भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१३२ मयमतम् पद्मं पट्टं च कण्ठं तदुपरि च तथा कम्पपद्मं च पट्टी- पट्टं तद्वप्रबन्धं तदपि च सहितं सद्द्विकैर्विंशदंशैः ॥३५॥ वप्रबन्ध अधिष्ठान—वप्रबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई को बाईस भागों में बाँटा जाता है। इसमें दो भाग से उपान, एक से कञ्ज, एक से कम्प, पाँच से वप्र, चार से कुम्भ, एक से पद्म, एक से पट्ट, दो से कण्ठ, एक से कम्प, एक से पद्म, दो से पट्टी तथा एक से पट्ट निर्मित होता है। इसे वप्रबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।।३५।। ✺ कपोतबन्धम् ✺ तदेव वृत्तं कुमुदं तु वाजने कपोतयुक्तं हि कपोतबन्धकम्। कपोतबन्ध अधिष्ठान—वाजन पर जब कुमुद वृत्ताकार हो एवं कपोत निर्मित तो उसे कपोतबन्ध अधिष्ठान कहते हैं। ✺ प्रतिबन्धम् ✺ तदेव वेदैः प्रतिवाजनं प्रतित्रिकास्रयुक्तं प्रतिबन्धमुच्यते ॥३६॥ प्रतिबन्ध अधिष्ठान—जब प्रति एवं वाजन चार भाग में निर्मित हों एवं प्रति त्रिकास्रयुक्त ( तीन कोणों वाला ) हो तो उसे प्रतिबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।।३६।। ✺ कलशाधिष्ठानम् ✺ एकद्व्येकाग्निभागैः शशियुगलशिवद्व्येकचन्द्रेशदृग्भि- श्चन्द्रैकैकाक्षिश्चन्द्रैः खुरकमलमथो कम्पकण्ठं च कम्पम्। पद्मं पट्टाब्जनिम्नं कमलमुपरि कुम्भं दलं निम्नमन्ताद् या स्याच्चोर्ध्वे प्रतिर्वाजनमथ कलशाख्येन भागास्त्रिरष्टौ ॥३७॥ कलश अधिष्ठान—इस अधिष्ठान को ऊँचाई में चौबीस भागों में बाँटा जाता है। इसमें एक भाग से खुर, दो से कमल, एक से कम्प, तीन से कण्ठ, एक से कम्प, दो से पद्म, एक से पट्ट, दो से अब्ज, एक से निम्न, दो से प्रति एवं एक से वाजन निर्मित होता है। इसे कलश अधिष्ठान कहते हैं।।३७।। ✺ अधिष्ठानसामान्यलक्षणम् ✺ एतानि भेदैस्तु चतुर्दशैव प्रोक्तानि तज्ज्ञैस्तु मसूरकाणि। सर्वाणि नास्यङ्घ्रियुतानि युक्त्यादृढीकृताङ्गानि मयोदितानि ॥३८॥ अधिष्ठान के सामान्य लक्षण—इस प्रकार चौदह प्रकार के अधिष्ठानों का लक्षणसहित वर्णन विद्वानों द्वारा किया गया है। सभी को छोटे पादों एवं सजावटी खिड़कियों से युक्त करना चाहिये। इनके सभी अङ्गों को, जिनका वर्णन ऋषि मय ने किया है, दृढ़ता-पूर्वक स्थापित करना चाहिये।।३८।।