मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४१ एवं वृत्ताकार होता है। पद्मासन संज्ञक स्तम्भ के मूल में पद्मासन की रचना की जाती है, जिसका प्रमाण डेढ़ दण्ड अथवा दो दण्ड ऊँचा एवं उसका दुगुना चौड़ा होता है। इसके ऊर्ध्व भाग में इच्छानुसार आकृति अथवा मण्डि का निर्माण करना चाहिये। चक्रवाकाकृतिव्याप्तं मूले पद्मासनान्वितम् । सभद्रं मध्यभागे तु भद्रकं तद् द्विमण्डितम् ॥१९॥ भद्रक संज्ञक स्तम्भ के मूल में पद्मासन, चक्रवाक की आकृति से युक्त दो मण्डि एवं मध्य में भद्र निर्मित होता है॥१९॥ व्यालेभसिंहभूतादिमण्डितं यत्तु मूलतः । यथेष्टाकृतिसंयुक्तं तत्तन्नाम्ना समीरितम् ॥२०॥ जिसके मूल में व्याल, गज, सिंह एवं भूत आदि (अन्य प्राणी) अलंकृत हों एवं ऊपर इच्छानुसार आकृति का निर्माण किया गया हो, उस स्तम्भ को उसके अलङ्कार के अनुसार संज्ञा दी जाती है॥२०॥ आत्तमेव तदायामे शुण्डभेदसमन्वितम् । युतं तत्कुम्भमण्डिभ्यां शुण्डपादमिति स्मृतम् ॥२१॥ जिस स्तम्भ पर लम्बाई में हाथी का सूँड़ निर्मित हो एवं कुम्भ तथा मण्डि से युक्त हो, उसे शुण्डपाद स्तम्भ कहते हैं॥२१॥ मुक्तोत्करणकर्माङ्गं पिण्डिपादं तदेव हि । कर्मायामेन चाग्रे तु चतुरस्रसमन्वितम् ॥२२॥ तदधस्त्वर्धदण्डेन पद्मं वस्वस्रसंयुतम् । तदधस्तु विकारास्रं दण्डेनाब्जं तु पूर्ववत् ॥२३॥ तदधो दण्डमानेन मध्यपट्टं युगास्रकम् । पद्मं च षोडशास्रं च पूर्ववत्परिकल्पयेत् ॥२४॥ मूले शेषं युगास्रं स्याच्चित्रखण्डं तदुच्यते । तदेवाष्टास्रकं मध्यपट्टं श्रीखण्डमुच्यते ॥२५॥ शुण्डपाद में जब पूरे स्तम्भ में मोतियां उत्कीर्ण होती हैं तो उसे पिण्डिपाद कहते हैं। (चित्रखण्ड संज्ञक स्तम्भ के) अग्र भाग (ऊपरी भाग) में दो दण्ड से चौकोर निर्मित होता है। उसके नीचे आधे दण्ड से अष्टकोण पद्म होता है। उसके नीचे एक दण्ड माप का सोलह कोण पद्म तथा उसके नीचे एक दण्डप्रमाण का चौकोर मध्य पट्ट होता है। इसके पश्चात् (नीचे) पहले के सदृश षोडश कोण पद्म निर्मित होता