मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १३९ के दुगुने से अधिक होनी चाहिये। भूतल के स्तम्भ का विस्तार अट्ठाईस मात्रा ( अङ्गुल-माप ) होना चाहिये॥५॥ तत्तद्व्यङ्गुलभिन्नेन षण्मात्रं चान्त्यभूमिके। पादोच्चे पङ्क्तिनन्दाष्टभागैऽशं पादविस्तृतम् ॥६॥ प्रत्येक तल में उपर्युक्त माप से दो-दो अङ्गुल कम करते हुये ऊपर के तल में स्तम्भ की चौडाई का माप प्राप्त होता है। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई का दसवाँ, नवाँ या आठवाँ भाग उसकी चौड़ाई का माप होना चाहिये।।६।। तदर्धं वा त्रिभागोनं चतुर्भागोनमेव वा। कुड्यस्तम्भस्य विस्तारस्तेन द्वित्रिचतुर्गुणः ॥७॥ पञ्चषड्गुण एवं स्याद् भित्तिविष्कम्भ इष्यते। जन्मोर्ध्वे स्तम्भविक्षेपहोमाः स्तम्भविधौ विदुः ॥८॥ अथवा स्तम्भ का विस्तार आधा, तीन भाग कम अथवा चतुर्थांश कम रखना चाहिये। भित्ति-स्तम्भ के विस्तार से भित्ति-विष्कम्भ का विस्तार दुगुना, तीन गुना, चार गुना, पाँच गुना या छः गुना रखना चाहिये। स्तम्भ-स्थापन-विधि के ज्ञाता अधिष्ठान के ऊपर स्तम्भ के स्थापन के समय होम करने का विधान बतलाते हैं।।७-८।। ✹ स्तम्भभेदाः ✹ प्रतिस्तम्भः प्रतेरूर्ध्वे चोत्तराधो हितायतिः । जन्मोर्ध्वे स्तम्भनिक्षेपः स्तम्भायामत्रिभागभाक् ॥९॥ स्तम्भ के भेद—प्रतिस्तम्भ को प्रति के ऊपर एवं उत्तर ( भित्ति ) के नीचे निर्मित किया जाता है। जन्म ( अधिष्ठान का एक भाग ) के ऊपर स्तम्भ को स्थापित किया जाता है एवं उसकी चौड़ाई उसकी ऊँचाई के तीसरे भाग के बराबर होती है।।९।। गाम्भीर्यमवटं कृत्वा तदुपज्ञतलं कुरु। पादुकाद्युत्तरान्तःस्थो निखातस्तम्भ इष्यते ॥१०॥ ( निखातस्तम्भ के लिये ) गहरा गर्त बनाकर उसके ऊपर तल का निर्माण किया जाता है ( पुनः स्तम्भ-स्थापन होता है )। पादुक से लेकर उत्तर-भित्ति के मध्य में स्थित इस स्तम्भ को निखातस्तम्भ कहते हैं।।१०।। अधिष्ठानोत्तरान्तःस्थो झषालस्तम्भ उच्यते। तद्द्व्यासादर्कभागाद्यं षड्भागोनाग्रविस्तरः ॥११॥ अधिष्ठान से प्रारम्भ होकर उत्तरभित्ति के मध्य में स्थित स्तम्भ को झषाल स्तम्भ