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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 395 में से

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१४६ मयमतम् स्तम्भ के विषय में विशेष—भित्ति के स्तम्भ का निर्गम इस प्रकार होना चाहिये— यदि चतुष्कोण हो तो चौथाई, अष्टकोण हो तो आधा तथा वृत्ताकर हो तो तीन चौथाई॥५१॥ द्विहस्ताद्यं चतुर्हस्तं स्तम्भान्तरमिति स्मृतम्। षडङ्गुलविवृद्ध्या तु नवभेदं प्रकीर्तितम्॥५२॥ स्तम्भान्तर दो हाथ से लेकर चार हाथ तक कहा गया है। छः-छः अङ्गुल की वृद्धि करते हुये इसके नौ भेद कहे गये हैं॥५२॥ गृहीतांशवशेनपि यथायुक्त्या प्रयोजयेत्। स्तम्भस्तम्भान्तरं सर्वं प्रासादे सार्वदेशिके ॥५३॥ सभी स्थानों पर सभी भवनों में यथोचित अंश ( उपर्युक्त मापों में से ) ग्रहण कर स्तम्भ एवं स्तम्भान्तर में प्रयोग करना चाहिये॥५३॥ विषमस्तम्भभागं तु वास्तुवस्तुविनाशनम्। सायतं चापि तत्सर्वं तन्नाम्नैव प्रपद्यते ॥५४॥ यदि स्तम्भ-स्थापन नियमानुकूल न हो तो वह भूमि एवं भवन ( तथा उसके स्वामी ) का विनाश करने वाला होता है। अनुकूल स्तम्भ-स्थापन कल्याण प्रदान करता है॥५४॥ दारुस्तम्भविशालं वा सार्धं द्वित्रिगुणं तु वा। शिलास्तम्भविशालं स्याद् देवानां नैव मानवे ॥५५॥ जितना विस्तृत काष्ठस्तम्भ होता है, उतना विस्तृत, उसका आधा, दुगुना या तीन गुना विस्तृत प्रस्तरस्तम्भ हो सकता है; किन्तु इसका प्रयोग केवल देवालय में होना चाहिये, मनुष्यालय में नहीं होना चाहिये॥५५॥ इष्टकाश्मद्रुमैः सर्वैः स्तम्भाः प्रोक्ताश्चिरन्तनैः । युग्मायुग्मं तु देवाना मयुग्मं तु नृणां मतम् ॥५६॥ प्राचीन मनीषियों ने सभी स्तम्भों को ईंट, प्रस्तर अथवा काष्ठ से निर्मित कहा है। देवगृहों में स्तम्भ की संख्या सम अथवा विषम हो सकती है; किन्तु मनुष्यों के गृह में स्तम्भों की संख्या विषम होनी चाहिये॥५६॥ अन्तःस्तम्भं बहिःस्तम्भमाजुसूत्रं यथा भवेत्। गृहाणां भित्तिमध्ये तु शालानां तु तथा भवेत् ॥५७॥ जिस प्रकार आजुसूत्र ( मापसूत्र ) हो, उसी के अनुसार अन्तःस्तम्भ एवं बहिःस्तम्भ

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