मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४५ समास्तरङ्गाश्चान्योन्यहीनाः सर्वत्र सम्मताः। अग्रनिष्क्राममर्धं वा त्रिभागं वा स्वतारतः ॥४५॥ सभी लहरें सम एवं एक-दूसरे से हीन नहीं होती हैं। इनका अग्र भाग एवं निष्क्राम ( प्रथम छोर से अन्तिम छोर ) अपने विस्तार का आधा अथवा तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये।।४५।। मुष्टिबन्धोपरिक्षिप्तव्यालसंहितिरूपवत् । सनालीकं समतलं सनाटकमथापि वा ॥४६॥ इसके ऊर्ध्व भाग में सर्प की कुण्डली के सदृश मुष्टिबन्ध होना चाहिये, जो नालियों के सहित समतल एवं नाटकों ( नाट्य चित्रों ) से युक्त हो।।४६।। भूतेभमकरैर्व्यालैसंयुक्तं चाग्रमण्डनम्। पार्श्वयोः पोतिकामध्ये पट्टं पादविशालवत् ॥४७॥ पोतिका के ऊर्ध्व भाग में भूत ( जीव-जन्तु ), गज, मकर एवं व्याल आदि का अलङ्करण होना चाहिये। पोतिका का मध्य पट्ट दोनों पार्श्वों में स्तम्भ के समान विस्तृत होना चाहिये।।४७।। रत्नबन्धक्रियावल्ली चित्रा वाग्रस्थपट्टिका। नानाचित्रैर्विचित्रा वा सा प्रोक्ता चित्रपोतिका ॥४८॥ जिस पोतिका की अग्रस्थ पट्टिका ( ऊपरी पट्टी पर ) रत्नजटित लता अङ्कित हो अथवा अनेक प्रकार के चित्रों से जिसकी सज्जा की गई हो, उसे चित्रपोतिका कहते हैं।।४८।। पत्रैर्विचित्रिता पत्रपोतिकेति प्रकीर्तिता। महार्णवतरङ्गाभतरङ्गाभा तरङ्गिणी ॥४९॥ चतुःषडष्टपङ्क्त्यर्कसंख्या वा स्युस्तरङ्गकाः। बहवोऽपि समाश्चैते चान्योन्याः स्युर्वराः क्रमात् ॥५०॥ विभिन्न प्रकार के पत्रों से अलंकृत पोतिका को पत्रपोतिका कहते हैं। जिस पोतिका में सागर के लहरों के सदृश लहरें निर्मित हों, वह तरङ्गिणी पोतिका होती है। इन लहरों की संख्या चार, छः, आठ, दश या बारह होनी चाहिये। अथवा बहुत-सी सम संख्याओं में लहरें होनी चाहिये, जो एक-दूसरे से आगे बढ़ती हुई हों।।४९-५०।। ❋ स्तम्भविषये विशेषः ❋ पादमर्धं त्रिपादं वा भित्तेः स्तम्भस्य निर्गतम्। चतुरस्रास्रवृत्तानां यथाक्रममिति स्मृतम् ॥५१॥ मय०-१०