मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथैकोनविंशोऽध्यायः ( एकभूमिविधानम् ) एकभौमं चतुर्मानं वक्ष्ये संक्षिप्य शास्त्रतः । त्रिचतुर्हस्तमारभ्य नव पङ्क्त्यन्तविस्तृतम् ॥१॥ एक तल का विधान—एक तल वाले भवन ( देवालय ) का शास्त्र के अनुसार चार प्रकार का प्रमाण संक्षेप में कहता हूँ। यह तीन हाथ से प्रारम्भ कर नौ हाथ तक एवं चार हाथ से प्रारम्भ कर दस हाथ तक विस्तृत होता है।।१।। तारे सप्तदशोत्सेधमध्यर्धं तत्रिपादकम् । द्विगुणं तु तदुत्सेधं शान्तिकं पौष्टिकं भवेत् ॥२॥ जयदं चाद्भुतं चैव चतुर्थोदयमीरितम् । इनकी ऊँचाई चौड़ाई के दस भाग में सातवें भाग के बराबर, चौड़ाई का डेढ़ गुना, चौड़ाई का तीन चौथाई ( अर्थात् चौड़ाई के दुगुने से चतुर्थांश कम ) या चौड़ाई का दुगुना ऊँचा ( ये चार प्रकार के मान ) होनी चाहिये। चार प्रकार की ऊँचाई वाले भवन की संज्ञा शान्तिक, पौष्टिक, जयद एवं अद्भुत होती है।।२।। चतुरं वृत्तमायामं द्व्यस्रवृत्तं षडस्रकम् ॥३॥ अष्टास्रमाकृतिर्ह्येषां शिखरेऽपि तथैव च । इन ( देवालयों ) की आकृति चौकोर, गोल, आयताकार, दो कोणों के साथ गोलाई लिये, षट्कोण तथा अष्टकोण होती है। इनका शिखर भी इनकी आकृति के अनुरूप होता है।।३।। ✺ मुखमण्डपम् ✺ समं त्रिपादमर्धं वा मुखमण्डपमिष्यते ॥४॥ देवालय के मुखभाग पर निर्मित मण्डप का माप देवालय के समान, तीन चौथाई अथवा आधा होना चाहिये।।४।। समं तन्मण्डपं तस्य सान्तरालं सवेशकम् । युग्मस्तम्भसमायुक्तं युक्त्या सर्वाङ्गशोभितम् ॥५॥