मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० मयमतम् वल्लीमण्डलचित्राद्यैर्भूषयेन्मुखपट्टिकाम् । मुखपट्ट्यवशेषं तदवगाढमुदाहृतम् ।।९।। अवगाढाख्यभागं तु मृणालादिविभूषितम्। शूलाभं वा स्थलाभं वा सव्यालं वा सनाटकम्।।१०।। मालिकाकूटकोष्ठादिमण्डितं वा विमानवत्। चित्रपत्राख्यमकरतोरणाढ्यमथापि वा।।११।। तोरणाभ्यन्तरे लक्ष्मीः साभिषेकाम्बुजासना। अन्यैर्नानालङ्करणैर्नासीगाढं तु, मण्डयेत्।।१२।। ललाटिकावगाढं तु तथैव च विभूषयेत्।।१३।। ७. स्थूपिका (श्लोक ८२-९१) स्थूपिका का विशद वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३६) में प्राप्त होता है। ८. सुधा (श्लोक ९२-१०८) सुधावर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. १४) श्लोक ५८-७५ के सदृश है। ९. मूर्ध्नेष्टका (श्लोक ११६-१२०) मूर्ध्नेष्टका का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३४) में द्रष्टव्य है। वहाँ इसका वर्णन पूरे अध्याय में किया गया है। १०. स्थूपिकाकील (श्लोक १२१) स्थूपिकाकील के विषय में शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३४) में इस प्रकार वर्णन प्राप्त होता है— लोहजं दारुजं वाथ स्थूपीदण्डं तु कारयेत्।।४।। १०. स्थूपिकाकील की आकृति (श्लोक १२६) स्थूपिकाकील की आकृति के विषय में शिल्परत्न (पूर्व. ३४ अ.) में इस प्रकार उल्लेख किया गया है— तस्याग्रमङ्गुलं व्यासं मूलादग्रं क्रमात् कृशम्। तुङ्गे गुणांशे त्वेकांशं मूले वेदास्रमाचरेत्।।८।। वस्वस्रं मध्यमग्रे तु वृत्ताकारं प्रकल्पयेत्। चतुरस्रोपरिष्टात्तु सर्वं वृत्तमथापि वा।।९।। कर्तव्यं तस्य मूले तु शिखिपादेन योजनम्।