मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० मयमतम् कहते हैं। यह स्तम्भ मूल की अपेक्षा ऊर्ध्व भाग में छः-बारह भाग कम चौड़ा होता है।।११।। मूलभूतस्तम्भतुङ्गस्य द्वादशाद्याः षडंशयुक्। ऊर्ध्वोर्ध्वस्तम्भतुङ्गं स्यादेवं तद्विस्तरक्रमः ।।१२।। ( बारह मञ्जिल के भवन में ) भूतल में स्तम्भ की चौड़ाई उसकी ऊँचाई का छठवाँ भाग होना चाहिये। ऊपर के तलों में भी स्तम्भों की ऊँचाई एवं चौड़ाई में यही अनुपात होना चाहिये।।१२।। अग्राकारं युगास्रं तु कुम्भमण्डिसमन्वितम्। ब्रह्मकान्तं तदष्टास्रं विष्णुकान्तमिहोच्यते ।।१३।। मूल से लेकर ऊपर तक चौकोर तथा कुम्भ एवं मण्डि से युक्त स्तम्भ को ब्रह्मकान्त कहा जाता है तथा आठ कोण वाले स्तम्भ को विष्णुकान्त कहते हैं।।१३।। षडस्रमिन्द्रकान्तं स्यात् सौम्यं तत् षोडशास्रकम्। कर्णमात्रेण तन्मूले चतुरस्रमितोर्ध्वतः ।।१४।। अष्टास्रं वा द्विरष्टास्रवृत्तं पूर्वास्रमीरितम्। कुम्भमण्डियुतं वाऽपि रुद्रकान्तं सुवृत्तकम् ।।१५।। षट्कोण वाला स्तम्भ इन्द्रकान्त संज्ञक होता है। सोलह कोण वाला स्तम्भ सौम्य कहलाता है। ( कोण वाले स्तम्भों में ) मूल में चौकोर होता है। इसके पश्चात् अष्टकोण, षोडशकोण अथवा वृत्ताकार होता है। इसकी संज्ञा पूर्वास्र होती है। वृत्ताकार स्तम्भ यदि कुम्भ एवं मण्डि से युक्त हो तो उसकी संज्ञा रुद्रकान्त होती है। विस्तारद्विगुणं मध्येऽष्टास्रयुक्तं युगास्रकम्। वियुक्तं कुम्भमण्डिभ्यां मध्येऽष्टास्रं तदुच्यते ।।१६।। यदि स्तम्भ की लम्बाई विस्तार से दुगुनी हो, मध्य में अष्टकोण एवं ऊपर तथा नीचे चौकोर हो तथा कुम्भ एवं मण्डि से रहित हो तो उसे 'मध्ये अष्टास्र' कहा जाता है।।१६।। चतुरस्रास्रवृत्ताभं रुद्रच्छन्दं समांशतः। दण्डाध्यर्धं द्विदण्डेनोत्तुङ्गद्विगुणविस्तृतम् ।।१७।। पद्मासनं तु कर्तव्यं मूले पद्मासनं भवेत्। यथेष्टाकृतिसंयुक्तमूर्ध्वतो वा समण्डितम् ।।१८।। रुद्रच्छन्द संज्ञक स्तम्भ ( मूल से क्रमशः ऊपर की ओर ) चतुष्कोण, अष्टकोण