भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१३० मयमतम् बाँटना चाहिये। इसमें एक भाग से जन्म, पाँच से वप्र, एक से कञ्ज, आधे से गल, आधे से अब्ज, चार से कुमुद, आधे से पङ्कज, आधे से कम्प, दो से कण्ठ, आधे से कम्प, आधे से पद्म, दो से महावाजन, आधे से दल तथा आधे से पङ्कजयुक्त कम्प निर्मित होते हैं। इस प्रकार अनेक पद्म-पुष्पों से युक्त अधिष्ठान पुष्पपुष्कल कहलाता है। शिल्पियों के अनुसार यह अधिष्ठान मध्यम एवं बड़े विमानों (मन्दिरों) कें अधिक अनुकूल होता है।।२७-२८।। ⁕ श्रीबन्धम् ⁕ द्वाभ्यामेकेन सप्तांशकशशिशिववेदैकचन्द्राग्निभागै- रेकेनैकेन वेदैः शिवशशिनयनैकेन मोहामराब्जम्। हृत्पद्मं कैरवाब्जं गलधरगलकम्पं दलं तत्कपोतं चालिङ्गान्तादिकं तत्प्रतिमुखमथ तद्वाजनं पङ्कजाढ्यम् ॥२९॥ श्रीबन्धं स्यादेतदुच्चे चतुर्व्वस्वंशे कुर्याच्छान्तधीर्वर्द्धकिस्तत् । देवेशानां मन्दिरेष्वेवमुक्तं श्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यं ददाति ॥३०॥ श्रीबन्ध अधिष्ठान—श्रीबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई के बत्तीस भाग किये जाते हैं। इसमें दो भाग से अधिष्ठान का निचला भाग, एक से अब्ज, सात से हृत्, एक से पद्म, एक से कैरव, चार से अब्ज, एक से गल, एक से अधर, तीन से गल, एक से कम्प, एक से दल, चार से कपोत, एक से आलिङ्गादि, एक से आलिङ्गान्त, दो से प्रतिमुख एवं एक से पङ्कजयुक्त वाजन निर्मित होते हैं। इसकी स्थापना कुशल वर्धकि द्वारा करानी चाहिये। यह अधिष्ठान देवालयों एवं राजभवनों के लिये अनुकूल होता है तथा श्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग प्रदान करता है।।२९-३०।। ⁕ मञ्चबन्धम् ⁕ तुङ्गे षड्विंशदंशे खुरमथ जगतीकैरवं कम्पकण्ठं कम्पं पद्मं कपोतं तदुपरि च तथा निम्नमन्तादिवक्त्रम्। कम्पं भागेन षड्भिः शरशशिगुणचन्द्रैकबन्थांशकांशै- र्द्वाभ्यामेकेन कुर्यादमरनरपतेर्मन्दिरे मञ्चबन्धम् ॥३१॥ मञ्चबन्ध अधिष्ठान—मञ्चबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई के छब्बीस भाग करने चाहिये। एक भाग से खुर, छः से जगती, पाँच से कैरव, एक से कम्प, तीन से कण्ठ, एक से कम्प, एक से पद्म, तीन से कपोत, एक-एक भाग से ऊपर-नीचे के सदृश निर्माण, एक-एक भाग से अन्तवक्त्र एवं आदिवक्त्र तथा एक भाग से कम्प निर्मित होना चाहिये। यह अधिष्ठान राजगृह के अनुकूल होता है।।३१।।