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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४७ का निर्माण करना चाहिये। उसी के अनुसार गृह की भित्ति के मध्य शालाओं की भी स्थिति होनी चाहिये।।५७।। प्रासादानां तु पाद्बाह्ये पान्मध्ये शयनासने। उपानादिशिरः केचित्केचित्स्तूप्यन्तमुन्नतम् ॥५८॥ यह माप देवालयों में स्तम्भ के बाहर से लिया जाता है। (किन्तु) शयन एवं आसन के निर्माण में पाद (पाये = स्तम्भ) के अन्दर से लिया जाता है। (प्रासादों के निर्माण में ऊँचाई का माप) कुछ विद्वानों के अनुसार उपान से शिरःप्रदेश तक माप लेना चाहिये तथा कुछ के मतानुसार मापन कार्य प्रासाद की स्तूपी तक होना चाहिये। मुनयः प्रवदन्त्युच्चं प्रासादे सार्वदेशिके। पाद्बाह्ये पादमध्ये वा सभामण्डपयोर्मतम् ॥५९॥ सभी स्थानों पर प्रासादों की ऊँचाई का माप इसी प्रकार लेना चाहिये, ऐसा मुनियों का मत है। सभागार एवं मण्डप में स्तम्भों के बाहर से अथवा स्तम्भ के मध्य से माप-सूत्र ले जाना चाहिये।।५९।। अन्तर्बहिश्च मध्ये तु सालानां मानसूत्रकम्। युञ्जीयादेवमेवं तु सर्वेषां सम्पदां पदम् ॥६०॥ विपरीते विपत्त्यै स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः। भवनों में मानसूत्र बाहर (भित्ति अथवा स्तम्भ के बाहर) से, भीतर से एवं मध्य से प्रयुक्त होना चाहिये। इस प्रकार का (विविध प्रकार से मानसूत्र का) प्रयोग सभी सम्पदाओं को प्रदान करने वाला होता है। इसके विपरीत (मानसूत्र द्वारा भली-भाँति मापन न करने पर) होने पर गृहस्वामी के लिये विपत्तिकारक होता है, ऐसा शास्त्रों का मत है।।६०।। ✵ द्रव्यपरिग्रहः ✵ स्तम्भोत्तरादिकाङ्गानां द्रव्यं द्रुमोपलेष्टकाः ॥६१॥ पदार्थों का संग्रह—स्तम्भ एवं उत्तर (स्तम्भ के ऊपर निर्मित भित्ति) आदि अङ्गों में प्रयुक्त होने वाले द्रव्य काष्ठ, प्रस्तर एवं ईंटें हैं।।६१।। ✵ वृक्षलक्षणम् ✵ स्निग्धसारमहासारा ह्यवृद्धास्तरुणेतराः। अवक्रा निर्व्रणाः सर्वे ग्रहीतव्या महीरुहाः ॥६२॥ वृक्ष के लक्षण—(भवनों में प्रयुक्त होने वाले काष्ठ के गुण-धर्म इस प्रकार

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