मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ मयमतम् ( देवालय के ) समान मण्डप अन्तराल ( मण्डप एवं मन्दिर का मध्य भाग ) एवं वेशक ( प्रवेश, पोर्च ) से युक्त तथा सम संख्या वाले स्तम्भों से युक्त एवं सम्पूर्ण अङ्गों से अलंकृत होना चाहिये।।५।। सार्धहस्तं द्विहस्तं वा प्रासादस्यांशमेव वा। अन्तरालस्य विस्तारं द्विदण्डं तस्य वेशनम् ।।६।। सावकाशान्तरालं चेद् द्वित्रिहस्तान्तरं तु वा। पार्श्वे सोपानसंयुक्तं हस्तिहस्तविभूषितम् ।।७।। अन्तराल का विस्तार डेढ़ हाथ, दो हाथ या प्रासाद के बराबर एवं उसकी लम्बाई दो दण्ड होनी चाहिये। उसका वेशन अवकाश एवं अन्तराल से युक्त हो तो उसका माप दो या तीन हाथ का होना चाहिये। वेशन के बगल में सोपान निर्मित हो एवं वह गज के सूँड़ से सुसज्जित हो।।६-७।। धाम्नः कुड्यस्यार्धकं तत्समं वा पादोनं वा भित्तिविष्कम्भमानम्। पार्श्वे चैतद् द्वित्रिदण्डैस्तु वेशं कुर्यादग्रे मण्डपस्यास्य धीमान् ।।८।। भित्तिनिष्कम्भ का मान प्रधान भवन की भित्ति के बराबर, उसका आधा या उससे चतुर्थांश कम होना चाहिये। पार्श्व भाग में दो या तीन दण्ड माप का वेशन एवं अग्र भाग में मण्डप होना चाहिये, ऐसा बुद्धिमान ( ऋषि ) का मत है।।८।। तत्युन्नतायतकरेषु च हस्तमानाद् हीनं त्रिपादकरमर्धमथापि पादम्। तत्रैव वस्तुनि यथोचितमाचरेद्वै हानिं च वृद्धिकमनिन्द्यमनेकशास्त्रैः ।।९।। विस्तार, ऊँचाई एवं लम्बाई के हस्तमान में एक हाथ कम ( अर्थात् ) तीन चतुर्थांश, आधा अथवा चौथाई प्रमाण होना चाहिये। वहीं ( प्रधान ) भवन के निर्माण में अनेक शास्त्रकारों द्वारा किसी भी प्रकार की वृद्धि अथवा हानि को वर्जित किया गया हैं।।९।। ✺ धामपर्यायनामानि ✺ विमानं भवनं हर्म्यं सौधं धाम निकेतनम्। प्रासादं सदनं सद्म गेहमावासकं गृहम् ।।१०।।