मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४५ समास्तरङ्गाश्चान्योन्यहीनाः सर्वत्र सम्मताः। अग्रनिष्क्राममर्धं वा त्रिभागं वा स्वतारतः ॥४५॥ सभी लहरें सम एवं एक-दूसरे से हीन नहीं होती हैं। इनका अग्र भाग एवं निष्क्राम ( प्रथम छोर से अन्तिम छोर ) अपने विस्तार का आधा अथवा तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये।।४५।। मुष्टिबन्धोपरिक्षिप्तव्यालसंहितिरूपवत् । सनालीकं समतलं सनाटकमथापि वा ॥४६॥ इसके ऊर्ध्व भाग में सर्प की कुण्डली के सदृश मुष्टिबन्ध होना चाहिये, जो नालियों के सहित समतल एवं नाटकों ( नाट्य चित्रों ) से युक्त हो।।४६।। भूतेभमकरैर्व्यालैसंयुक्तं चाग्रमण्डनम्। पार्श्वयोः पोतिकामध्ये पट्टं पादविशालवत् ॥४७॥ पोतिका के ऊर्ध्व भाग में भूत ( जीव-जन्तु ), गज, मकर एवं व्याल आदि का अलङ्करण होना चाहिये। पोतिका का मध्य पट्ट दोनों पार्श्वों में स्तम्भ के समान विस्तृत होना चाहिये।।४७।। रत्नबन्धक्रियावल्ली चित्रा वाग्रस्थपट्टिका। नानाचित्रैर्विचित्रा वा सा प्रोक्ता चित्रपोतिका ॥४८॥ जिस पोतिका की अग्रस्थ पट्टिका ( ऊपरी पट्टी पर ) रत्नजटित लता अङ्कित हो अथवा अनेक प्रकार के चित्रों से जिसकी सज्जा की गई हो, उसे चित्रपोतिका कहते हैं।।४८।। पत्रैर्विचित्रिता पत्रपोतिकेति प्रकीर्तिता। महार्णवतरङ्गाभतरङ्गाभा तरङ्गिणी ॥४९॥ चतुःषडष्टपङ्क्त्यर्कसंख्या वा स्युस्तरङ्गकाः। बहवोऽपि समाश्चैते चान्योन्याः स्युर्वराः क्रमात् ॥५०॥ विभिन्न प्रकार के पत्रों से अलंकृत पोतिका को पत्रपोतिका कहते हैं। जिस पोतिका में सागर के लहरों के सदृश लहरें निर्मित हों, वह तरङ्गिणी पोतिका होती है। इन लहरों की संख्या चार, छः, आठ, दश या बारह होनी चाहिये। अथवा बहुत-सी सम संख्याओं में लहरें होनी चाहिये, जो एक-दूसरे से आगे बढ़ती हुई हों।।४९-५०।। ❋ स्तम्भविषये विशेषः ❋ पादमर्धं त्रिपादं वा भित्तेः स्तम्भस्य निर्गतम्। चतुरस्रास्रवृत्तानां यथाक्रममिति स्मृतम् ॥५१॥ मय०-१०
१४६ मयमतम् स्तम्भ के विषय में विशेष—भित्ति के स्तम्भ का निर्गम इस प्रकार होना चाहिये— यदि चतुष्कोण हो तो चौथाई, अष्टकोण हो तो आधा तथा वृत्ताकर हो तो तीन चौथाई॥५१॥ द्विहस्ताद्यं चतुर्हस्तं स्तम्भान्तरमिति स्मृतम्। षडङ्गुलविवृद्ध्या तु नवभेदं प्रकीर्तितम्॥५२॥ स्तम्भान्तर दो हाथ से लेकर चार हाथ तक कहा गया है। छः-छः अङ्गुल की वृद्धि करते हुये इसके नौ भेद कहे गये हैं॥५२॥ गृहीतांशवशेनपि यथायुक्त्या प्रयोजयेत्। स्तम्भस्तम्भान्तरं सर्वं प्रासादे सार्वदेशिके ॥५३॥ सभी स्थानों पर सभी भवनों में यथोचित अंश ( उपर्युक्त मापों में से ) ग्रहण कर स्तम्भ एवं स्तम्भान्तर में प्रयोग करना चाहिये॥५३॥ विषमस्तम्भभागं तु वास्तुवस्तुविनाशनम्। सायतं चापि तत्सर्वं तन्नाम्नैव प्रपद्यते ॥५४॥ यदि स्तम्भ-स्थापन नियमानुकूल न हो तो वह भूमि एवं भवन ( तथा उसके स्वामी ) का विनाश करने वाला होता है। अनुकूल स्तम्भ-स्थापन कल्याण प्रदान करता है॥५४॥ दारुस्तम्भविशालं वा सार्धं द्वित्रिगुणं तु वा। शिलास्तम्भविशालं स्याद् देवानां नैव मानवे ॥५५॥ जितना विस्तृत काष्ठस्तम्भ होता है, उतना विस्तृत, उसका आधा, दुगुना या तीन गुना विस्तृत प्रस्तरस्तम्भ हो सकता है; किन्तु इसका प्रयोग केवल देवालय में होना चाहिये, मनुष्यालय में नहीं होना चाहिये॥५५॥ इष्टकाश्मद्रुमैः सर्वैः स्तम्भाः प्रोक्ताश्चिरन्तनैः । युग्मायुग्मं तु देवाना मयुग्मं तु नृणां मतम् ॥५६॥ प्राचीन मनीषियों ने सभी स्तम्भों को ईंट, प्रस्तर अथवा काष्ठ से निर्मित कहा है। देवगृहों में स्तम्भ की संख्या सम अथवा विषम हो सकती है; किन्तु मनुष्यों के गृह में स्तम्भों की संख्या विषम होनी चाहिये॥५६॥ अन्तःस्तम्भं बहिःस्तम्भमाजुसूत्रं यथा भवेत्। गृहाणां भित्तिमध्ये तु शालानां तु तथा भवेत् ॥५७॥ जिस प्रकार आजुसूत्र ( मापसूत्र ) हो, उसी के अनुसार अन्तःस्तम्भ एवं बहिःस्तम्भ
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४७ का निर्माण करना चाहिये। उसी के अनुसार गृह की भित्ति के मध्य शालाओं की भी स्थिति होनी चाहिये।।५७।। प्रासादानां तु पाद्बाह्ये पान्मध्ये शयनासने। उपानादिशिरः केचित्केचित्स्तूप्यन्तमुन्नतम् ॥५८॥ यह माप देवालयों में स्तम्भ के बाहर से लिया जाता है। (किन्तु) शयन एवं आसन के निर्माण में पाद (पाये = स्तम्भ) के अन्दर से लिया जाता है। (प्रासादों के निर्माण में ऊँचाई का माप) कुछ विद्वानों के अनुसार उपान से शिरःप्रदेश तक माप लेना चाहिये तथा कुछ के मतानुसार मापन कार्य प्रासाद की स्तूपी तक होना चाहिये। मुनयः प्रवदन्त्युच्चं प्रासादे सार्वदेशिके। पाद्बाह्ये पादमध्ये वा सभामण्डपयोर्मतम् ॥५९॥ सभी स्थानों पर प्रासादों की ऊँचाई का माप इसी प्रकार लेना चाहिये, ऐसा मुनियों का मत है। सभागार एवं मण्डप में स्तम्भों के बाहर से अथवा स्तम्भ के मध्य से माप-सूत्र ले जाना चाहिये।।५९।। अन्तर्बहिश्च मध्ये तु सालानां मानसूत्रकम्। युञ्जीयादेवमेवं तु सर्वेषां सम्पदां पदम् ॥६०॥ विपरीते विपत्त्यै स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः। भवनों में मानसूत्र बाहर (भित्ति अथवा स्तम्भ के बाहर) से, भीतर से एवं मध्य से प्रयुक्त होना चाहिये। इस प्रकार का (विविध प्रकार से मानसूत्र का) प्रयोग सभी सम्पदाओं को प्रदान करने वाला होता है। इसके विपरीत (मानसूत्र द्वारा भली-भाँति मापन न करने पर) होने पर गृहस्वामी के लिये विपत्तिकारक होता है, ऐसा शास्त्रों का मत है।।६०।। ✵ द्रव्यपरिग्रहः ✵ स्तम्भोत्तरादिकाङ्गानां द्रव्यं द्रुमोपलेष्टकाः ॥६१॥ पदार्थों का संग्रह—स्तम्भ एवं उत्तर (स्तम्भ के ऊपर निर्मित भित्ति) आदि अङ्गों में प्रयुक्त होने वाले द्रव्य काष्ठ, प्रस्तर एवं ईंटें हैं।।६१।। ✵ वृक्षलक्षणम् ✵ स्निग्धसारमहासारा ह्यवृद्धास्तरुणेतराः। अवक्रा निर्व्रणाः सर्वे ग्रहीतव्या महीरुहाः ॥६२॥ वृक्ष के लक्षण—(भवनों में प्रयुक्त होने वाले काष्ठ के गुण-धर्म इस प्रकार
१४८ मयमतम् हैं— ) स्निग्धसार ( ठोस एवं चिकना ), महासार ( अत्यन्त दृढ़ ), न ही बहुत पुराना तथा न ही अपरिपक्व हो, टेढ़ा न हो तथा वृक्ष में किसी प्रकार का चोट एवं दोष न हो; ऐसा वृक्ष गृहनिर्माण में ग्रहण करने योग्य होता है।।६२।। पुण्याद्रिवनतीर्थस्था दर्शनीया मनोरमाः । सर्वसम्पत्समृद्ध्यर्था भवेयुस्ते न संशयः ॥६३॥ पवित्र स्थल, पर्वत, वन एवं तीर्थों में स्थित, देखने में सुन्दर तथा मन को आकृष्ट करने वाले वृक्ष सभी प्रकार की सम्पत्ति एवं समृद्धि प्रदान करने वाले होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।।६३।। पुरुषः खदिरः सालो मधुकः चम्पकस्तथा । शिंशपार्जुनाजकर्णी क्षीरिणी पद्मचन्दनौ ॥६४॥ पिशितो धन्वनः पिण्डी सिंहो राजादनः शमी । तिलकश्च द्रुमाश्चैते स्तम्भवृक्षाः समीरिताः ॥६५॥ निम्बासनशिरीषाश्च एकः कालश्च कट्फलः । तिमिसो लिकुचश्चैव पनसः सप्तपर्णकः ॥६६॥ भौमा चैव गवाक्षी चैत्यादयश्चोर्ध्वभूरुहाः । स्तम्भ में प्रयोग के योग्य वृक्ष इस प्रकार हैं—पुरुष, कत्था, साल, महुआ, चम्पक, शीशम, अर्जुन, अजकर्णी, क्षीरिणी, पद्म, चन्दन, पिशित, धन्वन, पिण्डी, सिंह, राजादन, शमी एवं तिलक। इसी प्रकार निम्ब, आसन, शिरीष, एक, काल, कट्फल, तिमिस, लिकुच, कटहल, सप्तपर्णक, भौमा एवं गवाक्षी के वृक्ष भी ग्रहण करने योग्य होते हैं।।६४-६६।। ✵ शिलालक्षणम् ✵ एकवर्णाः स्थिराः स्निग्धाः सुखसंस्पर्शनान्विताः ॥६७॥ प्राचीनाश्चाप्युदीचीना भूमग्नाः शुभदाः शिलाः । शिला के लक्षण— शुभ शिला एक रंग की, दृढ़, ( किन्तु छूने पर ) चिकनी, छूने पर अच्छी लगने वाली, भूमि में गड़ी होने पर पूर्वमुख अथवा उत्तर की ओर मुख वाली होती है।।६७।। ✵ इष्टकालक्षणम् ✵ स्त्रीलिङ्गाश्चापि पुंल्लिङ्गा निर्दोषाश्च नपुंसकाः ॥६८॥
"( इस वर्ग के वृक्ष भी भवन के लिये अग्राह्य होते हैं )।।७३।।" - wait, look at the line breaks: Line 26: "वायु द्वारा तोड़ा गया, गजों द्वारा तोड़ा गया, समाप्त जीवन वाला, चण्डालवर्ग" Line 27: "के लोगों को शरण देने वाला तथा जिस वृक्ष के नीचे ( चण्डालवर्ग को छोड़ कर )" Line 28: "अन्य सभी वर्ग के लोग शरण लेते हों ( इस वर्ग के वृक्ष भी भवन के लिये अग्राह्य" Line 29: "होते हैं )।।७३।।" Let's check line 28-29 carefully in the image: Line 28 ends with: "अन्य सभी वर्ग के लोग शरण लेते हों ( इस वर्ग के वृक्ष भी भवन के लिये अग्राह्य" Line 29: "होते हैं )।।७३।।" Yes! Exactly.
Now verse 74: "नान्योन्यवलिता भग्ना न वल्मीकसमाश्रिताः ।" "न लतालिङ्गिता गाढा न सिराकोटरावृताः ॥७४॥" Wait, look at the text of verse 74 in the image: First line: "नान्योन्यवलिता भग्ना न वल्मीकसमाश्रिताः ।"
- नान्योन्यवलिता (ना, न्यो, न्य
१५० मयमतम् दो वृक्ष आपस में लिपटे हुये हों, टूटे हों, दीमक लगे हों, उस वृक्ष से घनी लता लिपटी हो तथा उस वृक्ष पर पक्षियों के घोसले हों इस प्रकार के वृक्ष भवन के लिये अग्राह्य होते हैं।।७४।। नाङ्कुरावृतसर्वाङ्गा न भृङ्गकीटदूषिताः । नाकालफलिनो ग्राह्या न श्मशानसमीपगाः ॥७४॥ जिस वृक्ष के सभी अङ्गों पर अङ्कुर निकले हों, भ्रमरों तथा कीटों से दोषयुक्त, विना समय फलने वाले तथा श्मशान के समीप उगे वृक्ष ( गृहनिर्माण के लिये ) ग्राह्य नहीं होते हैं।।७५।। सभाचैत्यसमीपस्था देवादीनां न भूरुहाः । वापीकूपतटाकादिवस्तुष्वपि च सम्भवाः ॥७६॥ सभागार एवं चैत्य ( ग्राम का पूजनीय स्थल ) के समीप तथा देवालय के समीप उगे वृक्ष तथा वापी, कूप एवं तालाब आदि निर्माण-स्थलों पर उगे वृक्ष भी ( भवन- निर्माण के लिये ) ग्राह्य नहीं होते हैं।।७६।। विनष्टवस्तुसञ्जातद्रव्यं सर्वविपत्करम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुद्धं द्रव्यं प्रगृह्यताम् ॥७७॥ अग्राह्य वृक्षादि से निर्मित पदार्थ ( जब भवन में प्रयुक्त होते हैं तो ) सभी प्रकार की विपत्तियों के कारक बनते हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक शुद्ध पदार्थों को ही लेना चाहिये।।७७।। शिला देवालये ग्राह्या द्विजावनिपयोर्मताः । पाषण्डिनां च कर्तव्या न कुर्याद्वैश्यशूद्रयोः ॥७८॥ प्रस्तर का प्रयोग देवालय, ब्राह्मण, राजा तथा पाषण्डियों ( विधर्मी ) के गृह में होना चाहिये; किन्तु वैश्य एवं शूद्र के भवन में नहीं करना चाहिये।।७८।। कर्तव्यं यदि तद्वास्तु धर्मकामार्थनाशकृत् । एकद्रव्यकृतं शुद्धं मिश्रं द्विद्रव्यनिर्मितम् ॥७९॥ त्रिद्रव्यसंयुतं यत्तु तत् सङ्कीर्णमुदाहृतम् । पूर्वोदितानां वासेषु कर्तव्यं सम्पदां पदम् ॥८०॥ यदि उस प्रकार का ( वैश्य एवं शूद्र के भवन में शिलाप्रयोग ) भवन निर्मित किया गया तो वह धर्म, काम एवं अर्थ का नाश करता है। एक पदार्थ से निर्मित भवन की संज्ञा 'शुद्ध', दो द्रव्य से निर्मित भवन 'मिश्र' तथा तीन द्रव्य-मिश्रित पदार्थ से
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५१ निर्मित भवन की संज्ञा 'सङ्कीर्ण' होती है। पहले वर्णित नियमों के अनुसार निर्मित भवन सम्पत्ति प्रदान करता है॥७९-८०॥ ✵ वृक्षसंग्रहणम् ✵ सर्वद्वारिकनक्षत्रे शुभपक्षमूहूर्तके । गच्छेदरण्यं द्रव्यार्थी कृतकौतुकमङ्गलः॥८१॥ काष्ठ हेतु वृक्ष का संग्रह—(गृहनिर्माण हेतु काष्ठ के संग्रह के लिये) पदार्थों की कामना रखने वाले (गृहस्वामी) को शुभ कृत्य करके सर्वद्वारिक नक्षत्र में शुभ (शुक्ल) पक्ष में एवं शुभ मुहूर्त में वन की ओर प्रस्थान करना चाहिये॥८१॥ निमित्तैः शकुनैर्योग्यैः सह मङ्गलशब्दकैः । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैश्च मांसेन कृसरेण च॥८२॥ पायसौदनमत्स्यैश्च भक्ष्यैश्चापि पृथग्विधैः । अर्चयेदीप्सितान् सर्वान् वृक्षांश्च वनदेवताः॥८३॥ अच्छे लक्षणों वाले शकुनों एवं मङ्गलध्वनि के साथ वनदेवताओं एवं सभी अभीष्ट वृक्षों की गन्ध, पुष्प, धूप, मांस, खिचड़ी, दूध, भात, मछली एवं विविध प्रकार की भोज्य सामग्रियों से पूजा करनी चाहिये॥८२-८३॥ भूतक्रूरबलिं दत्त्वा कर्मयोग्यद्रुमं हरेत् । मूलाग्रादार्जवं वृत्तं शाखानेकसन्वितम्॥८४॥ (वृक्षों में निवास करने वाले) भूतों (प्रेत, पिशाच, ब्रह्म आदि) के लिये क्रूर बलि (रक्त, मांस आदि) देकर अपने कार्य के अनुकूल वृक्ष का चयन करना चाहिये। ये वृक्ष जड़ से शिरोभाग तक सीधे, गोलाकार एवं अनेक शाखाओं से युक्त होने चाहिये॥८४॥ तत्तु पुंस्त्वं भवेन्मूले स्थूलं स्त्रीत्वं कृशाग्रकम् । स्थूलाग्रं कृशमूलं तु षण्डमेतदुदीरितम्॥८५॥ उपर्युक्त वृक्ष 'पुरुष' होते हैं। जो वृक्ष मूल में स्थूल एवं ऊर्ध्व भाग में पतले होते हैं, वे 'स्त्री' वृक्ष हैं तथा जिनका मूल कृश एवं ऊर्ध्व भाग स्थूल हो, वे वृक्ष 'षण्ड' (नपुंसक) होते हैं॥५८॥ मुहूर्तस्तम्भमुद्दिश्य पुम्भूरुह उदीरितः । सर्वेष्वङ्गेषु वस्तूनां पुंस्त्रीषण्डं प्रकीर्तितम्॥८६॥ 'मुहूर्तस्तम्भ' (शिलान्यास के स्थान पर स्थापित होने वाला स्तम्भ) पुरुष वृक्ष
१५२ मयमतम् का होना चाहिये। गृह के अन्य भागों के लिये पुरुष, स्त्री एवं षण्ड तीनों वृक्षों का प्रयोग हो सकता है।।८६।। पूर्वशायां द्रुमस्यास्य स्वपेद् दर्भान्तरे शुचिः । स्वप्रदक्षिणपार्श्वे तु संस्थाप्य परशुं सुधीः ।।८७।। (काष्ठानयन के लिये गये व्यक्ति को) बुद्धिमान एवं पवित्र व्यक्ति (स्थपति) को वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में कुश बिछा कर एवं अपने दाहिने भाग में परशु रख कर रात्रि में वहीं शयन करना चाहिये।।८७।। पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावपराभिमुखोऽपरः । स्थपतिर्वरवेषाढ्यो मन्त्रयेत् सपरश्वधः ।।८८।। इसके पश्चात् रात्रि (शेष रहने पर) शुद्ध जल पीकर पश्चिमाभिमुख होकर सुन्दर वेष धारण कर हाथ में परशु लेकर स्थपति को इस प्रकार मन्त्रपाठ करना चाहिये।।८८।। अयं मन्त्रः— अपक्रामन्तु भूतानि देवताश्च सगुह्यकाः । युष्मभ्यं तु बलं भूयः सोमो दिशतु पादपाः! ।।८९।। इस वृक्ष से भूत-प्रेत, देवता, गुह्यक आदि दूर हो जायें। हे वृक्षों! आपको सोम देवता बल प्रदान करें।।८९।। शिवमस्तु महीपुत्रा! देवताश्च सगुह्यकाः! । कर्मैतत् साधयिष्यामि क्रियतां वासपर्ययः ।।९०।। हे वृक्षों, देवों एवं उनके साथ गुह्यकों! (हमारा) कल्याण हो। मैं अपना (इन काष्ठों से गृहनिर्माणरूपी) कार्य सिद्ध करना चाहता हूँ। आप दूसरे स्थान पर निवास ग्रहण करें।।९०।। एवमुक्त्वा नमस्कृत्य पादपेभ्यो नमः शुचिः । दुग्धतैलघृतैः सम्यक् सन्तेज्य परशोर्मुखम् ।।९१।। इस प्रकार मन्त्र बोल कर पवित्र स्थपति वृक्षों को प्रणाम करके दूध, तेल एवं घी से परशु (फरसा, कुल्हाड़ी) के मुख (धार) को भली-भाँति तेज करे।।९१।। उपक्रामेत्तु तं छेत्तुं यथाकामं वनस्पतिम् । मूले हस्तं व्यपोहोर्ध्वं त्रिशिछत्वा तत्र लक्षयेत् ।।९२।। (परशु को तेज करके) उस अभीष्ट वृक्ष के पास उसे काटने के लिये जाना चाहिये। उस वृक्ष के मूल से एक हाथ छोड़कर तीन बार (परशु द्वारा) छेद कर उसका निरीक्षण करना चाहिये।।९२।।
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५३ वारिस्रावो विवृद्ध्यर्थः क्षीरं पुत्रविवर्धनम्। शोणितं स्वामिनं हन्याद्वर्जयेत्तं प्रयत्नतः ॥९३॥ कटे स्थान से यदि जल बहे तो वह वृक्ष गृहस्वामी को वृद्धि प्रदान करता है। यदि दूध का स्राव हो तो पुत्रों की वृद्धि प्रदान करने वाला तथा रक्त का ( लाल वर्ण का स्राव ) स्राव गृहस्वामी को मृत्यु प्रदान करने वाला होता है। ऐसे वृक्ष को प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिये॥९३॥ पतने सिंहशार्दूलहस्तिशब्दाः सुशोभनाः । रुदितं हसितं क्रोशं कूजितं निन्दितं वरैः ॥९४॥ कटे वृक्ष के गिरने के समय यदि सिंह, शार्दूल एवं गज के स्वर सुनाई पड़ें तो शुभ होता है। इसके विपरीत विद्वानों ने रोदन, हँसने, आक्रोशपूर्ण एवं गुञ्जन के स्वर को निन्दनीय कहा है॥९४॥ पातयेदुत्तराग्रं तु पूर्वाग्रं वा वनस्पतिम् । ते दिशौ शुभदे स्यातामन्याशासु विपर्यये ॥९४॥ वृक्ष यदि पूर्व या उत्तर दिशा की ओर अभिमुख होकर गिरे तो दोनों दिशायें शुभ होती हैं। अन्य दिशाओं में वृक्ष का पतन विपरीत परिणाम प्रदान करता है॥९५॥ सालाश्मर्यजकर्णीनामूर्ध्वं तु पतनं शुभम्। मूले पृष्ठागमे बन्धुप्रेष्ययोश्च विनाशनम् ॥९६॥ यदि साल, अश्मरी एवं अजकर्णी वृक्षों का ऊर्ध्व भाग गिरे तो शुभ; किन्तु यदि पतन होते समय ऊपरी भाग नीचे एवं पृष्ठ या मूल भाग ऊपर होकर गिरे तो गृहस्वामी के बन्धु-बान्धवों एवं परिचारकों का विनाश होता है॥९६॥ निर्गमत्स्थितिमद् भूत्वा वृक्षान्तरनिपातने । शिरःसङ्गेन नाशः स्यान्मूलसङ्गे श्रमो भवेत् ॥९७॥ काटने के पश्चात् अन्य वृक्षों के मध्य गिरता हुआ वृक्ष यदि अन्य वृक्षों के शीर्ष भाग से सहारा पाकर गिरने से रुक जाता है तो गृहस्वामी का विनाश होता है तथा जड़ के सहारे रुकने पर गृहस्वामी के अस्वास्थ्य का कारण बनता है॥९७॥ शरीरभङ्गं कर्तॄणां नाशमग्रेऽप्यपत्यहृत् । अन्योन्यपतनं पूज्यं छेदं चोभयतः समम् ॥९८॥ यदि वृक्ष का मध्य भाग टूट जाय तो वृक्ष काटने वाले का नाश होता है तथा शीर्ष भाग के टूटने पर सन्तति का नाश होता है। वृक्षों का एक-दूसरे पर गिरना ( एक
१५४ मयमतम् वृक्ष के ऊपर दूसरे कटे वृक्ष का गिरना) प्रशस्त होता है। वृक्षों के दोनों भागों को बराबर काटना चाहिये ।।९८।। चतुरस्रमृजुं कृत्वा मुहूर्त्तस्तम्भसंग्रहे । सितपट्टेन सञ्छाद्य स्यन्दने न्यस्य वेशयेत् ॥९९॥ (कटे वृक्ष के दोनों छोरों को बराबर काट कर) काष्ठ को चौकोर एवं सीधा बनाना चाहिये तथा उसे मुहूर्त्तस्तम्भ के लिये ग्रहण करना चाहिये। तत्पश्चात् उस काष्ठ को श्वेत वस्त्र से ढँककर स्यन्दन (रथ, गाड़ी) में रखना चाहिये।।९९।। देवद्विजमहीपानां विशां वै शकटेन तु । शूद्रस्य पुरुषस्कन्धेनानीयात्तु विचक्षणः ॥१००॥ देवों, ब्राह्मणों, राजाओं एवं वैश्यों का काष्ठ शकट (गाड़ी) द्वारा ले जाया जाना चाहिये तथा बुद्धिमान व्यक्ति को शूद्र के गृह का काष्ठ पुरुष के कन्धों द्वारा ढ़ोकर ले जाना चाहिये।।१००।। पार्श्वयोः शाययित्वा तु शकटे न्यस्य वेशयेत् । प्रशस्ते द्वारि प्रग्राह्य स्थपत्यनुगतद्रुमम् ॥१०१॥ वृक्षों (काष्ठों) को लिटा कर दोनों पाश्यों से शकट में रखना चाहिये। स्थपति द्वारा चुने गये वृक्षों को प्रशस्त द्वार द्वारा (कर्ममण्डप में) प्रवेश कराना चाहिये।।१०१।। कर्ममण्डपके न्यस्य बालुकोपरि शाययेत् । प्रागग्रं चोत्तराग्रं वाप्याशुष्कं रक्षयेत् पुनः ॥१०२॥ कर्ममण्डप (कार्यशाला) में वृक्षों का प्रवेश कराकर उन्हें बालू पर लिटा देना चाहिये। उनका शीर्ष भाग पूर्व अथवा उत्तर की ओर होना चाहिये। इनके सूखने तक इनकी रक्षा करनी चाहिये।।१०२।। परावृत्तं न कर्तव्यमाषण्मासं तु स द्रुमः । सर्वेन्द्रकीला एवं स्युः प्रापणीयाः प्रयत्नतः ॥१०३॥ छः मासों तक इन वृक्षों को अपने स्थान से नहीं हिलाना चाहिये। इसी प्रकार सभी इन्द्रकीलों (कीलों) को भी प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये।।१०३।। अन्येषामपि कुप्यानां वेशने त्वग्रमग्रतः । अन्य धातु आदि पदार्थों का संग्रह करके उन्हें भी इसी प्रकार करना चाहिये। ❋ मुहूर्त्तस्तम्भः ❋ मुहूर्त्तस्तम्भो देवानां द्विजातीनां यथाक्रमम् ॥१०४॥
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५५ कार्तमालश्च खदिरः खादिरश्च मधूककः । राजादनो यथासङ्ख्यं विस्तारायाममुच्यते ॥१०५॥ मुहूर्त्त-स्तम्भ—देवों एवं द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) के मुहूर्त्तस्तम्भ ( का काष्ठ ) क्रमशः इस प्रकार होता है—कार्तमाल, खदिर, खादिर, मधूक एवं राजा- दन। इनका विस्तार एवं लम्बाई क्रमशः इस प्रकार वर्णित है—॥१०४-१०५॥ भानुरुद्रदशद्वारवितस्त्यायामसंयुताः । तत्सङ्ख्याङ्गुलिविस्तीर्णाः पङ्क्त्यंशोनाग्रविस्तराः ॥१०६॥ इनकी ऊँचाई ( या लम्बाई ) बारह, ग्यारह, दश या नौ वितस्ति ( बित्ता ) एवं विस्तार भी इतने ही अंगुल का होता है। इसके अग्र भाग ( शीर्ष भाग ) का विस्तार दश भाग कम होता है॥१०६॥ भूतसार्धचतुर्वेदगुणतालनिखातकाः । भूमिभूमिवशादुक्तं स्तम्भोच्चं विपुलं तु वा ॥१०७॥ गर्त में रहने वाले मूल भाग की चौड़ाई पाँच, साढ़े चार, चार या तीन बित्ता होनी चाहिये। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई एवं चौड़ाई भवन के तल के अनुसार रखनी चाहिये॥१०७॥ झषालाङ्घ्रौ तु सर्वत्र निखातं परिवर्जयेत्। झषालाङ्घ्रि स्तम्भ में सभी स्थानों पर गर्त का परित्याग करना चाहिये॥१०७॥ अश्वत्थोदुम्बरश्चैव प्लक्षश्च वटवृक्षकः ॥१०८॥ सप्तपर्णश्च बिल्वश्च पलाशः कुटजस्तथा। पीलुः श्लेष्मातकी लोध्रः कदम्बः पारिजातकः ॥१०९॥ शिरीषः कोविदारश्च तिन्त्रिणीको महाद्रुमः । शिलीन्ध्रः सर्पमारश्च शाल्मली सरलस्तथा ॥११०॥ किंशुकश्चारिमेदश्चाभयाक्षामलकद्रुमाः । कपित्थः कण्टकश्चैव पुत्रजीवश्च डुण्डुकः ॥१११॥ कारस्करः करञ्जश्च वरणश्चाश्वमारकः । बदरो वकुलः पिण्डी पद्माकस्तिलकस्तथा ॥११२॥ पाटल्यगरुकर्पूरा न ग्राह्या गृहकर्मणि । देवयोग्या इमे सर्वे मानुषाणामनर्थदाः ॥११३॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गृह्णीयान्न नरालये।
१५६ मयमतम् अश्वत्थ ( पीपल ), उदुम्बर ( गूलर ), प्लक्ष ( पाकड़ ), वट ( बरगद ), सप्तपर्ण, बिल्व ( बेल ), पलाश, कुटज, पीलु, श्लेष्मातकी ( लिसोढ़ा ), लोध्र, कदम्ब, पारिजात, शिरीष, कोविदार ( कचनार ), तिन्त्रिणी, महाद्रुम, शिलीन्ध्र, सर्पमार, शाल्मली ( सेमल ), सरल ( चीड़ ), किंशुक, अरिमेद, अभया, अक्ष, आमलकद्रुम, कपित्थ ( कैथा ), कण्टक, पुत्रजीव, डुण्डुक, कारस्कर, करञ्ज, वरण, अश्ममारक, बदर, वकुल, पिण्डी, पद्मक, तिलक, पाटली, अगरु तथा कपूर के वृक्षों का प्रयोग गृहनिर्माण में नहीं करना चाहिये। ये सभी वृक्ष देवों के योग्य हैं; लेकिन मनुष्यों के लिये अनर्थकारक होते हैं। इसलिये मनुष्यों के गृह-निर्माण के लिये इनको प्रयत्नपूर्वक नहीं ग्रहण करना चाहिये अर्थात् इन वृक्षकाष्ठों का परित्याग कर देना चाहिये। ✱ इष्टकासंग्रहणम् ✱ ऊषरं पाण्डुरं कृष्णचिक्कणं ताम्रपुल्लकम् ॥१९४॥ ईंटों का संग्रह—( मृत्तिका चार प्रकार की होती है— ) ऊषर ( लोनी, नमकीन ), पाण्डुर ( सफेद ), कृष्ण-चिक्कण ( काली और चिकनी ) एवं ताम्रपुल्लक ( लाल वर्ण की खिली हुई ) ॥१९४॥ मृदश्चतस्रस्तास्वेव गृह्णीयात्ताम्रपुल्लकम् । अशर्कराश्ममूलास्थिलोष्ठं सतनुवालुकम् ॥१९५॥ मृत्तिकायें चार प्रकार की होती हैं। इनमें ताम्रपुल्लक मृत्तिका इष्टकादि के लिये ग्रहण करने योग्य होती है। इसमें कंकड़, पत्थर, जड़ एवं अस्थि के टुकड़े नहीं होने चाहिये; साथ ही इसमें महीन बालू होना चाहिये।। १९५ ।। एकवर्णं सुखस्पर्शमिष्टं लोष्टेष्टकादिषु । मृत्खण्डं पूरयेदग्रे जानुदध्ने जले ततः ॥१९६॥ यह मृत्तिका एक रंग की एवं छूने में सुखद होनी चाहिये। लोष्ट ( टाइल्स ) एवं ईंट के निर्माण के लिये ( गर्त में ) घुटने के बराबर जल में मिट्टी डालनी चाहिये।। १९६ ।। आलोड्य मर्दयेत्पद्भ्यां चत्वारिंशत्पुनः पुनः । क्षीरद्रुमकदम्बाम्राभयाक्षत्वग्जलैरपि ॥१९७॥ त्रिफलाम्बुभिरासिक्त्वा मर्दयेन्मासमात्रकम् । मिट्टी एवं पानी को अच्छी तरह से मिलाकर पैरों से चालीस बार उनका मर्दन करना चाहिये। इसके पश्चात् क्षीरद्रुम, कदम्ब, आम, अभया एवं अक्ष वृक्ष के छाल के जल से एवं त्रिफला के जल से सिञ्चित कर तीस बार मर्दन करना चाहिये अर्थात् पैरों से सानना चाहिये।। १९७।।
'गञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५७ चतुष्पञ्चषडष्टाभिर्मात्रैस्तद्द्विगुणायतः ॥११८॥ व्यासार्धार्धत्रिभागैकतीव्रा मध्ये परेऽपरे। इष्टका बहुशः शोष्याः समदग्धाः पुनश्च ताः ॥११९॥ ( उपर्युक्त विधि से तैयार की गई मिट्टी से ) चार, पाँच, छः या आठ अङ्गुल चौड़ी, चौड़ाई की दुगुनी लम्बी तथा चौड़ाई की चतुर्थांश, आधा अथवा तीसरे भाग के बराबर मोटी ईंटों का निर्माण करना चाहिये। इनकी मोटाई एक छोर से दूसरे छोर तक बराबर होती है। ईंटों को पूर्ण रूप से सुखाकर पुनः इन्हें समान रूप से पकाया जाता है॥११८-११९॥ एकद्वित्रिचतुर्मासमतीत्यैव विचक्षणः। जले प्रक्षिप्य यत्नेन जलादुद्धृत्य तत्पुनः। निरार्द्रास्ताः प्रयोक्तव्या इष्टका इष्टकर्मणि ॥१२०॥ इसके पश्चात् एक, दो, तीन या चार मास बीत जाने पर बुद्धिमान ( स्थपति ) को ईंटों को यत्नपूर्वक जल में डाल कर पुनः जल से निकालना चाहिये। जब ईंटें सूख जायें तब इच्छित निर्माणकार्य में इनका प्रयोग करना चाहिये॥१२०॥ एवं द्रुमेष्टकशिला विधिना गृहीत्वा कुर्वन्तु वस्तु विहिता हि वराः समृद्धयै। यन्निन्दितं त्वपरवस्तववशिष्टमाद्यै- र्द्रव्यं विनष्टभवनप्रभवं विपत्त्यै ॥१२१॥ इस प्रकार विधिपूर्वक वृक्ष ( काष्ठ ), ईंट एवं शिला आदि लेकर भवननिर्माण करना चाहिये। श्रेष्ठ जन ऐसे भवन को समृद्धिकारक कहते हैं। जो पदार्थ निन्दित हैं अथवा दूसरे भवन से लिये गये हैं ( पुराने भवन से निकले ईंट, काष्ठ आदि ), उनसे निर्मित भवन नष्ट हो जाते हैं तथा ( गृहस्वामी के लिये ) विपत्ति के कारण बनते हैं, ऐसा प्राचीन जनों का मत है॥१२१॥ स्तम्भायामं तारमाकारभेदं सालङ्कारं भूषणं च क्रमेण। युक्त्या युक्तं सम्पदामास्पदं तत् प्रोक्तं नृणां तैतिलानां मयेह ॥१२२॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहो नाम पञ्चदशोऽध्यायः
१५८ मयमतम् स्तम्भों की लम्बाई, मोटाई एवं आकारों का वर्णन उनके अलङ्कार एवं सज्जा- सहित क्रमानुसार किया गया है। मनुष्यों एवं देवों के गृह में विधिपूर्वक इनका प्रयोग सम्पत्ति प्रदान करता है, ऐसा मय द्वारा वर्णित है।।१२२।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. स्तम्भ के मान एवं भेद ( श्लोक १-२८ ) (क) समराङ्गणसूत्रधार (२८.२७-३३) में पद्मकस्तम्भ, घटपल्लवक स्तम्भ, कुबेर एवं श्रीधर संज्ञक चार स्तम्भों का उल्लेख किया गया है। विभिन्न प्रकार के अलङ्करणों से युक्त पद्मकस्तम्भ, अष्टकोण घटिका, पुष्पमाला एवं पल्लव आदि से अलंकृत घटपल्लवक स्तम्भ, षोडश कोण से युक्त कुबेरस्तम्भ तथा ऊपर पल्लवों से युक्त चौकोर श्रीधर संज्ञक स्तम्भ होते हैं— एवं गृहाणां चत्वारः स्तम्भा लक्ष्मभिरीरिताः। (२८.३३) (ख) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६४ अ. ) में स्तम्भों को सभी निर्माण का आधार कहा गया है। इसका निर्माण सुकरता, सुख एवं शोभा के लिये किया जाता है। इसका निर्माण प्रस्तर, धातु, काष्ठ अथवा इष्टकाओं द्वारा किया जाता है— निर्माणस्य यथा भूमिराधारस्सम्प्रकीर्तितः। तथा तस्याधारमाहुः पादं शिल्पविशारदाः ।।१।। सौकर्यञ्च सुखं शोभालाभः पादप्रकल्पनात्। तस्मात्तत्कल्पयेच्छिल्पी शिलालोहद्रुमेष्टकैः ।।२।। इस ग्रन्थ में बारह प्रकार के स्तम्भों का वर्णन किया गया है। ये हैं—देवकान्त, ब्रह्मकान्त, इन्द्रकान्त, विष्णुकान्त, स्कन्दकान्त, सोमकान्त, सुप्रतीकान्त, सूर्यकान्त, ब्राह्मणकान्त, कैलासकान्त, मेरुकान्त एवं नन्दिकान्त स्तम्भ। आकृति एवं लक्षण- सहित इनका वर्णन इस प्रकार है— देवकान्तं ब्रह्मकान्तमिन्द्रकान्तमथापि वा।।३।। विष्णुकान्तं स्कन्दकान्तं सोमकान्तमिति क्रमात्। वर्तुलं चतुरस्रञ्च षडस्रन्त्वष्टपट्टिकम् ।।४।। द्वादशास्रं षोडशास्रं पादकल्पं विदुर्बुधाः। पुरः पश्चात्सर्वतो वा कल्पस्तम्भप्रकल्पनम्।।५।। युग्मद्वियुग्मसङ्कीर्णोपस्तम्भादिप्रकल्पनम् । सुप्रतीकान्तकं सूर्यकान्तं ब्राह्मणकान्तकम्।।६।।
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५९ कैलासमेरुकं कान्तं तथा नन्दीशकान्तकम्। इति द्वादशभेदेन स्तम्भानां कल्पनं मतम्।।७।। इनके प्रमाण एवं अलङ्करण का भी वर्णन प्राप्त होता है (८-३४ श्लोक)। इन पर गज, वाजन, चक्रवाक, हंस, शुक, सारिका, विभिन्न देवता, लता, पुष्प आदि का अङ्कन करना चाहिये। इनके लिये उपयुक्त काष्ठ तिलक, शाल, श्रीपर्ण, चन्दन, शमी आदि सारवान एवं दोषरहित वृक्षों से ग्रहण करने चाहिये। (ग) राजवल्लभमण्डन (अ. ५) में स्तम्भ के विषय में इस प्रकार वर्णन प्राप्त होता है— स्तम्भोऽष्टास्रसुवृत्तभद्रसहितो रूपेण चालङ्कृतो युक्तः पल्लवकैस्तथाभरणकं स्यात्पल्लवेनावृतम्। कुम्भी भद्रयुता कुमारसहितं शीर्ष तथा किन्नराः पत्रं चेति गृहे न शोभनमिदं प्रासादके शस्यते।। (५.३३) स्तम्भ अष्टकोणीय, वृत्ताकार, भद्रयुक्त, विविध रूपों से सुसज्जित, पल्लव, आभरण, कुम्भी, भद्र, कुमार एवं शीर्ष पर किन्नर से युक्त होना चाहिये। इस प्रकार का स्तम्भ देवालय में प्रशस्त होता है। (घ) मनुष्यालयचन्द्रिका (५ अ. २१-२५) में दृढ़ अधिष्ठान के लिये ओमा, घट, मण्डि अथवा घटफलक, वीरकाण्ड एवं पोतिका संज्ञक अवयवों का निर्माण किया जाता है। इन स्तम्भों का मध्य भाग गृहकर्त्ता को रुचि के अनुसार चौकोर, गोल, अष्ट अथवा षोडश कोण बनाना चाहिये। स्तम्भ की स्थापना के लिये स्तम्भ के मूल में स्थित ओमा में गर्त बनाना चाहिये। स्तम्भ में मूलाग्र (लकड़ी की चूल) निर्मित कर उसे ओमा में स्थापित किया जाता है— स्तम्भाः स्वविस्तारहुताशभागप्रक्लृप्तमूलाग्रशिखासमेताः। स्थाप्या यथार्हं निजपीठकोर्ध्वं तद्गर्तसंलग्नशिखाः समस्ताः।।२३।। (ङ) शिल्परत्न (पूर्वभाग २१ अ.) में स्तम्भों के माप, अङ्ग, आकृति एवं अलङ्करण आदि का.विस्तार से वर्णन किया गया है। इनमें चौकोर स्तम्भ ब्रह्मकान्त, अष्टकोण विष्णुकान्त (५८ श्लोक), षट्कोण इन्द्रकान्त या स्कन्दकान्त, द्वादश कोण भानुकान्त, षोडश कोण चन्द्रकान्त (५९), वर्तुलाकार ईशकान्त, मूल में चौकोर एवं मध्य में अष्टकोण रुद्रकान्त स्तम्भ (६०-६१) होते हैं। अलङ्करणों के अनुसार भद्रकान्त, वज्रकान्त आदि स्तम्भों के भेद वर्णित हैं। स्तम्भों का सामान्य वर्णन इस प्रकार किया गया है— कार्याः स्युश्चरणा युगाष्टनृपकोणाः सर्वतो वर्तुला विस्तारत्रिगुणोपरित्रिगुणविस्तारोन्मिताष्टास्रकाः ।
१६० मयमतम् मूलोद्भावितकर्णसूत्रचतुरस्रोर्ध्वांशवृत्तः पुनः शुण्डूद्भेदविचित्रवृत्तिरुचिरा वारब्धगेहोचिताः ।।५७।। लगभग यही श्लोक तन्त्रसमुच्चय (२.२४) में भी प्राप्त होता है। (च) मत्स्यपुराण (२५५.३-६) में पाँच प्रकार के स्तम्भों द्विवज्र, षोडशास्र, बत्तीस कोण, प्रलीनक एवं वृत्ताकार का वर्णन, उनके पद्म-कुम्भादि अङ्गों का एवं अलङ्करण का उल्लेख प्राप्त होता है— द्विवज्रः षोडशास्रस्तु द्वात्रिंशास्रः प्रलीनकः। मध्यप्रदेशे यः स्तम्भो वृत्तो वृत्त इति स्मृतः।। एते पञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्ववास्तुषु। पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूपिताः ।। स्तम्भस्य नवांशेन पद्मकुम्भान्तराणि तु। स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः।। त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुर्भागेन वा पुनः। हीनं हीनं चतुर्थांशात्तथा सर्वासु भूमिषु।। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त बृहत्संहिता (५३.२८-२९), प्रासादमण्डन (७.१४), अपराजितपृच्छा (१८४), क्षीरार्णव, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव, ईशानशिवगुरुदेवपद्धति आदि ग्रन्थों में भी स्तम्भ का वर्णन प्राप्त होता है। २. कलश ( श्लोक ३१ ) कलश के विषय में ईशानशिवगुरुदेवपद्धति एवं शिल्परत्न में इस प्रकार प्राप्त होता है— (क) पोतिकाखण्डमण्डीनि कुम्भं लशुनमूलकम्। अम्भोजमालास्थानानि स्तम्भाग्रे योजयेत् क्रमात्।। अग्रहीनं तु लशुनं मूलोच्चं विपुलं भवेत्। (क्रिया०-३१.६०-६१) (ख) बोधिकाखण्डमण्डीनि कुम्भं लशुनमूलकम्। अम्भोजमालां चान्तानि पादपीठं पुनः क्रमात्।। क्रमेण योजयेद्ग्रात् सर्वस्तम्भेषु बुद्धिमान्। तत्र बोधिकया हीनं कारयेद् वापि पीठकम्।। (शिल्परत्न, पूर्व०-२१.११६-११७)
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १६१ ( श्लोक ३२-३४ ) कलश के विषय में मयमत के साथ अन्य ग्रन्थों में प्राप्त वर्णन की तुलना इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है—
| मयमत | अजिता<br>(१४.३४-३६) | दीप्तागम<br>(५.२३-२४) | ईशानशिव-<br>गुरुदेवपद्धति<br>(क्रिया.३१.५१-५३) | शिल्परत्न<br>(२१.७९-८०) |
|---|---|---|---|---|
| दृग् १।९ | दृग् १।९ | धृग् १।९ | धृग् १।९ | धृग् १।९ |
| कमल ४।९ | कुम्भ ४।९ | कलश ४।९ | कुम्भ ४।९ | घट ४।९ |
| कण्ठ १।९ | कण्ठ १।९ | कण्ठ १।९ | कण्ठ १।९ | कर्ण १।९ |
| आस्य १।९ | आस्य १।९ | आस्य १।९ | मुख १।९ | मुख १।९ |
| पद्म १।९ | पद्म १।९ | पद्म १।९ | पद्म १।९ | पद्म १।९ |
| वृत्त १।१८ | वृत्त- | वृत्त- | वृत्त १।१८ | पीठिका १।९ |
| हीरकौ १।१८ | ग्रीव १।९ | भित्रौ १।९ | भिन्नकौ १।१८ | |
| ( मयमत में ब्रूनो डेगेन्स की टिप्पणी २०, पृष्ठ १८९ ) | ||||
| ३. पोतिका ( श्लोक ३९-५० ) | ||||
| स्तम्भ के शीर्षभाग पर वीरकाण्ड के ऊपर स्थापित होता है। इसके विषय में | ||||
| अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार प्राप्त होता है— | ||||
| (क) मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में इसे रूपोत्तर को सहारा देने वाला अङ्ग | ||||
| कहा गया है। इसका माप इस प्रकार वर्णित है— | ||||
| स्तम्भाग्रोत्तरतारयोगदलविस्तारं तथा स्तम्भम- | ||||
| ध्योद्यद्व्यासतातं च तद्गलघनां रूपोत्तरे पोतिकाम्।। (२९) | ||||
| पत्रोत्तरे चेद् वितताङ्घ्रिहीनतीव्रा विधेया खलु पोतिकेयम्। | ||||
| खण्डोत्तरे तुल्यवितानतीव्रा सर्वांश्च सर्वेषु यथोपशोभम्।। (३०) | ||||
| (ख) | ||||
| ..................................................वीरकाण्डं त्रिसाधें- | ||||
| षूद्वन्वद्दण्डदीर्घं चरणतततदर्थोच्छ्रायं पोतिकां च।। | ||||
| ( तन्त्रसमुच्चय-२.२५ ) | ||||
| (ग) वास्तुविद्या ( ८ अ. ) में त्रिदण्डा, चतुर्दण्डा एवं पञ्चदण्डा तथा पत्री, चित्री | ||||
| एवं महार्णवी संज्ञक तीन प्रकार की पोतिकाओं का वर्णन प्राप्त होता है— | ||||
| पोतिका तु त्रिधा ज्ञेया नामभेदेन दैर्घ्यतः। | ||||
| त्रिदण्डा च चतुर्दण्डा पञ्चदण्डा यथाक्रमम्।। | ||||
| महार्णवी च चित्री च पत्री च प्रतिलोमतः। (८.४४, ४५) | ||||
| मय०-११ |
१६२ मयमतम् (घ) शिल्परत्न (पूर्वभाग) में उपर्युक्त तीनों का वर्णन इस प्रकार है— महार्णवी च पत्री च चित्री चेति त्रिधैव सा। भूतेभमकरव्यालरत्नबन्धविचित्रिता ।। बल्लीचित्राग्रपट्टा च सा ख्याता चित्रपोतिका। केवलं पत्रवल्लीभिर्विचित्रा पत्रपोतिका। तरङ्गमात्रचित्रा या पोतिका स्यान्महार्णवी ।। (२१.१११-११३) ५. काष्ठसंग्रह—ग्राह्य वृक्ष (श्लोक ६२-६६) वर्ज्य काष्ठ (श्लोक ७१-८०) (क) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. ४) में गृहनिर्माण में विशेषतः स्तम्भ आदि के लिये (श्लोक १६ में) प्रशस्त वृक्षों का परिगणन इस प्रकार किया गया है— आम्रातको मधूकश्च नागरङ्गश्च तिन्दुकः। खदिरो पूतिको वेणुः पाटलश्च विभीतकः ।। कर्णिकारश्च सरलः कर्कन्धुस्तिनिशस्तथा। काश्मरी च रसालश्च पारिभद्रश्च केसरः ।। श्रीपर्णीस्तिलकश्चापि नक्तमालश्च भद्रकः। अन्ये च क्षीरवृक्षा ये निम्बाद्याश्च सुगन्धिनः ।। (११-१३) वर्ज्य वृक्ष इस प्रकार हैं— मधूकं तिनिशं पूतिमन्यं क्षीरतरुं तथा। तिर्यग्दारौ चित्रकार्ये योजयेन्न कदाचन ।। नाडीवृक्षाः पितृवृक्षाः गुलिकाभिन्नदारवः। गजदन्तप्रभिन्नाश्च वक्रा भिन्नास्तथा वने ।। पक्षिहीना दिवाभीतैरुषिताश्च द्विजाधमैः। विद्युता भिन्नवृक्षाश्च योधानामिषुभिर्हताः ।। कण्टकावृतदेहाश्च न प्रशस्ताः प्रकीर्तिताः।
पतिता दक्षिणाशायां तथा प्रेतवनं गताः। दुष्टभूमिस्थिता वृक्षा वर्ज्या निन्द्याश्शुभेप्सुभिः ।। (१८-२१,२३) (ख) मत्स्यपुराण (२५७ अ.) में प्रशस्त एवं अप्रशस्त वृक्षों की चर्चा इस प्रकार है—
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १६३ पूर्वोत्तरेण पतितं गृहदारु प्रशस्यते। अन्यथा न शुभं विन्द्याद्याम्योपरि निपातनम्।। क्षीरवृक्षोद्भवं दारु न गृहे विनिवेशयेत्। कृताधिवासं विहगैरनिलानलपीडितम्।। गजावरुग्णं च तथा विद्युन्निर्घातपीडितम्। अर्धशुष्कं तथा दारु भग्नशुष्कं तथैव च।। चैत्यं देवालयोत्पन्नं नदीसङ्गमजं तथा। श्मशानकूपनिलयं तडागादिसमुद्भवम्।। वर्जयेत्सर्वथा दारु यदीच्छेद्विपुलां श्रियम्। तथा कण्टकिनो वृक्षान्नीपनिम्बविभीतकान्।। श्लेष्मातकानाम्प्रतरून् वर्जयेद् गृहकर्मणि। आसनाशोकमधुकसर्जशालाः शुभावहाः।। चन्दनं पनसं धन्यं सुरदारुहरिद्रवः। द्वाभ्यामेकेन वा कुर्यात्त्रिभिर्वा भवनं शुभम्।। बहुभिः कारितं यस्मादनेकभयदं भवेत्। एकैकशिंशपा धन्या श्रीपर्णी तिन्दुको तथा। एता नान्यसमायुक्ताः कदाचिच्छुभकारकाः। स्पन्दनः पनस्सत्तद्वत् सरलार्जुनपद्मकाः।। (२५८.३-११) (ग) राजवल्लभमण्डन (५ अ.) में ग्रहणीय एवं गर्हणीय वृक्षों का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है— त्याज्य वृक्ष— वृक्षं दग्धविशुष्ककण्टकयुतं नीडैश्च बैल्वद्रुमम्। क्षौरं मारुतपातितं च भवने चिञ्चां बिभीतं त्यजेत्।। (५.१६) ग्राह्य वृक्ष— शाकः शालमधूकसर्जखदिरा रक्तासनाः शोभना एकोऽसौ सरलोऽर्जुनस्य पनसः श्रीपर्णिनी शिंशिपाः। हारिद्रस्त्वपि चन्दनः सुरतरु पद्माक्षकस्तिन्दुको नैतेऽन्येन युता भवन्ति फलदाः शाकादयः शोभनाः।। (५.१७) इन ग्रन्थों के अतिरिक्त बृहत्संहिता, समराङ्गणसूत्रधार आदि ग्रन्थों में ग्राह्य एवं त्याज्य वृक्षों की चर्चा प्राप्त होती है।
१६४ मयमतम् ६. शिलालक्षण ( श्लोक ६७-६८ ) शिल्परत्न ( पूर्वभाग-१४ ) में शिलालक्षण अत्यन्त विस्तार से वर्णित है। ग्राह्य शिला का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है— सिद्धाद्याकरसम्भवा वसुमती भग्ना स्ववर्णोचिता स्निग्धा शस्रसहा गभीरनिनदा दिश्याहिताग्रा शिला। ग्राह्या बिम्बविधौ स्फुलिङ्गबहुला तस्याच्छिरोधोमुखा यत्काष्ठाभिमुखी समुत्थितवती स्थाप्या च तद्दिङ्मुखी।। (१४.११) इसके अतिरिक्त १२-२० श्लोकों में ग्राह्य शिलाओं के लक्षण एवं शेष में दोष- युक्त शिलाओं के लक्षण वर्णित हैं। ७. इष्टका ( श्लोक ६७-६८ ) इष्टकाओं का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्वभाग-१४ ) में प्राप्त होता है— स्थूलमूलेष्टका स्त्री स्यादग्रस्थूला नपुंसकाः।। सर्वत्र समविस्तारास्तुल्याः स्युः पुरुषेष्टकाः। अथवा यमरेखाः स्युर्ऋजवश्चेत् पुमानथ।। वक्राश्चेद्युग्मरेखाः सा स्त्रीलिङ्गाख्या प्रकीर्तिता। युग्मरेखास्त्वयुग्मं वा कर्णाभाश्चेन्नपुंसकाः।। ईषदुन्रतं मूलं नतं वाग्रमुदाहृतम्। (५५-५८) इष्टका-निर्माण के लिये ग्राह्य मृत्तिका का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्व-१४ ) में इस प्रकार प्राप्त होता है— चिक्कणा पाण्डराख्या च सलोणा च विगर्हिता। चतुर्थी ताम्रफुल्ला तु कर्मयोग्यमृदिष्यते।। तुषाङ्गारास्थिपाषाणशर्कराकाष्ठलोष्टकैः । वर्जिता सूक्ष्मसिकता ताम्रफुल्लेष्टकोचिता।। (४५-४६) ( तुलना ईशान, क्रिया ३३.३६ ) मृत्तिका को इष्टका-निर्माण के योग्य बनाने की विधि शिल्परत्न ( १४.४७-५४ ) में विस्तार से वर्णित है। ❖——❖——❖