भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१४८ मयमतम् हैं— ) स्निग्धसार ( ठोस एवं चिकना ), महासार ( अत्यन्त दृढ़ ), न ही बहुत पुराना तथा न ही अपरिपक्व हो, टेढ़ा न हो तथा वृक्ष में किसी प्रकार का चोट एवं दोष न हो; ऐसा वृक्ष गृहनिर्माण में ग्रहण करने योग्य होता है।।६२।। पुण्याद्रिवनतीर्थस्था दर्शनीया मनोरमाः । सर्वसम्पत्समृद्ध्यर्था भवेयुस्ते न संशयः ॥६३॥ पवित्र स्थल, पर्वत, वन एवं तीर्थों में स्थित, देखने में सुन्दर तथा मन को आकृष्ट करने वाले वृक्ष सभी प्रकार की सम्पत्ति एवं समृद्धि प्रदान करने वाले होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।।६३।। पुरुषः खदिरः सालो मधुकः चम्पकस्तथा । शिंशपार्जुनाजकर्णी क्षीरिणी पद्मचन्दनौ ॥६४॥ पिशितो धन्वनः पिण्डी सिंहो राजादनः शमी । तिलकश्च द्रुमाश्चैते स्तम्भवृक्षाः समीरिताः ॥६५॥ निम्बासनशिरीषाश्च एकः कालश्च कट्फलः । तिमिसो लिकुचश्चैव पनसः सप्तपर्णकः ॥६६॥ भौमा चैव गवाक्षी चैत्यादयश्चोर्ध्वभूरुहाः । स्तम्भ में प्रयोग के योग्य वृक्ष इस प्रकार हैं—पुरुष, कत्था, साल, महुआ, चम्पक, शीशम, अर्जुन, अजकर्णी, क्षीरिणी, पद्म, चन्दन, पिशित, धन्वन, पिण्डी, सिंह, राजादन, शमी एवं तिलक। इसी प्रकार निम्ब, आसन, शिरीष, एक, काल, कट्फल, तिमिस, लिकुच, कटहल, सप्तपर्णक, भौमा एवं गवाक्षी के वृक्ष भी ग्रहण करने योग्य होते हैं।।६४-६६।। ✵ शिलालक्षणम् ✵ एकवर्णाः स्थिराः स्निग्धाः सुखसंस्पर्शनान्विताः ॥६७॥ प्राचीनाश्चाप्युदीचीना भूमग्नाः शुभदाः शिलाः । शिला के लक्षण— शुभ शिला एक रंग की, दृढ़, ( किन्तु छूने पर ) चिकनी, छूने पर अच्छी लगने वाली, भूमि में गड़ी होने पर पूर्वमुख अथवा उत्तर की ओर मुख वाली होती है।।६७।। ✵ इष्टकालक्षणम् ✵ स्त्रीलिङ्गाश्चापि पुंल्लिङ्गा निर्दोषाश्च नपुंसकाः ॥६८॥