भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१३४ मयमतम् बल के अनुसार अधिष्ठान के सभी भागों का प्रवेश एवं निर्गम रखना चाहिये ।। ४३ ।। ✺ अधिष्ठानप्रतिच्छेदविधिः ✺ प्रतिच्छेदं न कर्तव्यं सर्वत्रैवं विचक्षणैः ।। ४४ ।। द्वारार्थं यत् प्रतिच्छेदं सम्पद्द्वारं च नेत्यलम्। पादबन्धमधिष्ठानं छेदनीयं यथोचितम् ।।४५।। अधिष्ठान में खण्ड करने की विधि—बुद्धिमान (स्थपति) को अधिष्ठान में कहीं भी प्रतिच्छेद (खण्ड) नहीं करना चाहिये। द्वार के लिये किया गया प्रतिच्छेद सम्पत्तिकारक नहीं होता है। पादबन्ध एवं अधिष्ठान में आवश्यकतानुसार प्रतिच्छेद करना चाहिये ।।४४-४५।। जन्मादिपञ्चवर्गे तु तत्तत्तुङ्गावसानके । सपटिकाङ्गेऽधिष्ठानेऽप्यन्यस्मिन्नेवमूह्यताम् । यद् यत्रैवोचितं प्राज्ञास्तत् तत्रैव प्रयोजयेत् ।।४६।। जन्म आदि पाँच वर्गों में उनकी ऊँचाई के अन्त में, सपट्टिकाङ्ग में, अधिष्ठान में एवं अन्य अङ्गों में प्रतिच्छेद हो सकता है। जहाँ-जहाँ उचित हो, बुद्धिमान (स्थपति) को वहाँ प्रयोग करना चाहिये ।।४६।। स्तम्भोच्चार्धं वा मसूरोच्चमानं तत् षट्सप्ताष्टांशकं भागहीनम् । वस्वाधारोच्चं भवेत् सर्ववस्तुष्वेवं पूर्वं शम्भुना सम्यगुक्तम् ।।४७।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे अधिष्ठानविधानो नाम चतुर्दशोऽध्यायः अधिष्ठान की ऊँचाई स्तम्भ के ऊँचाई की आधी, छः, सात या आठ भाग कम होनी चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई सभी भवनों में उनके अनुसार रखनी चाहिये। इस मत का प्रतिपादन शम्भु ने अच्छी प्रकार से किया है ।।४७।। व्याख्यात्मक टिप्पणी भूमि के प्रकार (श्लोक १) भूमि के जाङ्गल एवं अनूप भेद की चर्चा अर्थशास्त्र (२.२४.५) मे भी प्राप्त होती है। शिल्परत्न (१०.१-३) में दो प्रकार की स्निग्धा एवं अस्निग्धा भूमि की चर्चा की गई है—