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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२२८ मयमतम् शिखरों की ऊँचाई के भी सात नाम प्राप्त होते हैं— कालिङ्गकाश्यवाराटकौल्लकानि च शौण्डिकम्। काश्मीरं चैव गाङ्गेयौ शिखराणि पृथग् विदुः ।।१४।। विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (१२) में भवन-निर्माण की निर्माण-शैली में पाञ्चाली आदि का उल्लेख इस प्रकार प्राप्त होता है— पाञ्चाली मागधी चान्या शौरसेनी च वाङ्गिकी। कोसली चापि कालिङ्गी द्राविडीति क्रियाकला।। (१२.१२) ३. लुपामान (श्लोक २३-२९) लुपा के प्रमाण का उल्लेख वास्तुविद्या के अध्याय १० एवं ११ में अत्यन्त विस्तार से प्राप्त होता है। लुपा की योजना में एक विधि यह भी है कि किसी फलक पर पहले पूरी योजना अङ्कित कर लेनी चाहिये— अथवा मन्दबुद्धीनां क्रियालाघवसिद्धये। निम्नोन्नतविहीनायां फलकायामथालिखेत्।। (११.१) इसकी पूरी प्रक्रिया ११वें अध्याय में विस्तार से वर्णित है। (ख) शिल्परत्न (पूर्व. ३३) में सम्पूर्ण अध्याय में लुपा-योजना के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। वहाँ भी फलक पर लुपाओं की स्थिति अङ्कित करने की चर्चा प्राप्त होती है— तत्तदिष्टलुपायाममिष्टयोगात् प्रकल्पयेत्। लुपाफलकमादाय तक्षितं तक्षकोत्तमैः।। (३३.१७) (ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. ६३) में प्रमाणसहित लुपा-निर्माण का वर्णन किया गया है। (घ) मनुष्यालयचन्द्रिका (अ. ६) में लुपा-संयोजन का प्रमाणसहित वर्णन प्राप्त होता है। उसकी योजना बनाते समय सबसे पहले समचतुरस्र आकृति खींचनी चाहिये। इसकी चौड़ाई के बराबर सीधी लुपायें एवं कर्णों पर विकृति लुपायें अङ्कित करनी चाहिये— अब्ध्यस्रं मञ्चकस्य प्रततिमितमथाकल्प्य तत्कर्णमर्धी- कृत्य न्यसेद् भुजायामथ विकृतिलुपापङ्क्तिमत्रैव कुर्यात्। तत्तत्कर्णप्रमाणं खलु विकृतिलुपानां पृथग् विस्तृतिः स्यात् पार्श्वे कार्यं ध्वजादित्रयमपि च वितानं च लम्बं च सूत्रम्।। (५.२१) ४. लुपाभेद (श्लोक ३०-३१) (क) वास्तुविद्या (११ अ.) में प्रकृति, कोटि एवं उपकोटि लुपाओं का वर्णन