भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३३ भागेनार्धत्रिपादाङ्घ्रिभिरथ युगलाध्यर्धचन्द्रार्धपादै- र्मात्रैर्वृद्धिश्च हानिर्दृढतरमतिना योजितव्या बलार्थम्। शोभार्थं भागमङ्घ्र प्रतिवरमथनीचाल्पहर्म्ये तलाना- मेवं प्रोक्तं यमीन्द्रैरविकलमतिभिस्तन्त्रविद्भिः पुराणैः ॥३९॥ अधिष्ठान को अधिक दृढ़ बनाने के लिये बुद्धिमान (स्थपति) को एक भाग या आधा, त्रिपाद (पौन भाग) या चतुर्थांश, डेढ़ भाग अथवा एक भाग का चतुर्थांश जोड़ना या घटाना चाहिये। इस माप का निर्णय भवन के अनुसार उसके उत्तम (बड़ा), मध्यम अथवा छोटे आकार के अनुसार करना चाहिये। यह भवन की शोभा के लिये होता है। यह मत संयमी, निर्मल बुद्धि, तन्त्र एवं पुराण के ज्ञाता विद्वानों का है।।३९।। ✵ अधिष्ठानपर्यायनामानि ✵ मसूरकमधिष्ठानं वास्वाधारं धरातलम्। तलं कुट्टिममाद्यङ्गं पर्यायवचनानि हि ॥४०॥ अधिष्ठान के पर्यायवाची शब्द—मसूरक, अधिष्ठान, वास्वाधार, धरातल, तल, कुट्टिम तथा आद्यङ्ग अधिष्ठान के पर्यायवाची हैं।।४०।। ✵ निर्गममानम् ✵ यावज्जगतिनिष्क्रान्तं तावत् कुमुदनिर्गमम्। अम्बुजानां तु सर्वेषामुत्सेधसमनिर्गमम् ॥४१॥ निर्गम का प्रमाण—जितना जगती का निष्क्रान्त निर्मित हो, उतना ही कुमुद का निर्गम निर्मित करना चाहिये। सभी अम्बुजों की ऊँचाई निर्गम के बराबर रखनी चाहिये।।४१।। दलाग्रतीव्रमुत्सेधात् पादं पादार्धमेव वा। वेत्राणामपि सर्देषां चतुर्भागैकनिर्गमम् ॥४२॥ दल (पत्तियों की पंक्ति) के अग्र भाग पंक्ति की ऊँचाई का चतुर्थांश या चतुर्थांश का आधा होना चाहिये। सभी वेत्रों का निर्गम चौथाई होना चाहिये।।४२।। तत्समं वा त्रिपादं वा महावाजननिर्गमम्।