तर देना
१६ * मत्स्यपुराण *
| ततो लयान्ते सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च।<br>प्रजापतित्वं भविता जगतः पृथिवीपते॥ ३४<br><br>एवं कृतयुगस्यादौ सर्वज्ञो धृतिमान् नृपः।<br>मन्वन्तराधिपश्चापि देवपूज्यो भविष्यसि॥ ३५ | तदनन्तर पृथिवीपते! प्रलयकी समाप्तिमें तुम जगत्के समस्त स्थावर-जङ्गम प्राणियोंके प्रजापति होओगे। इस प्रकार कृतयुगके प्रारम्भमें सर्वज्ञ एवं धैर्यशाली नरेशके रूपमें तुम मन्वन्तरके भी अधिपति होओगे, उस समय देवगण तुम्हारी पूजा करेंगे॥ १८–३५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मनुमत्स्यसंवादे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें मनु-विष्णु-संवादमें प्रथम अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १॥
दूसरा अध्याय
मनुका मत्स्यभगवान्से युगान्तविषयक प्रश्न, मत्स्यका प्रलयके स्वरूपका वर्णन करके अन्तर्धान हो जाना, प्रलयकाल उपस्थित होनेपर मनुका जीवोंको नौकापर चढ़ाकर उसे महामत्स्यके सींगमें शेषनागकी रस्सीसे बाँधना एवं उनसे सृष्टि आदिके विषयमें विविध प्रश्न करना और मत्स्यभगवान्का उत्तर देना
| सूत उवाच<br>एवमुक्तो मनुस्तेन पप्रच्छ मधुसूदनम्।<br>भगवन् कियद्भिर्वर्षैर्भविष्यत्यन्तरक्षयः॥ १<br>सत्त्वानि च कथं नाथ रक्षिष्ये मधुसूदन।<br>त्वया सह पुनर्योगः कथं वा भविता मम॥ २<br><br>मत्स्य उवाच<br>अद्यप्रभृत्यनावृष्टिर्भविष्यति महीतले।<br>यावद् वर्षशतं साग्रं दुर्भिक्षमशुभावहम्॥ ३<br>ततोऽल्पसत्त्वक्षयदा रश्मयः सप्त दारुणाः।<br>सप्तसप्तेर्भविष्यन्ति प्रतप्ताङ्गारवर्षिणः॥ ४<br>और्वानलोऽपि विकृतिं गमिष्यति युगक्षये।<br>विषाग्निश्चापि पातालात् संकर्षणमुखाच्च्युतः।<br>भवस्यापि ललाटोत्थतृतीयनयनानलः॥ ५<br>त्रिजगन्निर्दहन् क्षोभं समेष्यति महामुने।<br>एवं दग्धा मही सर्वा यदा स्याद् भस्मसंनिभा॥ ६<br>आकाशमूष्मणा तप्तं भविष्यति परंतप।<br>ततः सदेवनक्षत्रं जगद् यास्यति संक्षयम्॥ ७<br>संवर्तो भीमनादश्च द्रोणश्चण्डो बलाहकः।<br>विद्युत्पताकः शोणस्तु सप्तैते लयवारिदाः॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् मत्स्यद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मनुने उन मधुसूदनसे प्रश्न किया—'भगवन्! यह युगान्त-प्रलय कितने वर्षों बाद आयेगा? नाथ! मैं सम्पूर्ण जीवोंकी रक्षा किस प्रकार कर सकूँगा? तथा मधुसूदन! आपके साथ मेरा पुनः सम्मिलन कैसे हो सकेगा?'॥ १-२॥<br><br>मत्स्यभगवान् कहने लगे—'महामुने! आजसे लेकर सौ वर्षतक इस भूतलपर वृष्टि नहीं होगी, जिसके फलस्वरूप परम अमाङ्गलिक एवं अत्यन्त भयंकर दुर्भिक्ष आ पड़ेगा। तदनन्तर युगान्त प्रलयके उपस्थित होनेपर तपे हुए अंगारकी वर्षा करनेवाली सूर्यकी सात भयंकर किरणें छोटे-मोटे जीवोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हो जायँगी। बडवानल भी अत्यन्त भयानक रूप धारण कर लेगा। पाताललोकसे ऊपर उठकर संकर्षणके मुखसे निकली हुई विषाग्नि तथा भगवान् रुद्रके ललाटसे उत्पन्न तीसरे नेत्रकी अग्नि भी तीनों लोकोंको भस्म करती हुई भभक उठेगी। परंतप! इस प्रकार जब सारी पृथ्वी जलकर राखकी ढेर बन जायगी और गगन-मण्डल ऊष्मासे संतप्त हो उठेगा, तब देवताओं और नक्षत्रोंसहित सारा जगत् नष्ट हो जायगा। उस समय संवर्त, भीमनाद, द्रोण, चण्ड, बलाहक, विद्युत्पताक और शोण नामक जो ये सात प्रलयकारक मेघ हैं, ये सभी |
* अध्याय २ * १७
| अग्निप्रस्वेदसम्भूतां प्लावयिष्यन्ति मेदिनीम्।<br>समुद्राः क्षोभमागत्य चैकत्वेन व्यवस्थिताः॥ ९<br>एतदेकार्णवं सर्वं करिष्यन्ति जगत्त्रयम्।<br>वेदनावमिमां गृह्य सत्त्वबीजानि सर्वशः॥ १०<br>आरोप्य रज्जुयोगेन मत्प्रदत्तेन सुव्रत।<br>संयम्य नावं मच्छृङ्गे मत्प्रभावाभिरक्षितः॥ ११<br>एकः स्थास्यसि देवेषु दग्धेष्वपि परंतप।<br>सोमसूर्यावहं ब्रह्मा चतुर्लोकसमन्वितः॥ १२<br>नर्मदा च नदी पुण्या मार्कण्डेयो महानृषिः।<br>भवो वेदाः पुराणानि विद्याभिः सर्वतोवृतम्॥ १३<br>त्वया सार्धमिदं विश्वं स्थास्यत्यन्तरसंक्षये।<br>एवमेकार्णवे जाते चाक्षुषान्तरसंक्षये॥ १४<br>वेदान् प्रवर्तयिष्यामि त्वत्सर्गादौ महीपते।<br>एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १५<br>मनुरप्यास्थितो योगं वासुदेवप्रसादजम्।<br>अभ्यसन् यावदाभूतसम्प्लवं पूर्वसूचितम्॥ १६ | अग्निके प्रस्वेदसे उत्पन्न हुए जलकी घोर वृष्टि करके सारी पृथ्वीको आप्लावित कर देंगे। तब सातों समुद्र क्षुब्ध होकर एकमेक हो जायँगे और इन तीनों लोकोंको पूर्णरूपसे एकार्णवके आकारमें परिणत कर देंगे। सुव्रत! उस समय तुम इस वेदरूपी नौकाको ग्रहण करके इसपर समस्त जीवों और बीजोंको लाद देना तथा मेरे द्वारा प्रदान की गयी रस्सीके बन्धनसे इस नावको मेरे सींगमें बाँध देना। परंतप! (ऐसे भीषण कालमें जब कि) सारा देव-समूह जलकर भस्म हो जायगा तो भी मेरे प्रभावसे सुरक्षित होनेके कारण एकमात्र तुम्हीं अवशेष रह जाओगे। इस आन्तर-प्रलयमें सोम, सूर्य, मैं, चारों लोकोंसहित ब्रह्मा, पुण्यतोया नर्मदा नदी, महर्षि मार्कण्डेय, शंकर, चारों वेद, विद्याओंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए पुराण और तुम्हारे साथ यह (नौका-स्थित) विश्व—ये ही बचेंगे। महीपते! चाक्षुष-मन्वन्तरके प्रलयकालमें जब इसी प्रकार सारी पृथ्वी एकार्णवमें निमग्न हो जायगी और तुम्हारे द्वारा सृष्टिका प्रारम्भ होगा, तब मैं वेदोंका (पुनः) प्रवर्तन करूँगा।' ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य वहीं अन्तर्धान हो गये तथा मनु भी वहीं स्थित रहकर भगवान् वासुदेवकी कृपासे प्राप्त हुए योगका तबतक अभ्यास करते रहे, जबतक पूर्वसूचित प्रलयका समय उपस्थित न हुआ॥ ३—१६॥ |
| काले यथोक्ते सञ्जाते वासुदेवमुखोद्गते।<br>शृङ्गी प्रादुर्बभूवाथ मत्स्यरूपी जनार्दनः॥ १७<br>भुजङ्गो रज्जुरूपेण मनोः पार्श्वमुपागमत्।<br>भूतान् सर्वान् समाकृष्य योगेनारोप्य धर्मवित्॥ १८<br>भुजङ्गरज्ज्वा मत्स्यस्य शृङ्गे नावमयोजयत्।<br>उपर्युपस्थितस्तस्याः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १९<br>आभूतसम्प्लवे तस्मिन्नतीते योगशायिना।<br>पृष्टेन मनुना प्रोक्तं पुराणं मत्स्यरूपिणा।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः॥ २०<br>यद् भवद्भिः पुरा पृष्टः सृष्ट्यादिकमहं द्विजाः।<br>तदेवैकार्णवे तस्मिन् मनुः पप्रच्छ केशवम्॥ २१ | तदनन्तर भगवान् वासुदेवके मुखसे कहे गये पूर्वोक्त प्रलयकालके उपस्थित होनेपर भगवान् जनार्दन एक सींगवाले मत्स्यके रूपमें प्रादुर्भूत हुए। उसी समय एक सर्प भी रज्जु-रूपसे बहता हुआ मनुके पार्श्वभागमें आ पहुँचा। तब धर्मज्ञ मनुने अपने योगबलसे समस्त जीवोंको खींचकर नौकापर लाद लिया और उसे सर्परूपी रस्सीसे मत्स्यके सींगमें बाँध दिया। तत्पश्चात् भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके वे स्वयं भी उस नौकापर बैठ गये। श्रेष्ठ ऋषियो! इस प्रकार उस अतीत प्रलयके अवसरपर योगाभ्यासी मनुद्वारा पूछे जानेपर मत्स्यरूपी भगवान्ने जिस पुराणका वर्णन किया था, उसीका मैं इस समय आपलोगोंके समक्ष प्रवचन करूँगा, सावधान होकर श्रवण कीजिये। द्विजवरो! पहले आपलोगोंने मुझसे जिस सृष्टि आदिके विषयमें प्रश्न किया है, उन्हीं विषयोंको उस एकार्णवके समय मनुने भी भगवान् केशवसे पूछा था॥ १७—२१॥ |
| १८ | * मत्स्यपुराण * |
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| मनुरुवाच | मनुने पूछा— भगवन्! सृष्टिकी उत्पत्ति और उसका संहार, मानव-वंश, मन्वन्तर, मानव-वंशमें उत्पन्न हुए लोगोंके चरित्र, भुवनका विस्तार, दान और धर्मकी विधि, सनातन श्राद्धकल्प, वर्ण और आश्रमका विभाग, इष्टापूर्त (वापी, कूप, तड़ाग आदि)-के निर्माणकी विधि और देवताओंकी प्रतिष्ठा आदि तथा और भी जो कोई धार्मिक विषय भूतलपर विद्यमान हैं, उन सभीका आप मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥२२—२४॥ | | उत्पत्तिं प्रलयं चैव वंशान् मन्वन्तराणि च।<br>वंश्यानुचरितं चैव भुवनस्य च विस्तरम्॥ २२<br>दानधर्मविधिं चैव श्राद्धकल्पं च शाश्वतम्।<br>वर्णाश्रमविभागं च तथेष्टापूर्तसंज्ञितम्॥ २३<br>देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद् विद्यते भुवि।<br>तत्सर्वं विस्तरेण त्वं धर्मं व्याख्यातुमर्हसि॥ २४ | | | मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे— महाप्रलयके समयका अवसान होनेपर यह सारा स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् सोये हुएकी भाँति अन्धकारसे आच्छन्न था। न तो इसके विषयमें कोई कल्पना ही की जा सकती थी, न कोई वस्तु जानी ही जा सकती थी, न किसी वस्तुका कोई चिह्न ही अवशेष था। सभी वस्तुएँ विस्मृत हो चुकी थीं। कोई ज्ञातव्य वस्तु रह ही नहीं गयी थी। तदनन्तर जो पुण्यकर्मोंके उत्पत्ति-स्थान तथा निराकार हैं, वे स्वयम्भूभगवान् इस समस्त जगत्को प्रकट करनेके अभिप्रायसे अन्धकारका भेदन करके प्रादुर्भूत हुए। उस समय जो इन्द्रियोंसे परे, परात्पर, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्से भी महान्, अविनाशी और नारायण नामसे विख्यात हैं, वे स्वयं अकेले ही आविर्भूत हुए। उन्होंने अपने शरीरसे अनेक प्रकारके जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे (पूर्वसृष्टिका) भलीभाँति ध्यान करके प्रथमतः जलकी ही रचना की और उसमें (अपने वीर्यस्वरूप) बीजका निक्षेप किया। वही बीज एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सुवर्ण एवं रजतमय अण्डेके रूपमें परिणत हो गया, उसकी कान्ति दस सहस्र सूर्योंके सदृश थी। तत्पश्चात् महातेजस्वी स्वयम्भू स्वयं ही उस अण्डेके भीतर प्रविष्ट हो गये तथा अपने प्रभावसे एवं उस अण्डेमें सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण वे पुनः विष्णुभावको प्राप्त हो गये। तदनन्तर उस अण्डेके भीतर सर्वप्रथम ये भगवान् सूर्य उत्पन्न हुए, जो आदिसे प्रकट होनेके कारण 'आदित्य' और वेदोंका पाठ करनेसे 'ब्रह्मा' नामसे विख्यात हुए। उन्होंने ही उस अण्डेको दो भागोंमें विभक्त कर स्वर्गलोक और भूतलकी रचना की तथा उन दोनोंके मध्यमें सम्पूर्ण दिशाओं और अविनाशी आकाशका निर्माण किया। उस समय उस अण्डेके जरायु-भागसे मेरु आदि सातों पर्वत प्रकट हुए और जो उल्ब (गर्भाशय) था, वह विद्युतसमूहसहित मेघमण्डलके रूपमें परिणत हुआ तथा उसी अण्डेसे नदियाँ, पितृगण और मनुसमुदाय उत्पन्न हुए। नाना रत्नोंसे परिपूर्ण जो ये लवण, इक्षु, सुरा आदि सातों समुद्र हैं, वे भी उस अण्डेके अन्तःस्थित जलसे प्रकट हुए। | | महाप्रलयकालान्त एतदासीत् तमोमयम्।<br>प्रसुप्तमिव चातर्क्यमप्रज्ञातमलक्षणम्॥ २५<br>अविज्ञेयमविज्ञातं जगत् स्थास्नु चरिष्णु च।<br>ततः स्वयम्भूव्यक्तः प्रभवः पुण्यकर्मणाम्॥ २६<br>व्यञ्जयन्नेतदखिलं प्रादुरासीत् तमोनुदः।<br>योऽतीन्द्रियः परो व्यक्तादणुर्ज्यायान् सनातनः।<br>नारायण इति ख्यातः स एकः स्वयमुद्बभौ॥ २७<br>यः शरीरादभिध्याय सिसृक्षुर्विविधं जगत्।<br>अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ २८<br>तदेवाण्डं समभवद्धेमरूप्यमयं महत्।<br>संवत्सरसहस्रेण सूर्य्यायुतसमप्रभम्॥ २९<br>प्रविश्यान्तर्महातेजाः स्वयमेवात्मसम्भवः।<br>प्रभावादपि तद्व्याप्त्या विष्णुत्वमगमत् पुनः॥ ३०<br>तदन्तर्भगवानेश सूर्यः समभवत् पुरा।<br>आदित्यश्चादिभूतत्वाद् ब्रह्मा ब्रह्म पठन्नभूत्॥ ३१<br>दिवं भूमिं समकरोत् तदण्डशकलद्वयम्।<br>स चाकरोद्दिशः सर्वा मध्ये व्योम च शाश्वतम्॥ ३२<br>जरायुर्मेरुमुख्याश्च शैलास्तस्याभवंस्तदा।<br>यदल्बं तदभून्मेघस्तडित्सङ्घातमण्डलम्॥ ३३<br>नद्योऽण्डनाभ्रः सम्भूताः पितरो मनवस्तथा।<br>सप्त येऽमी समुद्राश्च तेऽपि चान्तर्जलोद्भवाः।<br>लवणेक्षुसुराद्याश्च नानारत्नसमन्विताः॥ ३४ | |
३- मनुका मत्स्यभगवान्से ब्रह्माके चतुर्मुख होने तथा लोकोंकी सृष्टि करनेके विषयमें प्रश्न एवं मत्स्यभगवान्द्वारा उत्तररूपमें ब्रह्मासे वेद, सरस्वती, पाँचवें मुख और मनु आदिकी उत्पत्तिका कथन
| * अध्याय ३ * | १९ |
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| स सिसृक्षुरभूद् देवः प्रजापतिररिंदम।<br>तत्तेजसश्च तत्रैष मार्तण्डः समजायत॥ ३५<br>मृतेऽण्डे जायते यस्मान्मार्तण्डस्तेन संस्मृतः।<br>रजोगुणमयं यत्तद्रूपं तस्य महात्मनः।<br>चतुर्मुखः स भगवानभूल्लोकपितामहः॥ ३६<br>येन सृष्टं जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>तमवेहि रजोरूपं महत्सत्त्वमुदाहृतम्॥ ३७ | शत्रुदमन! जब उन प्रजापति देवको सृष्टि रचनेकी इच्छा हुई, तब वहीं उनके तेजसे ये मार्तण्ड (सूर्य) प्रादुर्भूत हुए। चूँकि ये अण्डेके मृत हो जानेके पश्चात् उत्पन्न हुए थे, इसलिये 'मार्तण्ड' नामसे प्रसिद्ध हुए। उन महात्माका जो रजोगुणमय रूप था, वह लोकपितामह चतुर्मुख भगवान् ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुआ। जिन्होंने देवता, असुर और मानवसहित समस्त जगत्की रचना की, उन्हें तुम रजोगुणरूप सुप्रसिद्ध महान् सत्त्व समझो॥ २५—३७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मनुमत्स्यसंवादवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गेमें मनुमत्स्यसंवादवर्णन नामक दूसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २॥
तीसरा अध्याय
मनुका मत्स्यभगवान्से ब्रह्माके चतुर्मुख होने तथा लोकोंकी सृष्टि करनेके विषयमें प्रश्न एवं मत्स्यभगवान्द्वारा उत्तररूपमें ब्रह्मासे वेद, सरस्वती, पाँचवें मुख और मनु आदिकी उत्पत्तिका कथन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा— |
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| चतुर्मुखत्वमगमत् कस्माल्लोकपितामहः।<br>कथं तु लोकानसृजद् ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः॥ १ | भगवान्! ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ लोक-पितामह ब्रह्मा चतुर्मुख कैसे हुए तथा उन्होंने (सभी) लोकोंकी रचना किस प्रकार की?॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे— |
| तपश्चचार प्रथमममराणां पितामहः।<br>आविर्भूतास्ततो वेदाः साङ्गोपाङ्गपदक्रमाः॥ २ | राजर्षे! देवताओंके पितामह ब्रह्माने पहले बड़ा ही कठोर तप किया था, जिसके प्रभावसे अङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द), उपाङ्ग (पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र), पद (वैदिक मन्त्रोंका पद-पाठ निर्धारित करना) और क्रम (वेद-पाठकी एक विशेष प्रणाली)-सहित वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ। |
| पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।<br>नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ३ | सम्पूर्ण शास्त्रोंकी उत्पत्तिके पूर्व ब्रह्माने उस पुराणका स्मरण किया, जो अविनाशी, शब्दमय, पुण्यशाली एवं सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तृत है। |
| अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिःसृताः।<br>मीमांसान्यायविद्याश्च प्रमाणाष्टकसंयुताः॥ ४ | तदनन्तर ब्रह्माके मुखोंसे वेद, आठ प्रमाणोंसहित* मीमांसा और न्यायशास्त्रका आविर्भाव हुआ। |
| वेदाभ्यासरतस्यास्य प्रजाकामस्य मानसाः।<br>मनसः पूर्वसृष्टा वै जाता यत् तेन मानसाः॥ ५ | तत्पश्चात् वेदाभ्यासमें निरत रहनेवाले ब्रह्माने पुत्र उत्पन्न करनेकी कामनासे युक्त होकर पूर्वनिर्धारित दस मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया। मानसिक संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण वे सभी मानस पुत्रके नामसे प्रख्यात हुए। |
| मरीचिरभवत् पूर्वं ततोऽत्रिर्भगवानृषिः।<br>अङ्गिराश्चाभवत् पश्चात् पुलस्त्यस्तदनन्तरम्॥ ६ | उन पुत्रोंमें सर्वप्रथम मरीचि, तदनन्तर ऐश्वर्यशाली महर्षि अत्रि हुए। पुनः अङ्गिरा और उनके बाद पुलस्त्य हुए। |
* पौराणिकोंके आठ प्रमाण ये हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द (आप्तवचन), अनुपलब्धि, अर्थापत्ति, ऐतिह्य और स्वभाव। (सर्वदर्शनसंग्रह)
| २० | * मत्स्यपुराण * |
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| ततः पुलहनामा वै ततः क्रतुरजायत ।<br>प्रचेताश्च ततः पुत्रो वसिष्ठश्चाभवत् पुनः ॥ ७<br>पुत्रो भृगुरभूत् तद्वन्नारदोऽप्यचिरादभूत् ।<br>दशेमान् मानसान् ब्रह्मा मुनीन् पुत्रानजीजनत् ॥ ८<br>शारीरानथ वक्ष्यामि मातृहीनान् प्रजापतेः ।<br>अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्षः प्रजापतिरजायत ॥ ९<br>धर्मः स्तनान्तादभवद्धृदयात् कुसुमायुधः ।<br>भ्रूमध्यादभवत् क्रोधो लोभश्चाधरसम्भवः ॥ १०<br>बुद्धेर्मोहः समभवदहंकारादभून्मदः ।<br>प्रमोदश्चाभवत् कण्ठान्मृत्युर्लोचनतो नृप ॥ ११<br>भरतः करमध्यात्तु ब्रह्मसूनुरभूत्ततः ।<br>एते नव सुता राजन् कन्या च दशमी पुनः ।<br>अङ्गजा इति विख्याता दशमी ब्रह्मणः सुता ॥ १२ | तदनन्तर पुलह और तत्पश्चात् क्रतु उत्पन्न हुए। उसके बाद प्रचेता नामक पुत्र हुए। पुनः वसिष्ठजीका जन्म हुआ। तत्पश्चात् भृगु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए तथा शीघ्र ही नारदका भी आविर्भाव हुआ। इन्हीं दस पुत्रोंको ब्रह्माने अपने मनसे उत्पन्न किया, जो सभी मुनि-रूपसे विख्यात हुए। राजन्! अब मैं ब्रह्माके शरीरसे उत्पन्न हुए मातृ-विहीन पुत्रोंका वर्णन करता हूँ। प्रजापति ब्रह्माके दाहिने अँगूठेसे दक्ष प्रजापति प्रकट हुए। उनके स्तनान्तभागसे धर्म और हृदयसे कुसुमायुध (कामदेव)-का जन्म हुआ। भ्रूमध्यसे क्रोध और होंठसे लोभकी उत्पत्ति हुई। बुद्धिसे मोहका तथा अहंकारसे मदका जन्म हुआ। कण्ठसे प्रमोद और नेत्रोंसे मृत्युकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् हथेलीसे ब्रह्मपुत्र भरत* प्रकट हुए। राजन्! ये नौ पुत्र ब्रह्माके शरीरसे प्रकट हुए हैं। ब्रह्माकी दसवीं संतान (एक) कन्या है, जो अङ्गजा नामसे विख्यात हुई॥ २—१२॥ | | <div align="center">मनुरुवाच</div>बुद्धेर्मोहः समभवदिति यत् परिकीर्तितम् ।<br>अहंकारः स्मृतः क्रोधो बुद्धिर्नाम किमुच्यते ॥ १३ | **मनुने पूछा—**भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि बुद्धिसे मोहकी उत्पत्ति हुई और (इसी प्रसङ्गमें) अहंकार, क्रोध एवं बुद्धिका भी नाम लिया, सो ये सब क्या हैं? (इनपर प्रकाश डालिये)॥ १३॥ | | <div align="center">मत्स्य उवाच</div>सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम् ।<br>साम्यावस्थितिरेतेषां प्रकृतिः परिकीर्तिता ॥ १४<br>केचित् प्रधानमित्याहुरव्यक्तमपरे जगुः ।<br>एतदेव प्रजासृष्टिं करोति विकरोति च ॥ १५<br>गुणेभ्यः क्षोभमाणेभ्यस्त्रयो देवा विजज्ञिरे ।<br>एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ १६<br>सविकारात् प्रधानात्तु महत्तत्त्वं प्रजायते ।<br>महानिति यतः ख्यातिर्लोकानां जायते सदा ॥ १७<br>अहंकारश्च महतो जायते मानवर्धनः ।<br>इन्द्रियाणि ततः पञ्च वक्ष्ये बुद्धिवशानि तु ।<br>प्रादुर्भवन्ति चान्यानि तथा कर्मवशानि तु ॥ १८ | **मत्स्यभगवान् कहने लगे—**राजर्षे! सत्त्व, रजस् और तमस्—जो ये तीनों गुण बतलाये गये हैं, इनकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहा जाता है। कुछ लोग इसे प्रधान कहते हैं। दूसरे लोग इसे अव्यक्त नामसे भी निर्देश करते हैं। यही प्रकृति प्रजाकी सृष्टि करती है और (यही सृष्टिको) बिगाड़ती भी है। इन्हीं तीनों गुणोंके क्षुब्ध होनेपर इनसे तीन देवता उत्पन्न होते हैं। इन (तीनों देवों)-की मूर्ति तो एक ही है, परंतु वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—इन तीन देवताओंके रूपमें विभक्त हो जाती है। तदनन्तर प्रधानके विकृत होनेपर उससे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है, जिससे लोकोंके मध्यमें उसकी सदा 'महान्' रूपसे ख्याति होती है। उस महत्तत्त्वसे मानको बढ़ानेवाला अहंकार प्रकट होता है। उस अहंकारसे दस इन्द्रियाँ आविर्भूत होती हैं, जिनमें पाँच बुद्धि (ज्ञान)-के वशीभूत रहती हैं और दूसरी पाँच कर्मके अधीन रहती हैं। |
* भारतमें भरत नामके कई प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। ये भरतमुनि हैं, जो 'नाट्यवेद' या 'भरतनाट्यम्' के प्रवर्तक माने जाते हैं।
| * अध्याय ३ * | २१ |
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| श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका च यथाक्रमम्।<br>पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चेतीन्द्रियसंग्रहः ॥ १९<br><br>शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः।<br>उत्सर्गानन्दनादानगत्यालापाश्च तत्क्रियाः ॥ २०<br><br>मन एकादशं तेषां कर्मबुद्धिगुणान्वितम्।<br>इन्द्रियावयवाः सूक्ष्मास्तस्य मूर्तिं मनीषिणः ॥ २१<br><br>श्रयन्ति यस्मात् तन्मात्राः शरीरं तेन संस्मृतम्।<br>शरीरयोगाज्जीवोऽपि शरीरी गद्यते बुधैः ॥ २२<br><br>मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया।<br>आकाशं शब्दतन्मात्राद्भूच्छब्दगुणात्मकम् ॥ २३<br><br>आकाशविकृतेर्वायुः शब्दस्पर्शगुणोऽभवत्।<br>वायोश्च स्पर्शतन्मात्रात्तेजश्चाविरभूत्ततः ॥ २४<br><br>त्रिगुणं तद्विकारेण तच्छब्दस्पर्शरूपवत्।<br>तेजोविकारादभवद् वारि राजंश्चतुर्गुणम् ॥ २५<br><br>रसतन्मात्रसम्भूतं प्रायो रसगुणात्मकम्।<br>भूमिस्तु गन्धतन्मात्रादभूत् पञ्चगुणान्विता ॥ २६<br><br>प्रायो गन्धगुणा सा तु बुद्धिरेषा गरीयसी।<br>एभिः सम्पादितं भुङ्क्ते पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ २७<br><br>ईश्वरेच्छावशः सोऽपि जीवात्मा कथ्यते बुधैः।<br>एवं षड्विंशकं प्रोक्तं शरीरमिह मानवैः ॥ २८<br><br>सांख्यं संख्यात्मकत्वाच्च कपिलादिभिरुच्यते।<br>एतत्तत्त्वात्मकं कृत्वा जगद् वेधा अजीजनत् ॥ २९<br><br>सावित्रीं लोकसृष्ट्यर्थं हृदि कृत्वा समास्थितः।<br>ततः संजपतस्तस्य भित्त्वा देहमकल्मषम् ॥ ३०<br><br>स्त्रीरूपमर्धमकरोदर्धं पुरुषरूपवत्।<br>शतरूपा च सा ख्याता सावित्री च निगद्यते ॥ ३१ | इस इन्द्रिय-समुदायमें क्रमशः श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा पायु (गुदा), उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), हस्त, पाद और वाणी—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इन दसों इन्द्रियोंके क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, उत्सर्ग (मल एवं अपानवायु आदिका त्याग), आनन्दन (आनन्दप्रदान), आदान (ग्रहण करना), गमन और आलाप—ये दस कार्य हैं। इन दसों इन्द्रियोंके अतिरिक्त मननामक ग्यारहवीं इन्द्रिय है, जिसमें कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंके समस्त गुण वर्तमान हैं। इन इन्द्रियोंके जो सूक्ष्म अवयव उस मनीषीके शरीरका आश्रय लेते हैं, वे तन्मात्र कहलाते हैं और जिसके सम्पर्कसे तन्मात्रकी उत्पत्ति होती है, उसे शरीर कहा जाता है। उस शरीरका सम्बन्ध होनेके कारण विद्वान्लोग जीवको भी 'शरीरी' कहते हैं। जब सृष्टि करनेकी इच्छासे मनको प्रेरित किया जाता है, तब वही सृष्टिकी रचना करता है। उस समय शब्दतन्मात्रसे शब्दरूप गुणवाला आकाश प्रकट होता है। इसी आकाशके विकृत होनेपर वायुकी उत्पत्ति होती है, जो शब्द और स्पर्श—दो गुणोंवाली है। तत्पश्चात् वायु और स्पर्शतन्मात्रसे तेजका आविर्भाव होता है, जो शब्द, स्पर्श और रूपनामक तीन विकारोंसे युक्त होनेके कारण त्रिगुणात्मक हुआ। राजन्! इस त्रिगुणात्मक तेजमें विकार उत्पन्न होनेसे चार गुणोंवाले जलका प्राकट्य होता है, जो रस-तन्मात्रसे उद्भूत होनेके कारण प्रायः रसगुणप्रधान ही होता है। तत्पश्चात् पाँच गुणोंसे सम्पन्न पृथ्वीका प्रादुर्भाव होता है। वह प्रायः गन्ध-गुणसे ही युक्त रहती है। यही (इन सबका यथार्थ ज्ञान रखना ही) श्रेष्ठ बुद्धि है। इन्हीं चौबीस (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्र, एक मन, एक बुद्धि, एक अव्यक्त, अहंकार) तत्त्वोंद्वारा सम्पादित सुख-दुःखात्मक कर्मका पचीसवाँ पुरुषनामक तत्त्व भोग करता है। वह भी ईश्वरकी इच्छाके वशीभूत रहता है, इसीलिये विद्वान्लोग उसे जीवात्मा कहते हैं। इस प्रकार इस मानव-योनिमें यह शरीर छब्बीस तत्त्वोंसे संयुक्त बतलाया जाता है। कपिल आदि महर्षियोंने संख्यात्मक होनेके कारण इसे 'सांख्य' (ज्ञान) नामसे अभिहित किया है तथा इन्हीं तत्त्वोंका आश्रय लेकर ब्रह्माने जगत्की रचना की है॥ १४—२९॥<br><br>जब ब्रह्माने जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे हृदयमें सावित्रीका ध्यान करके तपश्चरण प्रारम्भ किया। उस समय जप करते हुए उनका निष्पाप शरीर दो भागोंमें विभक्त हो गया। उनमें आधा भाग स्त्रीरूप और आधा पुरुषरूप हो गया। |
| २२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| सरस्वत्यथ गायत्री ब्रह्माणी च परंतप।<br>ततः स्वदेहसम्भूतामात्मजामित्यकल्पयत्॥ ३२<br>दृष्ट्वा तां व्यथितस्तावत् कामबाणार्दितो विभुः।<br>अहो रूपमहो रूपमिति चाह प्रजापतिः॥ ३३<br>ततो वसिष्ठप्रमुखा भगिनीमिति चुक्रुशुः।<br>ब्रह्मा न किंचिद् ददृशे तन्मुखालोकनादृते॥ ३४<br>अहो रूपमहो रूपमिति प्राह पुनः पुनः।<br>ततः प्रणामनम्रां तां पुनरेवाभ्यलोकयत्॥ ३५<br>अथ प्रदक्षिणं चक्रे सा पितुर्वरवर्णिनी।<br>पुत्रेभ्यो लज्जितस्यास्य तद्रूपालोकनेच्छया॥ ३६<br>आविर्भूतं ततो वक्त्रं दक्षिणं पाण्डुगण्डवत्।<br>विस्मयस्फुरदोष्ठं च पाश्चात्यमुदगात्ततः॥ ३७<br>चतुर्थमभवत् पश्चाद् वामं कामशरातुरम्।<br>ततोऽन्यदभवत्तस्य कामातुरतया तथा॥ ३८<br>उत्पतन्त्यास्तदाकारा अवलोकनकुतूहलात्।<br>सृष्ट्यर्थं यत् कृतं तेन तपः परमदारुणम्॥ ३९<br>तत् सर्वं नाशमगमत् स्वसुतोपगमेच्छया।<br>तेनोर्ध्वं वक्त्रमभवत् पञ्चमं तस्य धीमतः।<br>आविर्भवज्जटाभिश्च तद् वक्त्रं चावृणोत् प्रभुः॥ ४० | परंतप! वह स्त्री सरस्वती, 'शतरूपा' नामसे विख्यात हुई। वही सावित्री, गायत्री और ब्रह्माणी भी कही जाती है। इस प्रकार ब्रह्माने अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाली सावित्रीको अपनी पुत्रीके रूपमें स्वीकार किया; परंतु तत्काल ही उस सावित्रीको देखकर वे सर्वश्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा मुग्ध हो उठे और यों कहने लगे—'कैसा मनोहर रूप है! कैसा सौन्दर्यशाली रूप है।' ब्रह्माको सावित्रीके मुखकी ओर अवलोकन करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं दीखता था। वे बारंबार यही कह रहे थे—'कैसा अद्भुत रूप है! कैसी अनोखी सुन्दरता है!' तत्पश्चात् जब सावित्री झुककर उन्हें प्रणाम करने लगी, तब ब्रह्मा पुनः उसे देखने लगे। तदनन्तर सुन्दरी सावित्रीने अपने पिता ब्रह्माकी प्रदक्षिणा की। इसी समय सावित्रीके रूपका अवलोकन करनेकी इच्छा होनेके कारण ब्रह्माके मुखके दाहिने पार्श्वमें पीले गण्डस्थलोंवाला (एक दूसरा) नूतन मुख प्रकट हो गया! पुनः विस्मययुक्त एवं फड़कते हुए होंठोंवाला दूसरा (तीसरा) मुख पीछेकी ओर उद्भूत हुआ तथा उनकी बायीं ओर कामदेवके बाणोंसे व्यथित-से देखनेवाले एक अन्य (चौथे) मुखका आविर्भाव हुआ। सावित्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेके कारण ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचनाके लिये जो अत्यन्त उग्र तप किया गया था, उसका सारा फल नष्ट हो गया तथा उसी पापके परिणामस्वरूप बुद्धिमान् ब्रह्माके मुखके ऊपर एक पाँचवाँ मुख आविर्भूत हुआ, जो जटाओंसे व्याप्त था। ऐश्वर्यशाली ब्रह्माने उस मुखको भी वरण (स्वीकार) कर लिया॥ ३०—४०॥ |
| ततस्तानब्रवीद् ब्रह्मा पुत्रानात्मसमुद्भवान्।<br>प्रजाः सृजध्वमभितः सदेवासुरमानुषीः॥ ४१<br>एवमुक्तास्ततः सर्वे ससृजुर्विविधाः प्रजाः।<br>गतेषु तेषु सृष्ट्यर्थं प्रणामावनतामिमाम्॥ ४२<br>उपयेमे स विश्वात्मा शतरूपामनिन्दिताम्।<br>सम्बभूव तया सार्धमतिकामातुरो विभुः।<br>सलज्जां चकमे देवः कमलोदरमन्दिरे॥ ४३<br>यावदब्दशतं दिव्यं यथान्यः प्राकृतो जनः।<br>ततः कालेन महता तस्याः पुत्रोऽभवन्मनुः॥ ४४<br>स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम्।<br>तद्रूपगुणसामान्यादधिपूरुष उच्यते॥ ४५ | तदनन्तर ब्रह्माने अपने उन मरीचि आदि मानस पुत्रोंको आज्ञा दी कि तुमलोग भूतलपर चारों ओर देवता, असुर और मानवरूप प्रजाओंकी सृष्टि करो। पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन पुत्रोंने अनेकों प्रकारकी प्रजाओंकी रचना की। सृष्टि-कार्यके लिये अपने उन पुत्रोंके चले जानेपर विश्वात्मा ब्रह्माने प्रणाम करनेके लिये चरणोंमें पड़ी हुई उस अनिन्दिता शतरूपा* का पाणिग्रहण किया। तदनन्तर अधिक समय व्यतीत होनेके उपरान्त शतरूपाके गर्भसे मनु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जो स्वायम्भुव नामसे विख्यात हुआ। उसे विराट् भी कहा जाता है तथा अपने पिता ब्रह्माके रूप और गुणकी समानताके कारण उसे |
* इसमें तथा अगले अध्यायमें शतरूपाका वर्णन है। शतरूपाका यहाँ अर्थ शतेन्द्रिया माया (मत्स्यपुराण ४। २४) या मूल प्रकृति है। क्योंकि इसे तथा हरिवंश १। २। १ को छोड़ अन्यत्र सर्वत्र शतरूपा स्वायम्भुव मनुकी पत्नी कही गयी है। यहाँ ४। ३३ में उनकी पत्नी 'अनन्ती' कही गयी है।
४- पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेसे ब्रह्मा दोषी क्यों नहीं हुए— एतद्विषयक मनुका प्रश्न, मत्स्यभगवान्का उत्तर तथा इसी प्रसङ्गमें आदिसृष्टिका वर्णन
| * अध्याय ४ * | २३ |
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| वैराजा यत्र ते जाता बहवः शंसितव्रताः।<br>स्वायम्भुवा महाभागाः सप्त सप्त तथापरे॥ ४६<br><br>स्वारोचिषाद्याः सर्वे ते ब्रह्मतुल्यस्वरूपिणः।<br>औत्तमिप्रमुखास्तद्वद् येषां त्वं सप्तमोऽधुना॥ ४७ | लोग अधिपुरुष भी कहते हैं—ऐसा हमने सुना है। उस ब्रह्म-वंशमें सात-सातके विभागसे जो बहुत-से महाभाग्यशाली एवं नियमोंका पालन करनेवाले स्वारोचिष आदि तथा उसी प्रकार औत्तमि आदि स्वायम्भुव मनु हुए हैं, वे सभी ब्रह्माके समान ही स्वरूपवाले थे। उन्हींमें इस समय तुम सातवें मनु हो॥ ४१–४७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मुखोत्पत्तिर्नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गेमें मुखोत्पत्तिनामक तीसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन करनेसे ब्रह्मा दोषी क्यों नहीं हुए—एतद्विषयक मनुका प्रश्न, मत्स्यभगवान्का उत्तर तथा इसी प्रसङ्गमें आदिसृष्टिका वर्णन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा |
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| अहो कष्टतरं चैतदङ्गजागमनं विभो।<br>कथं न दोषमगमत् कर्मणानेन पद्मभूः॥ १<br>परस्परं च सम्बन्धः सगोत्राणामभूत् कथम्।<br>वैवाहिकस्तत्सुतानां छिन्धि मे संशयं विभो॥ २ | —सर्वव्यापी भगवन्! अहो! पुत्रीकी ओर बार-बार अवलोकन तो अत्यन्त कष्टका विषय है, परंतु ऐसा कर्म करनेपर भी कमलयोनि ब्रह्मा दोषभागी क्यों नहीं हुए? तथा उनके सगोत्र पुत्रोंका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कैसे हुआ? विभो! मेरे इस संशयको दूर कीजिये॥ १-२॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे |
| दिव्येयमादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा।<br>अतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदतीन्द्रियशरीरिका॥ ३<br>दिव्यतेजोमयी भूप दिव्यज्ञानसमुद्भवा।<br>न मर्त्यैरभितः शक्या वक्तुं वै मांसचक्षुभिः॥ ४<br>यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम्।<br>विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः॥ ५<br>कार्याकार्ये न देवानां शुभाशुभफलप्रदे।<br>यस्मात्तस्मान्न राजेन्द्र तद्विचारो नृणां शुभः॥ ६<br>अन्यच्च सर्ववेदानामधिष्ठाता चतुर्मुखः।<br>गायत्री ब्रह्मणस्तद्वदङ्गभूता निगद्यते॥ ७<br>अमूर्त्तं मूर्तिमद् वापि मिथुनं तत् प्रचक्षते।<br>विरिञ्चिर्यत्र भगवांस्तत्र देवी सरस्वती।<br>भारती यत्र यत्रैव तत्र तत्र प्रजापतिः॥ ८ | —राजन्! रजोगुणसे उत्पन्न हुई यह शतरूपारूपी* आदिसृष्टि दिव्य है। जिस प्रकार इस (मूल प्रकृति)की इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे अतीत हैं, उसी प्रकार इस (शतरूपा, सहस्ररूपा नारी)-का शरीर भी इन्द्रियातीत है। यह दिव्य तेजसे सम्पन्न एवं दिव्य ज्ञानसे समुद्भूत है, अतः मांस-पिण्डरूप नेत्रधारी मानवोंद्वारा इसका भलीभाँति वर्णन नहीं किया जा सकता। जैसे सर्पोंके मार्गको सर्प तथा सम्पूर्ण पक्षियोंके मार्गको आकाशचारी पक्षी ही जान सकते हैं, वैसे ही (शतरूपा आदि) दिव्य जीवोंके (अचिन्त्य) मार्गको दिव्य जीव ही समझ सकते हैं, मानव कदापि नहीं जान सकते। राजेन्द्र! चूँकि देवताओंके कार्य (करनेयोग्य अर्थात् उचित) तथा अकार्य (न करनेयोग्य अर्थात् अनुचित) शुभ एवं अशुभ फल देनेवाले नहीं होते, इसलिये उनके विषयमें विचार करना मानवोंके लिये श्रेयस्कर नहीं है।* दूसरा कारण यह है कि जिस प्रकार ब्रह्मा सारे वेदोंके अधिष्ठाता हैं, उसी प्रकार (शतरूपारूपी) गायत्री ब्रह्माके अङ्गसे उत्पन्न हुई बतलायी जाती हैं। इसलिये यह मिथुनरूप (जोड़ा) अमूर्त (अव्यक्त) या मूर्तिमान् (व्यक्त) दोनों ही रूपोंमें कहा जाता है। यहाँतक कि जहाँ-जहाँ भगवान् ब्रह्मा हैं, वहाँ-वहाँ (गायत्रीरूपी) सरस्वती देवी भी हैं और जहाँ-जहाँ सरस्वती देवी हैं, वहीं-वहीं ब्रह्मा |
* इसलिये 'न देवचरितं चरेत्', 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्' की चेतावनी—उपदेश प्रसिद्ध है।
| २४ | * मत्स्यपुराण * |
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| यथाऽऽतपो न रहितश्छायया दृश्यते क्वचित्।<br>गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वं तथैव न विमुञ्चति॥ ९<br><br>वेदराशिः स्मृतो ब्रह्मा सावित्री तदधिष्ठिता।<br>तस्मान्न कश्चिद्दोषः स्यात् सावित्रीगमने विभोः॥ १०<br><br>तथापि लज्जावनतः प्रजापतिरभूत् पुरा।<br>स्वसुतोपगमाद् ब्रह्मा शशाप कुसुमायुधम्॥ ११<br><br>यस्मान्ममापि भवता मनः संक्षोभितं शरैः।<br>तस्मात्त्वद्देहमचिराद् रुद्रो भस्मीकरिष्यति॥ १२<br><br>ततः प्रसादयामास कामदेवश्चतुर्मुखम्।<br>न मामकारणे शप्तुं त्वमिहार्हसि मानद॥ १३<br><br>अहमेवंविधः सृष्टस्त्वयैव चतुरानन।<br>इन्द्रियक्षोभजनकः सर्वेषामेव देहिनाम्॥ १४<br><br>स्त्रीपुंसोरविचारेण मया सर्वत्र सर्वदा।<br>क्षोभ्यं मनः प्रयत्नेन त्वयैवोक्तं पुरा विभो॥ १५<br><br>तस्मादनपराधोऽहं त्वया शप्तस्तथा विभो।<br>कुरु प्रसादं भगवन् स्वशरीराप्तये पुनः॥ १६ | भी हैं। जिस प्रकार धूप (सूर्य) छायासे विलग होकर कहीं भी दिखायी नहीं पड़ते, उसी प्रकार गायत्री भी ब्रह्माके सामीप्यको नहीं छोड़ती हैं। यद्यपि ब्रह्मा वेदसमूहरूप हैं और सावित्री (या सरस्वती) उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिये ब्रह्माको सावित्रीपर कुदृष्टि डालनेसे कोई दोष नहीं लगा, तथापि उस समय अपने उस कुकर्मसे प्रजापति ब्रह्मा लज्जासे अभिभूत हो गये और कामदेवको शाप देते हुए यों बोले—'चूँकि तुमने अपने बाणोंद्वारा मेरे भी मनको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया है, इसलिये भगवान् रुद्र शीघ्र ही तुम्हारे शरीरको भस्म कर डालेंगे।' तदनन्तर कामदेवने बड़ी अनुनय-विनयसे ब्रह्माको प्रसन्न किया। वह बोला—'मानद! इस विषयमें आपका मुझे निष्कारण ही शाप देना उचित नहीं है। चतुरानन! आपने ही तो मुझे इस प्रकार सम्पूर्ण देहधारियोंकी इन्द्रियोंको क्षुब्ध करनेके लिये पैदा किया है। विभो! आपने ही पहले मुझे ऐसी आज्ञा दी है कि स्त्री-पुरुषका कोई विचार न करके तुम प्रयत्नपूर्वक सर्वत्र सर्वदा उनके मनको क्षुब्ध किया करो। इसलिये विभो! मैं निरपराध हूँ, तथापि आपने मुझे वैसा शाप दे डाला है; अतः भगवन्! मुझपर कृपा कीजिये, जिससे मैं पुनः अपने पूर्वशरीरको प्राप्त कर सकूँ।' ॥ ३—१६ ॥ | | ब्रह्मोवाच<br><br>वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते यादवान्वयसम्भवः।<br>रामो नाम यदा मर्त्यो मत्सत्त्वबलमाश्रितः॥ १७<br><br>अवतीर्या सुरध्वंसी द्वारकामधिवत्स्यति।<br>तद्भ्रातुस्तत्समस्य त्वं तदा पुत्रत्वमेष्यसि॥ १८<br><br>एवं शरीरमासाद्य भुक्त्वा भोगानशेषतः।<br>ततो भरतवंशान्ते भूत्वा वत्सनृपात्मजः॥ १९<br><br>विद्याधराधिपत्यं च यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>सुखानि धर्मतः प्राप्य मत्समपं गमिष्यसि॥ २०<br><br>एवं शापप्रसादाभ्यामुपेतः कुसुमायुधः।<br>शोकप्रमोदाभियुतो जगाम स यथागतम्॥ २१ | ब्रह्माने कहा—कामदेव! वैवस्वत-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर असुरोंके विनाशक श्रीराम जब मेरे बल-पराक्रमसे सम्पन्न होकर मानव-रूपमें यदुवंशमें (बलरामरूपसे) अवतीर्ण होंगे और द्वारकाको अपना निवासस्थान बनायेंगे, उस समय तुम उन्हींके समान बल-पराक्रमशाली उनके भ्राता (श्रीकृष्ण)-के पुत्ररूपमें उत्पन्न होगे। इस प्रकार शरीरको प्राप्तकर (द्वारकामें) सम्पूर्ण भोगोंका भोग करनेके उपरान्त तुम भरत-वंशमें महाराज वत्सके पुत्र होगे। तत्पश्चात् विद्याधरोंके अधिपति होकर महाप्रलयपर्यन्त धर्मपूर्वक सुखोंका उपभोग करके मेरे समीप वापस आ जाओगे। इस प्रकार शाप और कृपासे संयुक्त कामदेव शोक और आनन्दसे अभिभूत होकर जैसे आया था, वैसे ही चला गया॥ १७—२१ ॥ |
| * अध्याय ४ * | २५ |
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| मनुरुवाच<br>कोऽसौ यदुरिति प्रोक्तो यद्वंशे कामसम्भवः।<br>कथं च दग्धो रुद्रेण किमर्थं कुसुमायुधः॥ २२<br>भरतस्यान्वये कस्य का च सृष्टिः पुराभवत्।<br>एतत् सर्वं समाचक्ष्व मूलतः संशयो हि मे॥ २३ | मनुने पूछा—भगवन्! आपने जिनके वंशमें कामदेवकी उत्पत्ति बतलायी है, वे यदु कौन हैं? भगवान् रुद्रने कामदेवको किसलिये और कैसे जलाया तथा भरतवंशमें पहले किसकी और कौन-सी सृष्टि हुई थी? (इन बातोंको सुनकर) मेरे मनमें महान् संदेह उत्पन्न हो गया है; अतः आप प्रारम्भसे ही इन सबका वर्णन कीजिये॥ २२-२३ ॥ | | मत्स्य उवाच<br>या सा देहार्थसम्भूता गायत्री ब्रह्मवादिनी।<br>जननी या मनोर्देवी शतरूपा शतेन्द्रिया॥ २४<br>रतिर्मनस्तपोबुद्धिर्महान्दिक्सम्भ्रमस्तथा ।<br>ततः स शतरूपायां सप्तापत्यान्यजीजनत्॥ २५<br>ये मरीच्यादयः पुत्रा मानसस्तस्य धीमतः।<br>तेषामयमभूल्लोकः सर्वज्ञानात्मकः पुरा॥ २६<br>ततोऽसृजद् वामदेवं त्रिशूलवरधारिणम्।<br>सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम्॥ २७<br>वामदेवस्तु भगवानसृजन्मुखतो द्विजान्।<br>राजन्यानसृजद् बाह्वोर्विट् शूद्रानूरुपादयोः॥ २८<br>विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>छन्दांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं च ततः परम्॥ २९<br>ततः साध्यगणानीशस्त्रिनेत्रानसृजत् पुनः।<br>कोटींश्च चतुराशीतिर्जरामरणवर्जिताः॥ ३०<br>वामोऽसृजन्मर्त्यांस्तान् ब्रह्मणा विनिवारितः।<br>नैवंविधा भवेत् सृष्टिर्जरामरणवर्जिता॥ ३१<br>शुभाशुभात्मिका या तु सैव सृष्टिः प्रशस्यते।<br>एवं स्थितः स तेनादौ सृष्टेः स्थाणुरतोऽभवत्॥ ३२ | मत्स्यभगवान् कहने लगे—राजन्! ब्रह्माके शरीरके आधे भागसे जो ब्रह्मवादिनी गायत्री उत्पन्न हुई थी और जो मनुकी माता थी तथा जिसे शतरूपा और शतेन्द्रिया नामसे भी जाना जाता था, उसी शतरूपाके गर्भसे ब्रह्माजीने रति, मन, तप, बुद्धि, महान्, दिक् तथा सम्भ्रम—इन सात संतानोंको जन्म दिया। तथा उन बुद्धिमान् ब्रह्माके पहले जो मरीचि आदि दस मानस-पुत्र हुए थे, उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण ज्ञानात्मक संसारकी रचना हुई। तदनन्तर ब्रह्माने श्रेष्ठ त्रिशूलधारी वामदेवकी और पुनः पूर्वजोंके भी पूर्वज शक्तिशाली सनत्कुमारकी रचना की। भगवान् वामदेव (शिव)-ने अपने मुखसे ब्राह्मणोंकी, बाहुओंसे क्षत्रियोंकी, ऊरुओंसे वैश्योंकी और पैरोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति की। तदुपरान्त उन्होंने क्रमशः बिजली, वज्र, मेघ, रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष और छन्दकी रचना की। उसके बाद मेघकी सृष्टि की। तत्पश्चात् उन शक्तिशाली वामदेवने जरा-मरणरहित एवं त्रिनेत्रधारी चौरासी करोड़ साध्यगणोंको उत्पन्न किया। चूँकि वामदेवने उन्हें जरा-मरणरहित रचा था, इसलिये ब्रह्माने उन्हें सृष्टि रचनेसे मना कर दिया (और कहा कि) इस प्रकार जरा-मरणसे विवर्जित सृष्टि नहीं होती, अपितु जो सृष्टि शुभ और अशुभसे युक्त होती है, वही प्रशंसनीय है। ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वामदेव सृष्टिकार्यसे निवृत्त होकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो गये॥ २४—३२॥ | | स्वायम्भुवो मनुर्धीमांस्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।<br>पत्नीमवाप रूपाढ्यामनन्तीं नाम नामतः॥ ३३<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुस्तस्यामजीजनत्।<br>धर्मस्य कन्या चतुरा सूनृता नाम भामिनी॥ ३४<br>उत्तानपादात्तनयान् प्राप मन्थरगामिनी।<br>अपस्यतिमपस्यन्तं कीर्तिमन्तं ध्रुवं तथा॥ ३५ | (अब मैथुनी सृष्टिका वर्णन करते हैं—) परम बुद्धिमान् स्वायम्भुव मनुने कठोर तपस्या करके अनन्ती नामवाली एक सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। मनुने उसके गर्भसे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामके दो पुत्र उत्पन्न किये। पुनः धर्मकी कन्या सूनृताने, जो परम सुन्दरी, मन्थरगतिसे चलनेवाली और चतुर थी, उत्तानपादके सम्पर्कसे पुत्रोंको प्राप्त किया। उस समय प्रजापति उत्तानपादने सूनृताके गर्भसे अपस्यति, अपस्यन्त, कीर्तिमान् तथा ध्रुव (इन चार पुत्रों)*—को उत्पन्न किया। |
* यही कल्पभेद-व्यवस्था है। अन्यत्र उत्तानपादके ध्रुव और उत्तम ये दो ही पुत्र कहे गये हैं और सूनृताका नाम भी सुनीति आया है।
२६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उत्तानपादोऽजनयत् सूनृतायां प्रजापतिः।<br>ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि कृत्वा तपः पुरा॥ ३६<br><br>दिव्यमाप ततः स्थानमचलं ब्रह्मणो वरात्।<br>तमेव पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ३७<br><br>धन्या नाम मनोः कन्या ध्रुवाच्छिष्टमजीजनत्।<br>अग्निकन्या तु सुच्छाया शिष्टात्मा सुषुवे सुतान्॥ ३८<br><br>कृपं रिपुञ्जयं वृत्तं वृकं च वृकतेजसम्।<br>चक्षुषं ब्रह्मदौहित्र्यां वीरिण्यां स रिपुञ्जयः॥ ३९<br><br>वीरणस्यात्मजायां तु चक्षुर्मनुमजीजनत्।<br>मनुर्वै राजकन्यायां नड्वलायां स चाक्षुषः॥ ४०<br><br>जनयामास तनयान् दश शूरानकल्मषान्।<br>ऊरुः पूरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवागधविः॥ ४१<br><br>अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चापराजितः।<br>अभिमन्युस्तु दशमो नड्वलायामजायत॥ ४२<br><br>ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी तु सुप्रभान्।<br>अग्निं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम्॥ ४३<br><br>पितृकन्या सुनीथा तु वेनमङ्गादजीजनत्।<br>वेनमन्द्यायिनं विप्रा ममन्थुस्तत्करादभूत्।<br>पृथुर्नाम महातेजाः स पुत्रौ द्वावजीजनत्॥ ४४<br><br>अन्तर्द्धानस्तु मारीचं शिखण्डिन्यामजीजनत्। | उनमें ध्रुवने पूर्वकालमें तीन सहस्र वर्षोंतक तप करके ब्रह्माके वरदानसे दिव्य एवं अटल स्थानको प्राप्त किया। आज भी उन्हीं ध्रुवको आगे करके सप्तर्षिमण्डल स्थित है। उन्हीं ध्रुवके संयोगसे मनुकी कन्या धन्याने शिष्टको जन्म दिया। शिष्टके सम्पर्कसे अग्नि-कन्या सुच्छायाने कृप, रिपुञ्जय, वृत्त, वृक, वृकतेजस् और चक्षुषू नामक पुत्रोंको पैदा किया। उनमें रिपुञ्जयने ब्रह्माकी दौहित्री एवं वीरणकी कन्या वीरिणीके गर्भसे चाक्षुष मनुको उत्पन्न किया। चाक्षुष मनुने राजपुत्री नड्वलाके गर्भसे ऊरु, पूरु, तपस्वी शतद्युम्न, सत्यवाक्, हवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न, अपराजित और दसवाँ अभिमन्यु—इन दस निष्पाप एवं शूरवीर पुत्रोंको पैदा किया। आग्नेयीने ऊरुके संयोगसे अग्नि, सुमनस्, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरस् और गय—इन छः परम कान्तिमान् पुत्रोंको जन्म दिया। पितरोंकी कन्या सुनीथाने अङ्गके सम्पर्कसे वेनको उत्पन्न किया। (वेन अत्यन्त अन्यायी था। जब वह विप्रशापसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब) ब्राह्मणोंने उस अन्यायी वेनके हाथका मन्थन किया। उससे महातेजस्वी पृथु नामका पुत्र प्रकट हुआ। उनके (अन्तर्धान और हविर्धान नामक) दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें अन्तर्धानने शिखण्डिनीके गर्भसे मारीच नामक पुत्र पैदा किया॥ ३३—४४ १/२॥ |
| हविर्धानात् षडाग्नेयी धिषणाजनयत् सुतान्।<br>प्राचीनबर्हिषं साङ्गं यमं शुक्लं बलं शुभम्॥ ४५<br><br>प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत् प्रजापतिः।<br>हविर्धानाः प्रजास्तेन बहवः सम्प्रवर्तिताः॥ ४६<br><br>सवर्णायां तु सामुद्र्यां दशाधत्त सुतान् प्रभुः।<br>सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः॥ ४७<br><br>तत्तपोरक्षिता वृक्षा बभुलोंके समन्ततः।<br>देवादेशाच्च तानग्निरदहद् रविनन्दन॥ ४८<br><br>सोमकन्याभवत् पत्नी मारीषा नाम विश्रुता।<br>तेभ्यस्तु दक्षमेकं सा पुत्रमग्रयमजीजनत्॥ ४९ | अग्नि-कन्या धिषणाने हविर्धानके संयोगसे प्राचीन-बर्हिष्, साङ्ग, यम, शुक्र, बल और शुभ—इन छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनमें महान् ऐश्वर्यशाली प्राचीनबर्हि प्रजापति थे। उन्होंने हविर्धान नामसे विख्यात बहुत-सी प्रजाओंका विस्तार किया तथा समुद्र-कन्या सवर्णाके गर्भसे दस पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी धनुर्वेदके पारगामी विद्वान् थे तथा प्रचेता नामसे विख्यात हुए। रविनन्दन! इन्हीं प्रचेताओँके तपसे सुरक्षित रहकर वृक्षजगत्में चारों ओर शोभा पा रहे थे, परंतु इन्द्रदेवके आदेशसे अग्निने उन्हें जलाकर भस्म कर दिया। तत्पश्चात् चन्द्रमाकी कन्या, जो मारिषा नामसे विख्यात थी, उन प्रचेताओँकी पत्नी हुई। उसने उनके संयोगसे एक दक्ष नामक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया। |
५- दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्वारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव
| * अध्याय ५ * | २७ |
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| दक्षादनन्तरं वृक्षानौषधानि च सर्वशः।<br>अजीजनत् सोमकन्या नदीं चन्द्रवतीं तथा॥ ५०<br>सोमांशस्य च तस्यापि दक्षस्याशीतिकोटयः।<br>तासां तु विस्तरं वक्ष्ये लोके यः सुप्रतिष्ठितः॥ ५१<br>द्विपदश्चाभवन् केचित् केचिद् बहुपदा नराः।<br>वलीमुखाः शङ्कुकर्णाः कर्णप्रावरणास्तथा॥ ५२<br>अश्वऋक्षमुखाः केचित् केचित् सिंहाननास्तथा।<br>श्वसूकरमुखाः केचित् केचिदुष्ट्रमुखास्तथा॥ ५३<br>जनयामास धर्मात्मा म्लेच्छान् सर्वाननेकंशः।<br>स सृष्ट्वा मनसा दक्षः स्त्रियः पश्चादजीजनत्॥ ५४<br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय ददौ नक्षत्रसंज्ञिताः।<br>देवासुरमनुष्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जगत्॥ ५५ | दक्षकी उत्पत्तिके पश्चात् उस सोमकन्याने समस्त वृक्षों और ओषधियोंको तथा चन्द्रवती नामकी नदीको उत्पन्न किया। चन्द्रमाके अंशसे उत्पन्न हुए उस दक्ष प्रजापतिकी अस्सी करोड़ संतानें हुईं, जो इस समय लोकमें सर्वत्र फैली हुई हैं और जिनका विस्तार मैं आगे वर्णन करूँगा। उनमेंसे किन्हींके दो पैर थे तो किन्हींके अनेकों पैर थे। किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे तो किन्हींके कान खूँटे-जैसे थे तथा किन्हींके कान (बालोंसे) आच्छादित थे। किन्हींके मुख घोड़े और रीछके सदृश थे तथा कोई सिंहके समान मुखवाले थे। कुछ लोग कुत्ते और सूअरके सदृश मुखवाले थे तो किन्हींका मुख ऊँटके समान था। इस प्रकार धर्मात्मा दक्षने अपने मनसे अनेकों प्रकारके सभी म्लेच्छोंकी सृष्टि की, तत्पश्चात् स्त्रियोंको उत्पन्न किया। उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको तथा नक्षत्र नामवाली सत्ताईस स्त्रियोंको चन्द्रमाको प्रदान किया। उन्हीं कन्याओंसे देवता, असुर और मानव आदिसे परिपूर्ण यह सारा जगत् प्रादुर्भूत हुआ है॥ ५०—५५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें चौथा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्धारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं विस्तरेणैव सूत ब्रूहि यथातथम्॥ १<br><br>सूत उवाच<br>संकल्पाद दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात् प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>यथा ससर्ज चैवादौ तथैव शृणुत द्विजाः॥ ३<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः।<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पाञ्चजन्यामजीजनत्॥ ४ | **(शौनक आदि) ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इन सबकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसका यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>**सूतजी कहते हैं—**द्विजवरो! प्रचेता-पुत्र दक्षसे पूर्व उत्पन्न हुए लोगोंकी सृष्टि संकल्प, दर्शन और स्पर्शमात्रसे हुई है, ऐसा कहा जाता है; किंतु दक्षके पश्चात् स्त्री-पुरुषके संयोगद्वारा सृष्टि प्रचलित हुई है। पूर्वकालमें जब ब्रह्मा प्रजाकी आज्ञा दी कि तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो, तब दक्षने पहले-पहल जैसी सृष्टि-रचना की, उसे (मैं) उसी प्रकार (वर्णन करता हूँ, आपलोग) श्रवण करें। जब (संकल्प, दर्शन और स्पर्शद्वारा) देव, ऋषि और नागोंकी सृष्टि करनेपर जीव-लोकका विस्तार नहीं हुआ, तब दक्षने पाञ्चजनीके गर्भसे एक हजार |