मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ मयमतम् (क) उत्सेधे विशिखांशिते द्वितयतो रूपोत्तरे वाजनम् षड्भक्तेऽल्पमिलांशतो द्वितयतो वा स्यान्महावाजनम्। एतन्निर्गमनं निजांशविहितं न्यसेदुपर्युत्तर- स्यैतत्तीव्रसमुच्छ्रयोच्छ्रयदलांशव्यायतां पट्टिकाम्।। ( तन्त्रसमुच्चय-२.४५ ) यही श्लोक शिल्परत्न ( पूर्वभाग-२९.७ ) में प्राप्त होता है। (ख) शिल्परत्न ( पूर्व., ३० अ. ३-४ ) में वाजन के प्रमाण के विषय में वर्णन किया गया है। (ग) मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में वाजन का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है— एक एव यदि वाजनं भवत्युत्तरस्य शरभाजिते घने। उच्चमंशयुगलेन निष्क्रमोऽप्यस्य पट्टमवशिष्टभागतः।। अल्पवाजनयुतोत्तरे घने नागभागिनि महत् त्रिभागतः। एकतोऽल्पमुभयोश्च निष्क्रमः स्वोच्चतो भवति पट्टमब्धिभिः।। (५.३३-३४) ४. प्रस्तर का प्रमाण ( श्लोक-४८ ) प्रस्तर के मान के विषय में शिल्परत्न ( पूर्वभाग, ३० अ. ) का कथन है कि इसका प्रमाण स्तम्भ की ऊँचाई का आधा या मासूर ( अधिष्ठान ) की ऊँचाई के मान के अनुसार रखना चाहिये— स्तम्भोत्सेधार्धमानं वा मासूरोत्सेधमात्रकम्। प्रस्तरस्योच्छ्रयं कुर्यात् पादयोर्ध्वं विशेषतः।। (३०.१) ५. लेप ( श्लोक-४९ ) लेप के विषय में सुधा शब्द से शिल्परत्न ( पूर्व.-१४ अ. ) में अत्यन्त विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। सुधा की पाँच प्रकृतियाँ हैं— करालमुद्गीगुल्मासकल्काचिक्कणकाश्च याः।।५८।। इनमें चिक्कण सुधा का उल्लेख मयमत में किया गया है। शिल्परत्न में यह इस प्रकार वर्णित है— चिक्कणं केवलं क्वाथं बद्धोदकमिति द्विधा।।६३।। ∗</L30> * * * * * * क्षीरद्रुमामलाक्षाणां कदम्बाभययोरपि।।६५।।