मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२९ प्राप्त होता है— कूटोत्तराग्रयोः कर्णं गतां तां प्रकृतिं विदुः ।।१०।। तन्मानभुजया कर्णरेखा या लिखिता पुरा। सा रेखा शिल्पशास्त्रज्ञैः कोटिरित्यभिधीयते ।।११।। तदन्तरालगायाश्च उपकोट्यादयः स्मृताः ।।१२।। (ख) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( ६ अ. ) में प्रकृति लुपा ( ऋजुमञ्च ) एवं विकृति लुपा—कोटि एवं उपकोटि लुपा का वर्णन प्राप्त होता है। सीधी लुपायें प्रकृति लुपा तथा पार्श्व में स्थित झुकी लुपायें कोटि एवं कोटि पर आश्रित लुपायें उपकोटि संज्ञक होती हैं— ऋजुमञ्चाख्यास्तुल्याः प्रकृतिलुपाः पार्श्वसंस्थिताः सर्वाः। कोट्युपकोटाद्याः स्युर्विकृतिलुपास्तास्त्वतुल्यदीर्घतताः ।।६।। ५. छादन ( श्लोक ४६ ) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( अ. ७ ) में लोष्टनिर्मित फलक एवं ताम्र आदि धातुओं से निर्मित आच्छादन का वर्णन प्राप्त होता है— लोष्टैराच्छाद्यते चेदखिलनिलयने पट्टिकाप्रस्तरः स्यात् तत्स्थाने क्वापि कार्योऽपि च घनफलकाप्रस्तरो बद्धकीलः। लोष्ठाधाराय किञ्चित्तलमपि च खनेच्चञ्चुसन्धारणार्थं ताम्रैराच्छाद्यते चेन्न तु तलरचना देवगेहादिकेषु ।।७।। (ख) शिल्परत्न ( ३४ अ. ) में शिखराच्छादन का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है— अथ शौल्बे राजतैर्वा सौवर्णैर्वा सुरालये। शिखराच्छादनं कुर्यात् फलकैरर्थसौलभात् ।।३०।। ६. ललाटभूषण ( श्लोक ४८-८१ ) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में भी भवन के शीर्ष भाग के अलङ्करण का वर्णन किया गया है— यद्वा कपोतवलभीविलसत्तु लोलुपोद्यत्पिधानफलकादितुलाविशेषैः। युक्तञ्च खण्डफलकादिविचित्रचित्रभूतिप्रभेदसहितं महितं विदध्यात्।।४०।। (ख) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६३ अ. ) में लुपाओं पर चित्रण का उल्लेख प्राप्त होता है— गन्धर्वमुखयुक्ता वा लतापुष्पक्रियान्विता ।।४।। (ग) शिल्परत्न ( पू०. ३५ अ. ) में शीर्ष-भूषण का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—