भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१७६ मयमतम् दीवार बनाते समय ऊपर एवं नीचे कमलपुष्पों के समूह से युक्त पट्टिका का निर्माण करना चाहिये। फलकों की मोटाई स्तम्भ के चौथे, छठे या आठवें भाग के बराबर होनी चाहिये।।६५।। शिबिकाकुड्यवद् वाऽथ सर्वत्र फलकामयम् । एतत्तु फलकाकुड्यं यत्तु यत्र यथोचितम् । तदेव तत्र योज्यं स्याद् वस्तुविद्याविचक्षणैः ।।६६।। अथवा सभी स्थान पर शिबिका ( पालकी ) की भित्ति के समान फलका निर्मित होनी चाहिये। ( यहाँ सम्भवतः काष्ठखण्डों से निर्मित भित्ति का तात्पर्य है ) इस प्रकार जहाँ-जहाँ उचित हो, फलका कुड्य वहाँ-वहाँ ( फलकनिर्मित भित्ति ) का प्रयोग करना चाहिये, ऐसा वास्तुशास्त्र के विशेषज्ञों का मत है।।६६।। एवं प्रोक्तं प्रस्तरं वेदिकाङ्गं युक्त्या तज्ज्ञैर्जालकं च त्रिकुड्यम् । नैव च्छेद्या वेदिका जालकार्थं न प्रत्यङ्गं सर्वतश्छेदनीयम् ।।६७।। इति मयमते वस्तुशास्त्रे प्रस्तरकरणं नाम षोडशोऽध्यायः इस प्रकार प्रस्तर-करण, वेदिकाङ्ग, जालक एवं तीन प्रकार की भित्तियों का वर्णन एवं उनकी रीति का वर्णन विद्वानों के मतानुसार किया गया। जालक के निर्माण के लिये वेदिका को कभी नहीं तोड़ना चाहिये तथा प्रति के अङ्गों को भी नहीं तोड़ना चाहिये।।६७।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. प्रस्तर के अवयव ( श्लोक १ ) कामिकागम ( १.५४.१-२, ब्रूनो डेगेन्ज द्वारा पृ. २१३, पादटिप्पणी-२ में उद्धृत ) के अनुसार प्रस्तर के अङ्ग इस प्रकार हैं— अथ वक्ष्ये विशेषेण प्रस्तरस्य विधिक्रमम्। उत्तरं वाजनञ्चैव मुष्टिबन्धं मृणालिकाम्।। दण्डिकावलयक्षुद्रगोपानाच्छादनानि च। आलिङ्गान्तरिता चैवं प्रत्यङ्गं वाजनं क्रमात्।।