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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

२२८ मयमतम् शिखरों की ऊँचाई के भी सात नाम प्राप्त होते हैं— कालिङ्गकाश्यवाराटकौल्लकानि च शौण्डिकम्। काश्मीरं चैव गाङ्गेयौ शिखराणि पृथग् विदुः ।।१४।। विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (१२) में भवन-निर्माण की निर्माण-शैली में पाञ्चाली आदि का उल्लेख इस प्रकार प्राप्त होता है— पाञ्चाली मागधी चान्या शौरसेनी च वाङ्गिकी। कोसली चापि कालिङ्गी द्राविडीति क्रियाकला।। (१२.१२) ३. लुपामान (श्लोक २३-२९) लुपा के प्रमाण का उल्लेख वास्तुविद्या के अध्याय १० एवं ११ में अत्यन्त विस्तार से प्राप्त होता है। लुपा की योजना में एक विधि यह भी है कि किसी फलक पर पहले पूरी योजना अङ्कित कर लेनी चाहिये— अथवा मन्दबुद्धीनां क्रियालाघवसिद्धये। निम्नोन्नतविहीनायां फलकायामथालिखेत्।। (११.१) इसकी पूरी प्रक्रिया ११वें अध्याय में विस्तार से वर्णित है। (ख) शिल्परत्न (पूर्व. ३३) में सम्पूर्ण अध्याय में लुपा-योजना के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। वहाँ भी फलक पर लुपाओं की स्थिति अङ्कित करने की चर्चा प्राप्त होती है— तत्तदिष्टलुपायाममिष्टयोगात् प्रकल्पयेत्। लुपाफलकमादाय तक्षितं तक्षकोत्तमैः।। (३३.१७) (ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. ६३) में प्रमाणसहित लुपा-निर्माण का वर्णन किया गया है। (घ) मनुष्यालयचन्द्रिका (अ. ६) में लुपा-संयोजन का प्रमाणसहित वर्णन प्राप्त होता है। उसकी योजना बनाते समय सबसे पहले समचतुरस्र आकृति खींचनी चाहिये। इसकी चौड़ाई के बराबर सीधी लुपायें एवं कर्णों पर विकृति लुपायें अङ्कित करनी चाहिये— अब्ध्यस्रं मञ्चकस्य प्रततिमितमथाकल्प्य तत्कर्णमर्धी- कृत्य न्यसेद् भुजायामथ विकृतिलुपापङ्क्तिमत्रैव कुर्यात्। तत्तत्कर्णप्रमाणं खलु विकृतिलुपानां पृथग् विस्तृतिः स्यात् पार्श्वे कार्यं ध्वजादित्रयमपि च वितानं च लम्बं च सूत्रम्।। (५.२१) ४. लुपाभेद (श्लोक ३०-३१) (क) वास्तुविद्या (११ अ.) में प्रकृति, कोटि एवं उपकोटि लुपाओं का वर्णन

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२९ प्राप्त होता है— कूटोत्तराग्रयोः कर्णं गतां तां प्रकृतिं विदुः ।।१०।। तन्मानभुजया कर्णरेखा या लिखिता पुरा। सा रेखा शिल्पशास्त्रज्ञैः कोटिरित्यभिधीयते ।।११।। तदन्तरालगायाश्च उपकोट्यादयः स्मृताः ।।१२।। (ख) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( ६ अ. ) में प्रकृति लुपा ( ऋजुमञ्च ) एवं विकृति लुपा—कोटि एवं उपकोटि लुपा का वर्णन प्राप्त होता है। सीधी लुपायें प्रकृति लुपा तथा पार्श्व में स्थित झुकी लुपायें कोटि एवं कोटि पर आश्रित लुपायें उपकोटि संज्ञक होती हैं— ऋजुमञ्चाख्यास्तुल्याः प्रकृतिलुपाः पार्श्वसंस्थिताः सर्वाः। कोट्युपकोटाद्याः स्युर्विकृतिलुपास्तास्त्वतुल्यदीर्घतताः ।।६।। ५. छादन ( श्लोक ४६ ) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( अ. ७ ) में लोष्टनिर्मित फलक एवं ताम्र आदि धातुओं से निर्मित आच्छादन का वर्णन प्राप्त होता है— लोष्टैराच्छाद्यते चेदखिलनिलयने पट्टिकाप्रस्तरः स्यात् तत्स्थाने क्वापि कार्योऽपि च घनफलकाप्रस्तरो बद्धकीलः। लोष्ठाधाराय किञ्चित्तलमपि च खनेच्चञ्चुसन्धारणार्थं ताम्रैराच्छाद्यते चेन्न तु तलरचना देवगेहादिकेषु ।।७।। (ख) शिल्परत्न ( ३४ अ. ) में शिखराच्छादन का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है— अथ शौल्बे राजतैर्वा सौवर्णैर्वा सुरालये। शिखराच्छादनं कुर्यात् फलकैरर्थसौलभात् ।।३०।। ६. ललाटभूषण ( श्लोक ४८-८१ ) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में भी भवन के शीर्ष भाग के अलङ्करण का वर्णन किया गया है— यद्वा कपोतवलभीविलसत्तु लोलुपोद्यत्पिधानफलकादितुलाविशेषैः। युक्तञ्च खण्डफलकादिविचित्रचित्रभूतिप्रभेदसहितं महितं विदध्यात्।।४०।। (ख) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६३ अ. ) में लुपाओं पर चित्रण का उल्लेख प्राप्त होता है— गन्धर्वमुखयुक्ता वा लतापुष्पक्रियान्विता ।।४।। (ग) शिल्परत्न ( पू०. ३५ अ. ) में शीर्ष-भूषण का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—

२३० मयमतम् वल्लीमण्डलचित्राद्यैर्भूषयेन्मुखपट्टिकाम् । मुखपट्ट्यवशेषं तदवगाढमुदाहृतम् ।।९।। अवगाढाख्यभागं तु मृणालादिविभूषितम्। शूलाभं वा स्थलाभं वा सव्यालं वा सनाटकम्।।१०।। मालिकाकूटकोष्ठादिमण्डितं वा विमानवत्। चित्रपत्राख्यमकरतोरणाढ्यमथापि वा।।११।। तोरणाभ्यन्तरे लक्ष्मीः साभिषेकाम्बुजासना। अन्यैर्नानालङ्करणैर्नासीगाढं तु, मण्डयेत्।।१२।। ललाटिकावगाढं तु तथैव च विभूषयेत्।।१३।। ७. स्थूपिका (श्लोक ८२-९१) स्थूपिका का विशद वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३६) में प्राप्त होता है। ८. सुधा (श्लोक ९२-१०८) सुधावर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. १४) श्लोक ५८-७५ के सदृश है। ९. मूर्ध्नेष्टका (श्लोक ११६-१२०) मूर्ध्नेष्टका का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३४) में द्रष्टव्य है। वहाँ इसका वर्णन पूरे अध्याय में किया गया है। १०. स्थूपिकाकील (श्लोक १२१) स्थूपिकाकील के विषय में शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३४) में इस प्रकार वर्णन प्राप्त होता है— लोहजं दारुजं वाथ स्थूपीदण्डं तु कारयेत्।।४।। १०. स्थूपिकाकील की आकृति (श्लोक १२६) स्थूपिकाकील की आकृति के विषय में शिल्परत्न (पूर्व. ३४ अ.) में इस प्रकार उल्लेख किया गया है— तस्याग्रमङ्गुलं व्यासं मूलादग्रं क्रमात् कृशम्। तुङ्गे गुणांशे त्वेकांशं मूले वेदास्रमाचरेत्।।८।। वस्वस्रं मध्यमग्रे तु वृत्ताकारं प्रकल्पयेत्। चतुरस्रोपरिष्टात्तु सर्वं वृत्तमथापि वा।।९।। कर्तव्यं तस्य मूले तु शिखिपादेन योजनम्।

अथैकोनविंशोऽध्यायः ( एकभूमिविधानम् ) एकभौमं चतुर्मानं वक्ष्ये संक्षिप्य शास्त्रतः । त्रिचतुर्हस्तमारभ्य नव पङ्क्त्यन्तविस्तृतम् ॥१॥ एक तल का विधान—एक तल वाले भवन ( देवालय ) का शास्त्र के अनुसार चार प्रकार का प्रमाण संक्षेप में कहता हूँ। यह तीन हाथ से प्रारम्भ कर नौ हाथ तक एवं चार हाथ से प्रारम्भ कर दस हाथ तक विस्तृत होता है।।१।। तारे सप्तदशोत्सेधमध्यर्धं तत्रिपादकम् । द्विगुणं तु तदुत्सेधं शान्तिकं पौष्टिकं भवेत् ॥२॥ जयदं चाद्भुतं चैव चतुर्थोदयमीरितम् । इनकी ऊँचाई चौड़ाई के दस भाग में सातवें भाग के बराबर, चौड़ाई का डेढ़ गुना, चौड़ाई का तीन चौथाई ( अर्थात् चौड़ाई के दुगुने से चतुर्थांश कम ) या चौड़ाई का दुगुना ऊँचा ( ये चार प्रकार के मान ) होनी चाहिये। चार प्रकार की ऊँचाई वाले भवन की संज्ञा शान्तिक, पौष्टिक, जयद एवं अद्भुत होती है।।२।। चतुरं वृत्तमायामं द्व्यस्रवृत्तं षडस्रकम् ॥३॥ अष्टास्रमाकृतिर्ह्येषां शिखरेऽपि तथैव च । इन ( देवालयों ) की आकृति चौकोर, गोल, आयताकार, दो कोणों के साथ गोलाई लिये, षट्कोण तथा अष्टकोण होती है। इनका शिखर भी इनकी आकृति के अनुरूप होता है।।३।। ✺ मुखमण्डपम् ✺ समं त्रिपादमर्धं वा मुखमण्डपमिष्यते ॥४॥ देवालय के मुखभाग पर निर्मित मण्डप का माप देवालय के समान, तीन चौथाई अथवा आधा होना चाहिये।।४।। समं तन्मण्डपं तस्य सान्तरालं सवेशकम् । युग्मस्तम्भसमायुक्तं युक्त्या सर्वाङ्गशोभितम् ॥५॥

२३२ मयमतम् ( देवालय के ) समान मण्डप अन्तराल ( मण्डप एवं मन्दिर का मध्य भाग ) एवं वेशक ( प्रवेश, पोर्च ) से युक्त तथा सम संख्या वाले स्तम्भों से युक्त एवं सम्पूर्ण अङ्गों से अलंकृत होना चाहिये।।५।। सार्धहस्तं द्विहस्तं वा प्रासादस्यांशमेव वा। अन्तरालस्य विस्तारं द्विदण्डं तस्य वेशनम् ।।६।। सावकाशान्तरालं चेद् द्वित्रिहस्तान्तरं तु वा। पार्श्वे सोपानसंयुक्तं हस्तिहस्तविभूषितम् ।।७।। अन्तराल का विस्तार डेढ़ हाथ, दो हाथ या प्रासाद के बराबर एवं उसकी लम्बाई दो दण्ड होनी चाहिये। उसका वेशन अवकाश एवं अन्तराल से युक्त हो तो उसका माप दो या तीन हाथ का होना चाहिये। वेशन के बगल में सोपान निर्मित हो एवं वह गज के सूँड़ से सुसज्जित हो।।६-७।। धाम्नः कुड्यस्यार्धकं तत्समं वा पादोनं वा भित्तिविष्कम्भमानम्। पार्श्वे चैतद् द्वित्रिदण्डैस्तु वेशं कुर्यादग्रे मण्डपस्यास्य धीमान् ।।८।। भित्तिनिष्कम्भ का मान प्रधान भवन की भित्ति के बराबर, उसका आधा या उससे चतुर्थांश कम होना चाहिये। पार्श्व भाग में दो या तीन दण्ड माप का वेशन एवं अग्र भाग में मण्डप होना चाहिये, ऐसा बुद्धिमान ( ऋषि ) का मत है।।८।। तत्युन्नतायतकरेषु च हस्तमानाद् हीनं त्रिपादकरमर्धमथापि पादम्। तत्रैव वस्तुनि यथोचितमाचरेद्वै हानिं च वृद्धिकमनिन्द्यमनेकशास्त्रैः ।।९।। विस्तार, ऊँचाई एवं लम्बाई के हस्तमान में एक हाथ कम ( अर्थात् ) तीन चतुर्थांश, आधा अथवा चौथाई प्रमाण होना चाहिये। वहीं ( प्रधान ) भवन के निर्माण में अनेक शास्त्रकारों द्वारा किसी भी प्रकार की वृद्धि अथवा हानि को वर्जित किया गया हैं।।९।। ✺ धामपर्यायनामानि ✺ विमानं भवनं हर्म्यं सौधं धाम निकेतनम्। प्रासादं सदनं सद्म गेहमावासकं गृहम् ।।१०।।

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३३ आलयं निलयं वासमास्पदं वस्तु वास्तुकम्। क्षेत्रमायतनं वेश्म मन्दिरं धिष्ण्यकं पदम् ॥११॥ लयं क्षयमगारं च तथोदवसितं पुनः। स्थानमित्येवमुक्ताश्च पर्यायाख्या हि पण्डितैः ॥१२॥ भवन के पर्यायवाची नाम—विद्वानों के अनुसार भवन के पर्यायवाची शब्द ये हैं—विमान, भवन, हर्म्य, सौध, धाम, निकेतन, प्रासाद, सदन, सद्म, गेह, आवासक, गृह, आलय, निलय, वास, आस्पद, वस्तु, वास्तुक, क्षेत्र, आयतन, वेश्म, मन्दिर, धिष्ण्यक, पद, लय, क्षय, अगार, उदवसित तथा स्थान॥१०-१२॥ ❋ गर्भगृहमानम् ❋ हर्म्यतारत्रिभागैकं भूतांशेषु गुणांशकम्। धातुभागे युगांशः स्याद्बाणांशं नवभागिके ॥१३॥ रुद्रांशे रसभागं तु धातु त्रयोदशांशके। तिथ्यंशे वसुभागं तु सप्तदश नवांशकम् ॥१४॥ विस्तारार्धं तु ते सर्वे नालीगृहविशालताः। गर्भगृह=प्रधान भूतिकक्ष का मान—विस्तार में गर्भगृह का प्रमाण मन्दिर के प्रमाण के तीन भाग में एक भाग, पाँच भाग में तीन भाग, सात में चार भाग, नौ में पाँच भाग, ग्यारह में छः भाग, तेरह में सात भाग, पन्द्रह में आठ भाग, सत्रह में नौ भाग या आधा होना चाहिये॥१३-१४॥ ❋ स्तूपिकामानम् ❋ फलिके पञ्चभागे तु युगार्धं पद्मविस्तृतम् ॥१५॥ पद्मतारत्रिभागैकं कुम्भतारमिति स्मृतम्। कुम्भतारत्रिभागैकं कुम्भस्याधो वलग्नकम् ॥१६॥ वलग्नस्य त्रिभागैकं कुम्भस्योपरि कन्धरम्। कन्धरत्रिगुणं पाली तत्रिभागेन कुड्मलम् ॥१७॥ स्तूपिका का प्रमाण—फलिक के पाँच भाग में दो भाग के बराबर पद्म की चौड़ाई रखनी चाहिये। पद्म की चौड़ाई के तीसरे भाग के बराबर कुम्भ की चौड़ाई रखनी चाहिये। कुम्भ के विस्तार के तीसरे भाग के बराबर कुम्भ के नीचे वलग्न का मान होना चाहिये। वलग्न के तीसरे भाग के बराबर कुम्भ के ऊपर कन्धर होना चाहिये। कन्धर का तीन गुना पाली का प्रमाण एवं उसके तीसरे भाग के बराबर कुड्मल का मान होना चाहिये॥१५-१७॥

२३४ मयमतम् समं त्रिपादमर्धं वा महानासीविनिर्गमम् । तद्व्यासत्रिचतुर्भागहीनं स्कन्धान्ततुङ्गकम् ॥१८॥ महानासी (सजावटी खिड़की) का विनिर्गम (निर्माणयोजना शिखर के विशिष्ट भाग के) बराबर, तीन चतुर्थांश अथवा आधा चौड़ा होना चाहिये। इसकी ऊँचाई उसकी चौड़ाई से तीन या चार भाग कम एवं स्कन्ध के अन्तिम भाग तक रखनी चाहिये।।१८।। शक्तिध्वजं तदर्धोच्चं त्रिपादं वा विधीयते । कन्थरोच्चत्रिभागैकं वेदिकोदयमीरितम् । सार्धदण्डं द्विदण्डं वा क्षुद्रनास्या विशालकम् ॥१९॥ शक्तिध्वज को उसका आधा ऊँचा अथवा तीन चौथाई प्रमाण का होना चाहिये। कन्धर की ऊँचाई के तीसरे भाग से वेदिका का उदय (प्रारम्भ) कहा गया है। क्षुद्रनासा (छोटी सजावटी खिड़की) की चौड़ाई आधा दण्ड या दो दण्ड होनी चाहिये।।१९।। ✺ द्वारम् ✺ पादोत्सेधे पङ्क्तिनन्दाष्टभागे द्वारोत्सेधं तत्तदेकांशहीनम् । विस्तारं स्यात्तदुच्छ्रार्धमानं द्वारं कुर्याद्धर्म्यमध्ये नृपाणाम् ॥२०॥ द्वार की ऊँचाई स्तम्भ की ऊँचाई के दश भाग में नौ भाग, आठ में नौ भाग या सात में आठ भाग के बराबर होनी चाहिये। इसकी चौड़ाई ऊँचाई की आधी होनी चाहिये। राजभवन के मध्य भाग में द्वार होना चाहिये।।२०।। योगव्यासं पादविष्कम्भमानं पादाधिक्यं वा तदर्धं त्रिपादम् । बाहुल्यं स्यादुच्छ्रये वेदभागे बाह्ये साब्जक्षेपणं तत्रिभागैः ॥२१॥ द्वार के पाख (चौखट का पार्श्व) की चौड़ाई स्तम्भ के बराबर अथवा उससे चतुर्थांश अधिक होनी चाहिये एवं उसकी मोटाई चौड़ाई की आधी या तीन चतुर्थांश होनी चाहिये। बाहरी भाग में द्वार का बाहुल्य पद्मों से सुसज्जित होना चाहिये एवं इसकी मोटाई चौड़ाई के तीन चतुर्थांश भाग के माप की होनी चाहिये।।२१।। भित्तिव्यासे द्वादशांशे तु बाह्ये पञ्चांशान्तद्वारयोगस्य मध्यम् । तद्वच्चान्तः स्तम्भमध्यं तयोस्त न्मध्यं प्रोक्तं भित्तिमध्यं विधिज्ञैः ॥२२॥ भित्ति के व्यास के बाहरी भाग के बारह भाग करने चाहिये। पाँचवें भाग में द्वार-

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३५ योग का मध्य भाग होना चाहिये तथा दूसरी ओर से भी इतनी ही दूरी रखनी चाहिये। इन दोनों (बिन्दुओं) के मध्य को विद्वानों ने भित्तिमध्य कहा है।।२२।। ❋ नालमानम् ❋ जन्मान्तं वा जगत्यन्तं कैरवान्तं गलान्तकम् ।।२३।। पट्टिकान्तं तलं पञ्चभेदं सर्वेषु धामसु। छिद्रं विद्यादधश्चोर्ध्वं बाह्ये नालं प्रयोजयेत् ।।२४।। नाली का मान—सभी भवनों में तल के पाँच भेद होते हैं—जन्म का अन्तिम भाग, जगती का अन्तिम भाग, कैरव का अन्तिम भाग, गल का अन्तिम भाग एवं पट्टिका का अन्तिम भाग। इनके निचले एवं ऊपरी भाग में छिद्र होना चाहिये एवं नाली बाहर होनी चाहिये।।२३-२४।। द्वादशाङ्गुलमारभ्य त्रित्र्यङ्गुलविवर्धनात्। चतुर्विंशाङ्गुलं यावदायामं पञ्चधा भवेत् ।।२५।। बारह अङ्गुल से प्रारम्भ करते हुये तीन-तीन अङ्गुल की वृद्धि से चौबीस अङ्गुल- पर्यन्त पाँच प्रकार की नाली की लम्बाई होती है।।२५।। अष्टाङ्गुलं समारभ्य द्विद्व्यङ्गुलविवर्धनात्। तारं षोडशमात्रान्तं पञ्चधा परिकीर्तितम् ।।२६।। आठ अङ्गुल से प्रारम्भ कर दो-दो अङ्गुल बढ़ाते हुये सोलह अङ्गुलपर्यन्त पाँच प्रकार की नाली की चौड़ाई होती है।।२६।। समं त्रिपादमर्धं वा घनं छिद्रं तु मध्यमे। त्रिचतुष्पञ्चषण्मात्रं तारं तत्समनिम्नकम् ।।२७।। इनकी मोटाई (गहराई) चौड़ाई के बराबर, तीन चौथाई या आधी होनी चाहिये। मध्यम माप तीन, चार, पाँच या छः अङ्गुल चौड़ा एवं उतना ही गहरा होता है।।२७।। मूलात् पञ्चत्रिभागं स्यादग्रं धारासमन्वितम्। घटितं सिंहवक्त्रेण किञ्चिन्मूलान्नताग्रकम् ।।२८।। नाली के अग्र भाग (दूसरे छोर) की चौड़ाई मूल भाग के पाँच भाग में से तीन भाग के बराबर एवं धारा से युक्त होनी चाहिये। इसका अग्र भाग मूल भाग से कुछ नीचा (ढालदार) एवं सिंह के मुख से युक्त होता है।।२८।। एवं नालं प्रकर्तव्यं वामे प्रासादमध्यमे। अन्तःपीठस्य नालस्य समं वा बहिरिष्यते ।।२९।।

२३६ मयमतम् इस प्रकार देवालय के मध्य भाग के वाम भाग में प्रणाल का निर्माण करना चाहिये। अन्तःपीठ का नाल बराबर ( सतह पर ) एवं बाहर होना चाहिये।।२९।। ❋ अलङ्करणम् ❋ विस्तारायाममुत्सेधं सर्वाण्यङ्गानि च क्रमात्। संक्षेपतः समादिष्टान्यलङ्कारमथोच्यते ।।३०।। सञ्जा—प्रासाद के सभी अङ्गों का संक्षेप में क्रमशः विस्तार, लम्बाई एवं ऊँचाई का वर्णन किया गया है। अब उसके अलङ्करण का वर्णन किया जा रहा है।।३०।। वृत्तग्रीवामस्तकं वैजयन्तं श्रीभोगं स्यात् कर्णकूटोपयुक्तम् । मध्येभद्रं श्रीविशालं तदेव वस्वस्रं चेच्छीर्षकं स्वस्तिबन्धम् ।।३१।। यदि देवालय की ग्रीवा एवं मस्तक ( शीर्ष भाग ) वृत्ताकार हो तो उसकी संज्ञा 'वैजयन्त' होती है। यदि देवालय के कर्णभाग ( कोणों ) में कूट निर्मित हों तो वह 'श्रीभोग' संज्ञक होता है। यदि मध्य भाग में भद्र हो, तो वह 'श्रीविशाल' एवं शीर्षभाग यदि अष्टकोण हो तो वह 'स्वस्तिबन्ध' संज्ञक प्रासाद होता है।।३१।। वेदास्त्राभं तच्छिरः श्रीकरं स्याद् द्व्यस्रं वृत्तं हस्तिपृष्ठं हि नाम्ना । ऋत्वस्त्राभं शीर्षकं स्कन्दकान्तं तत्तन्नाम्ना तत्तदायामयुक्ते ।।३२।। चार कोण वाले शीर्ष से युक्त प्रासाद 'श्रीकर', दो कोण एवं वृत्ताकार प्रासाद 'हस्तिपृष्ठ' तथा छः कोण के शीर्ष वाला प्रासाद 'स्कन्दकान्त' संज्ञक होता है। ये सभी भवन लम्बाई लिये होते हैं।।३२।। मध्ये भद्रयुतं कर्णकूटयुक्तं तु मस्तके। कोष्ठकं भद्रनास्यङ्गं वृत्तं वा गलमस्तकम् ।।३३।। नाम्नैतत् केसरं प्रोक्तं युगास्रं वा गलं शिरः । पञ्चसप्तर्तुभागे तु त्रिद्व्यंशैर्मध्यभद्रकम् ।।३४।। केसर संज्ञक प्रासाद में मध्य भाग में भद्र एवं शीर्षभाग में कर्णकूट, कोष्ठक एवं भद्रनासी आदि अङ्ग निर्मित होते हैं। इसके गल एवं मस्तक ( छत, आच्छादन ) वृत्ताकार अथवा चतुष्कोण होते हैं। मध्य-भद्रक का प्रमाण ( भवन की चौड़ाई के ) पाँच, सात या छः भाग के तीसरे एवं दूसरे भाग के बराबर होना चाहिये।।३३-३४।। ❋ धामभेदाः ❋ नागरं द्राविडं चैव वेसरं च त्रिधा मतम् । चतुरस्रायतास्रं यन्नागरं परिकीर्तितम् ।।३५।।

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३७ भवन के भेद—भवन के तीन भेद होते हैं—नागर, द्राविड एवं वेसर। सम, चतुर्भुज एवं आयताकार भवन नागर कहे गये हैं।।३५।। अष्टास्रं च षडस्रं च तत्तदायाममेव च। सौधं द्राविडमित्युक्तं वेसरं तु प्रकथ्यते ॥३६॥ वृत्तं वृत्तायतं द्व्यस्रं वृत्तं चान्यं प्रकथ्यते। आठ भुजा ( एवं कोण ) तथा छः भुजा ( एवं कोण ) वाला लम्बा भवन द्राविड़ कहा जाता है। वृत्ताकार, लम्बाई लिये वृत्ताकार, दो कोण एवं वृत्ताकार भवन वेसर कहलाता है।।३६।। स्थूप्यन्तं चतुरस्रं यन्नागरं परिकीर्तितम् ॥३७॥ ग्रीवात् प्रभृति वस्वस्रं विमानं द्राविडं भवेत्। ग्रीवात् प्रभृति वृत्तं यद् वेसरं तदुदाहृतम् ॥३८॥ स्तूपिका पर्यन्त चौकोर भवन को नागर कहते हैं। ग्रीवा से अष्टकोण विमान ( भवन, प्रासाद ) द्राविड होता है। ग्रीवा से वृत्ताकार भवन वेसर कहलाता है। ❋ विमानतलदेवता ❋ तले तले विमानानां दिक्षु देवान् न्यसेत् क्रमात्। पूर्व्वां द्वारपालौ तु नन्दिकालौ च विन्यसेत् ॥३९॥ विमान = देवालय के तलों के देवता—विमानों ( देवालयों ) के प्रत्येक तल में दिशाओं में देवताओं का क्रमशः न्यास करना चाहिये। पूर्व दिशा में नन्दी एवं काल के रूप में द्वारपाल का विन्यास करना चाहिये।।३९।। दक्षिणे दक्षिणामूर्तिं पश्चिमेऽच्युतमेव हि। अथवा लिङ्गसम्भूतमुत्तरे तु पितामहम् ॥४०॥ दक्षिण दिशा में दक्षिणामूर्ति को, पश्चिम दिशा में अच्युत को या लिङ्गसम्भूत को एवं उत्तर में पितामह को विन्यस्त करना चाहिये।।४०।। मण्डपे मध्यदेशे तु दक्षिणे तु विनायकम्। तत्पूर्वे पश्चिमे वाऽपि नृत्तरूपं विशेषतः ॥४१॥ मण्डप के मध्य भाग में दक्षिण में विनायक, एवं उनके पूर्व या पश्चिम में नृत्तरूप का विन्यास विशेष रूप से करना चाहिये।।४१।। कात्यायनीमुदग्भागे क्षेत्रपालं तथैव च। स्थानकासनसंयुक्ता दिशामूर्तीर्न्यसेद् बुधः ॥४२॥

२३८ मयमतम् विशेषेण कथोपेतं रूपाण्यपि विधानतः । एवं मूलतले प्रोक्तमुपर्युपरि वक्ष्यते ॥४३॥ उत्तर भाग में कात्यायनी एवं क्षेत्रपाल को तथा स्थानक या आसन ( खड़े अथवा बैठे ) मुद्रा में दिशामूर्तियों का विन्यास करना चाहिये। विशिष्ट कथाओं से युक्त आकृतियों का भी नियमानुसार अङ्कन करना चाहिये। इस प्रकार मूल-तल ( भूतल ) के देवता-विन्यास का वर्णन किया गया। अब ऊपरी तलों के विन्यास का वर्णन किया जा रहा है।।४२-४३।। पुरन्दरं न्यसेत् पूर्वे सुब्रह्मण्यमथापि वा। दक्षिणे वीरभद्रः स्यान्नारसिंहश्च पश्चिमे ॥४४॥ उत्तरे तु विधाता स्याद् धनदो वा विधीयते । एवं द्वितलविन्यासं त्रितले तु मरुद्गणान् ॥४५॥ तले तलेऽमरान् सिद्धान् गन्धर्वादिमुनीन् न्यसेत् । षोडश प्रतिमाश्चैव सर्वत्र परिकीर्तिताः ॥४६॥ दूसरे तल में पूर्व दिशा में पुरन्दर या सुब्रह्मण्य को, दक्षिण में वीरभद्र को, पश्चिम में नरसिंह को एवं उत्तर में विधाता या धनद को विन्यस्त करना चाहिये। तीसरे तल में मरुद्गणों का विन्यास करना चाहिये। प्रत्येक तल में देवों, सिद्धों, गन्धर्वादियों एवं मुनियों का विन्यास करना चाहिये। प्रत्येक तल में सोलह प्रतिमाओं का विन्यास होना चाहिये।।४४-४६।। ग्रीवाधस्तात् प्रतेरूर्ध्वे कोणे कोणे वृषान् न्यसेत् । सर्वेषामपि देवानां तत्तद्वाहनमीरितम् ॥४७॥ प्रदक्षिणावृतं तस्य सर्वदेवालये तथा। इत्येवमादिभिर्युक्तं विमानं सम्पदां पदम् ॥४८॥ कूटैर्नीडैस्तोरणैर्मध्यभद्रैर्युक्तायुक्तं तत्तु सर्वाङ्गशोभम् । नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेद्यादियोगं धाम प्रोक्तं तैतिलानां मयेह ॥४९॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे एकभूमिविधानं नामैकोनविंशोऽध्यायः ग्रीवा के नीचे एवं प्रति के ऊपर कोने-कोने पर वृषभों का विन्यास करना चाहिये। सभी देवों के वाहन का वर्णन किया गया है। सभी देवालयों में देवता के दक्षिण भाग में उनका विन्यास करना चाहिये। इस प्रकार सभी विशेषताओं से युक्त विमान ( मन्दिर )

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३९ सम्पत्तियाँ प्रदान करता है। कूट, नीड, तोरण, मध्य भद्र आदि से युक्त, सभी अलङ्करणों से सुशोभित, विविध प्रकार के अधिष्ठान, स्तम्भ एवं वेदियों आदि से युक्त देवालयों का वर्णन मेरे ( मय ऋषि ) द्वारा किया गया।।४७-४९।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. एकभूमि-विधान ( श्लोक १-३ ) इसका वर्णन शिल्परत्न ( पूर्वभाग-३७.१-१३ ) में प्राप्त होता है। २. भवन-भेद श्लोक ( २-३ ) चार प्रकार के उत्सेध—शान्तिक, पौष्टिक, जयद एवं अद्भुत का वर्णन प्राप्त होता है। शिल्परत्न ( पू. ३७.१ ) में पाँच भेद—शान्तिक, पौष्टिक, जयद, अद्भुत एवं सार्वकामिक प्राप्त होते हैं— शान्तिकं पौष्टिक चैव जयदं त्वद्भुतं पुनः। सार्वकामिकमित्येवं पञ्चधा सदनं स्मृतम्।। ३. वेशन ( श्लोक ६ ) वेशन का वर्णन शिल्परत्न ( पू. ३९.६ ) में इस प्रकार प्राप्त होता है— हस्तं सार्धं द्विहस्तं वा प्रासादस्यांशमेव वा। अन्तरालस्य दीर्घं स्याद् द्विदण्डं तस्य वेशनम्।। ४. भित्ति की चौड़ाई ( श्लोक ८ ) इसकी तुलना शिल्परत्न ( पू. ३९.११ ) के वर्णन से की जा सकती है— प्रासादभित्तिविस्तारतुल्यं वार्थत्रिपादकम्। अन्तरालस्य भित्तेस्तु व्यासं स्यान्मण्डपे तथा।। ५. भवन के पर्याय ( श्लोक १०-१२ ) समराङ्गणसूत्रधार ( १८.८-९ ) में इस प्रकार से भवन के पर्याय प्राप्त होते हैं— आवासः सदनं सद्म निकेतो मन्दिरं मतम्। संस्थानं निधनं धिष्ण्यं भवनं वसतिः क्षयः।। अगारं संश्रयो नीडं गेहं शरणमालयः। निलयो लयनं वेश्म गृहमोकः प्रतिश्रयः।।

अथ विंशोऽध्यायः ( द्विभूमिविधानम् ) द्वितलं पञ्चधा मानं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात्। पञ्चषड्ढस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१॥ सैकार्कमनुहस्तान्तमुत्सेधं पूर्ववद् भवेत्। तारे सप्तर्तुभागे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ॥२॥ ( मन्दिर के ) दूसरे तल के पाँच प्रकार के प्रमाण को क्रमशः संक्षेप में कहता हूँ। पाँच-छः हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ की वृद्धि से तेरह या चौदह हाथपर्यन्त उसकी ऊँचाई पूर्व-वर्णित नियम के अनुसार होनी चाहिये। ( निचले तल के ) विस्तार के छः या सात भाग करने चाहिये। उसके एक भाग को सौष्ठिक ( कर्णकूट ) के लिये ग्रहण करना चाहिये॥१-२॥ कोष्ठं तु द्विगुणायामं शेषं हारं सपञ्जरम्। विमानोत्सेधं विभजेदष्टाविंशतिसङ्ख्यया ॥३॥ कोष्ठ ( मन्दिर के मध्य भाग का कूट ) की लम्बाई के लिये दो या तीन भाग का प्रमाण एवं शेष भाग में हार ( गलियारा ) एवं पञ्जर ( अलङ्करणविशेष ) होना चाहिये। विमान ( देवालय ) की ऊँचाई को अट्ठाईस भागों में बाँटना चाहिये॥३॥ ईशद्गृतुबन्धांशैर्भूतनेत्रशिवांशकैः । नेत्रसार्धचतुर्भागैरध्यर्धेन यथाक्रमम् ॥४॥ मसूरकाङ्घ्रिकं मञ्चाङ्घ्रिमञ्चवितर्दिकम्। कन्धरं शिखरं कुम्भं मूलतः परिकल्पयेत् ॥५॥ ( उपर्युक्त अट्ठाईस भाग में ) तीन भाग मसूरक ( अधिष्ठान ), छः भाग अङ्घ्रि ( भूतल ), तीन भाग मञ्च, पाँच भाग अंघ्रि ( तल ), दो भाग मञ्च, एक भाग वितर्दिक ( वेदिका ), दो भाग कन्धर, साढ़े चार भाग शिखर एवं डेढ़ भाग कुम्भ के लिये होता हैं। यह परिकल्पना मूल से ( शिखरपर्यन्त ) की गई है॥४-५॥ ❋ स्वस्तिकम् ❋ चतुरस्रमधिष्ठानं तद्वत् कन्धरमस्तकम्। चतुष्कूटसमायुक्तं चतुष्कोष्ठसमन्वितम् ॥६॥

विंशोऽध्यायः 卐 द्विभूमिविधानम् २४१ ( स्वस्तिक देवालय का ) अधिष्ठान चतुर्भुज होता है एवं कन्धर तथा मस्तक ( शीर्षभाग ) भी उसी प्रकार होता है। यह चार कूटों एवं चार कोष्ठों ( मध्य-कूट ) से युक्त होता है।।६।। दध्रनीडानुपर्यष्टौ षडष्टैवाल्पनासिकम् । शिखरं चोरुनीडाभिर्वेदसङ्ख्याभिरन्वितम् ।।७।। ऊपरी भाग में आठ दध्रनीड ( सजावटी खिड़कियाँ ) तथा अड़तालीस अल्प- नासिक ( अत्यन्त छोटे अलङ्करण-विशेष ) होते हैं। शिखरभाग में चार बड़े आकार के नीड ( सजावटी खिड़कियाँ ) होते हैं।।७।। हारान्तरस्य मध्ये तु कुड्यं कुम्भलतान्वितम् । तोरणैर्वेदिकाद्यैस्तु नानाचित्रैर्विचित्रितम् ।।८।। सर्वदेवार्हकं शस्तं नाम्नैतत् स्वस्तिकं भवेत् । हार ( चारो ओर निर्मित गलियारा ) के मध्य भाग में भित्ति पर कुम्भ से निर्गत लतायें निर्मित होती हैं तथा तोरण, वेदिका एवं विभिन्न प्रकार के अङ्कनों से भवन सुसज्जित रहता है। यह भवन सभी देवों के अनुकूल होता है एवं इसका नाम स्वस्तिक होता है।।८।। ✺ विपुलसुन्दरम् ✺ तदेव सौष्ठिकं निम्नमुन्नतं कोष्ठकं यदि ।।९।। अन्तरप्रस्तरोपेतमेतद् विपुलसुन्दरम् । यदि देवालय के सौष्ठिक ( कर्णकूट ) नीचे हों एवं कोष्ठक ( मध्य-कूट ) ऊँचा हो तथा अन्तर प्रस्तर से युक्त हो तो उसे 'विपुलसुन्दर' कहते हैं।।९।। ✺ कूटलक्षणम् ✺ अंशमंशत्रयं सत्रिपादांशं साङ्घ्रिभागिकम् ।।१०।। भागत्रयं वितर्द्यङ्घ्रिप्रस्तरग्रीवमस्तकम् । पादोदये दशांशे तु द्वितलादिविमानके ।।११।। अन्तरप्रस्तरोपेतं कूटशालोन्नतं मतम् । कूट का लक्षण—द्वितल आदि वाले विमान ( देवालय ) में पादोदय ( पूरे देवालय ) के दश भाग होने चाहिये। एक भाग से वितर्दि, तीन भाग से अङ्घ्रि, पौने दो भाग से प्रस्तर, सवा भाग से ग्रीव तथा तीन भाग से मस्तक निर्मित होना चाहिये। अन्तर प्रस्तर से युक्त ऊँचे भवन को 'कूटशाल' कहते हैं।।१०-११।। मय०-१६

२४२ मयमतम् ✹ कैलासादि ✹ तदेव कोष्ठकं निम्नं सौष्ठिकं चोन्नतं यदि ॥१२॥ अन्तरप्रस्तरोपेतमेतत् कैलासमुच्यते । यदि कोष्ठक नीचा हो एवं सौष्ठिक ऊँचा हो तथा अन्तर-प्रस्तर से युक्त हो तो उस भवन ( देवालय ) को कैलास कहते हैं ॥१२॥ तदेव वर्तुलं वेदिकन्धरं शिखरं घटम् ॥१३॥ अष्टकूटं चतुश्शालोपेतं सप्ताष्टनासिकम् । कोष्ठकान्निर्गमं मध्ये द्वित्रिदण्डेन सौष्ठिकात् ॥१४॥ समग्रीवाशिरोयुक्तं कूटकोष्ठकमीरितम् । नानाधिष्ठानसंयुक्तं नानापादैरलङ्कृतम् ॥१५॥ नाम्नैतत् पर्वतं प्रोक्तं विमानं सार्वदेशिकम् । यदि वेदी, कन्धर, शिखर एवं घट वर्तुलाकार हों, आठ कूट हों, चार शाल से युक्त हों, छप्पन नासिक ( सजावटी खिड़कियों की आकृतियाँ ) हों, कोष्ठक ( मध्य कूट ) से प्रारम्भ हुये दो या तीन दण्ड के निर्गम सौष्ठिक से सम्बद्ध होते हैं। समान माप वाले ग्रीवा एवं शीर्षभाग से युक्त कूट-कोष्ठ होते हैं। विविध प्रकार के अधिष्ठान से युक्त एवं विविध प्रकार के स्तम्भों से सुसज्जित विमान की संज्ञा ‘पर्वत’ होती है एवं यह सभी के अनुकूल होती है ॥१३-१५॥ तदेव शिखरे चार्धकोष्ठकं तु चतुष्टयम् ॥१६॥ चतुरश्रशिरोयुक्तं चतुष्कूटसमन्वितम् । नानाधिष्ठानसंयुक्तं षडष्टैवाल्पनासिकम् ॥१७॥ नाम्नैतत् स्वस्तिबन्धं स्यान्नानावयवशोभितम् । देवालय के शिखर पर चार अर्धकोष्ठ हों, इनका शिरोभाग चौकोर हो एवं चार कूटों से युक्त हो, अनेक प्रकार के अधिष्ठान से युक्त हों एवं अड़तालीस अल्पनासिक हों, तो उसकी संज्ञा ‘स्वस्तिबन्ध’ होती है एवं यह विभिन्न अङ्गों से सुसज्जित होता है ॥१६-१७॥ तदेव सौष्ठिकं कोष्ठमन्तरप्रस्तरैर्युतम् ॥१८॥ हारालपपञ्जरं निम्नं नवाष्टैर्वाल्पनासिकम् । नानालङ्कारसंयुक्तं कल्याणमिति पठ्यते ॥१९॥ यदि कोणों एवं मध्य में अन्तर-प्रस्तर से युक्त कोष्ठ हों, हारा ( गलियारा ) एवं

विंशोऽध्यायः 卐 द्विभूमिविधानम् २४३ अल्प-पञ्जर नीचे हों, बहत्तर अल्प-नासिक हों तथा विभिन्न अलङ्करणों से युक्त हों तो उस देवालय को 'कल्याण' कहते हैं।।१८-१९।। तदेव शिखरे चार्थकोष्ठकं रहितं तु चेत्। चतुर्नीडासमायुक्तमेतत् पाञ्चालमिष्यते ॥२०॥ यदि देवालय के शिखरभाग पर अर्धकोष्ठ न हों तथा वहाँ चार नीडा ( सजावटी खिड़की की आकृतिविशेष ) निर्मित हों तो उसे 'पाञ्चाल' कहते हैं।।२०।। तदेवाष्टास्रकं वेदीकन्धरं शिखरं घटम्। शिखरेऽष्टमहानासि नाम्नैतद् विष्णुकान्तकम् ॥२१॥ यदि देवालय की वेदी, कन्धर, शिखर एवं घट अष्ट-कोण हों तथा शिखर पर आठ महानासी निर्मित हों, तो उसकी संज्ञा 'विष्णुकान्त' होती है।।२१।। तदेव कूटशालानामन्तरप्रस्तरं विना। तच्चतुर्भागमाधिक्यमायतं चतुरस्रकम् ॥२२॥ आयतास्रं तथा वेदीकन्धरं शिखरं भवेत्। स्थूपीत्रयसमायुक्तमेतन्नाम्ना सुमङ्गलम् ॥२३॥ यदि देवालय कूट, शाला ( मध्य कोष्ठ ) एवं अन्तर-प्रस्तर से रहित हो, चार भुजाओं वाला हो तथा लम्बाई चौड़ाई से चतुर्थांश अधिक हो, वेदी, कन्धर एवं शिखर आयताकार हों एवं तीन स्तूपियाँ हों तो उसका नाम 'सुमङ्गल' होता है।।२२-२३।। तदेवायतवृत्तं चेद् वेदिकाकन्धरं शिरः। सर्वावयवसंयुक्तमेतद् गान्धारमिष्यते ॥२४॥ यदि देवालय की वेदिका, गल एवं शिरोभाग वृत्तायत ( लम्बाई लिये वृत्ताकार ) हों तथा सभी अङ्गों से भवन युक्त हो तो उसकी संज्ञा 'गान्धार' होती है।।२४।। तारादर्धांशमाधिक्यमायतं चतुरस्रकम्। द्व्यस्रवृत्तशिरोयुक्तं नेत्रशालामुखान्वितम् ॥२५॥ हस्तिपृष्ठमिदं द्व्यस्रं वृत्तं वापि मसूरकम्। यदि देवालय आयताकार हो तथा लम्बाई चौड़ाई से आधा भाग अधिक हो, शिरोभाग दो कोण से युक्त गोलाई लिये हो तथा मुखभाग ( सामने ) पर नेत्रशाला ( नेत्र की आकृति का प्रकोष्ठ ) हो तो उसे 'हस्तिपृष्ठ' कहते हैं। इसका अधिष्ठान दो कोण से युक्त गोलाकार भी हो सकता है।।२५।। चतुरस्रमधिष्ठानं वृत्तं स्याद् गर्भगृहकम् ॥२६॥

२४४ मयमतम् सर्वालङ्कारसंयुक्तमेतन्नाम्ना मनोहरम् । यदि देवालय का अधिष्ठान चौकोर हो एवं गर्भगृह वृत्ताकार हो तथा भवन सभी अलङ्करणों से युक्त हो तो उसकी संज्ञा 'मनोहर' होती है।।२६।। तदेव जन्माद्य कुम्भाद् वृत्तं चेति बहिर्बहिः ॥२७॥ शेषं पूर्ववदुद्दिष्टमिष्टमीश्वरकान्तकम् । यदि जन्म ( भवन के मूल ) से लेकर कुम्भ ( शिखर भाग ) तक देवालय बाहर एवं भीतर से वृत्ताकार हो एवं शेष भाग पूर्ववर्णित विधि के अनुसार हो तो उसे 'ईश्वरकान्त' कहते हैं।।२७।। तदेव चतुरस्रं स्याद् गर्भगेहं मसूरकम् ॥२८॥ वर्तुलं जन्मतः स्थूपिकान्तं चेद् वृत्तहर्म्यकम् । यदि देवालय का गर्भगृह चौकोर हो, अधिष्ठान गोलाकार हो तथा जन्म से लेकर स्तूपिकापर्यन्त भवन वृत्ताकार हो तो उसे 'वृत्तहर्म्य' कहते हैं।।२८।। आयतास्रमधिष्ठानं षडस्रं कन्धरं शिरः ॥२९॥ तदेव पूर्ववत् सर्वं नाम्ना कुबेरकान्तकम् । यदि अधिष्ठान चौकोर हो तथा कन्धर एवं शिर षट्कोण हों एवं शेष सभी भाग पूर्ववत् हों तो उस देवालय की संज्ञा 'कुबेरकान्त' होती है।।२९।। मानं पञ्चविधं धाम्नां भेदं पञ्चदशैव हि ॥३०॥ द्वितलानां यथा प्रोक्तं तथा कुर्याद् विचक्षणः । दो तल वाले भवनों के प्रमाण पाँच प्रकार के होते हैं एवं उनके भेद पन्द्रह होते हैं। बुद्धिमान ( स्थपति ) को भवन का निर्माण उसी प्रकार करना चाहिये, जिस प्रकार उनका वर्णन किया गया है।।३०।। ❋ पुनः धामभेदाः ❋ सञ्चितासञ्चितं चैवोपसञ्चितमिति त्रिधा ॥३१॥ पुनः भवन के भेद—सञ्चित, असञ्चित एवं उपसञ्चित संज्ञक भवन के तीन भेद होते हैं।।३१।। स्त्रीपुंनपुंसकं चैव त्रिविधं तत् प्रवक्ष्यते । इष्टकाभिः शिलाभिर्वा सञ्चितं यद् घनीकृतम् ॥३२॥ उपर्युक्त भेदों को स्त्री, पुरुष एवं नपुंसक कहते हैं। ईंटों अथवा शिलाओं से निर्मित भवन 'सञ्चित' होता है।।३२।।

विंशोऽध्यायः 卐 द्विभूविधानम् २४५ कपोतादिशिरोयुक्तं तत्तुं पुंस्त्वं समीरितम् । ऐष्टकं दारुजं सौधं भोगयुक्तागसंयुक्तम् ॥३३॥ स्त्रीत्वं ह्यसञ्चितं भोगाभोगयुक्तं द्रुमेष्टकैः । घनाघनाङ्गयुक् षण्डमुपसञ्चितमिष्यते ॥३४॥ कपोत आदि जिस भवन के शीर्षभाग पर हों, उसे पुरुष भवन कहते हैं। ईंटों या काष्ठ से निर्मित, भोग एवं आग (शिरोभाग के विशिष्ट निर्माण) से युक्त भवन स्त्रीत्वयुक्त 'असञ्चित' संज्ञक होते हैं। काष्ठ अथवा ईंटों से निर्मित भोग एवं अभोग से युक्त तथा घन एवं अघन अङ्गों से युक्त भवन नपुंसक होता है। इसकी संज्ञा 'उपसञ्चित' होती है।।३३-३४।। ✺ खण्डभवनम् ✺ ऊर्ध्वतलपादनिजदैर्घ्यमुनिभागे स्थूप्युदयमेकमथ कं प्रति गुणांशम् । द्व्यंशि गलमंशकवितर्दिकमधस्तात् खण्डभवनस्य विधिरुक्तमुरुधीभिः ॥३५॥ मनीषियों के अनुसार खण्डभवन की स्थूपी (स्तूपिका) का मान ऊपरी तल के स्तम्भ के सातवें भाग के बराबर होता है। छत की ऊँचाई (स्तम्भ के सात भाग) के तीन भाग के बराबर, गल दो भाग के बराबर एवं वितर्दिक (गल का आधार) एक भाग के बराबर होता है।।३५।। ✺ तोरणम् ✺ पादोदये दशनवाष्टविभाजिते तत् सप्तर्तुपञ्चचरणायतमत्र भागम् । शेषं झषांशमुदयार्धविशालकं वा षट्पञ्चवेदचरणेन भवेद्विशालम् ॥३६॥ तोरण की ऊँचाई के लिये स्तम्भ के दश, नौ या आठ भाग करने चाहिये। उनमें क्रमशः सातवें, छठे या पाँचवें भाग को ग्रहण करना चाहिये। शेष भाग से झषांश (मछली की आकृति के सदृश गोलाई लिये पट्टिका) निर्मित करना चाहिये। इसकी चौड़ाई लम्बाई की आधी, छठवें भाग, पाँचवें भाग अथवा चौथे भाग के बराबर रखनी चाहिये।।३६।। नीडस्य तावदुदयं च विशालमङ्घ्रे- र्मूलात् त्रिपादविपुलं तलिपं तयोश्च।

२४६ मयमतम् हारान्तरे सदनमध्यपदे च कूटे कोष्ठे च तोरणमलङ्कृतमेव कुर्यात् ॥३७॥ नीड (सजावटी खिड़की की आकृति) की चौड़ाई उसकी ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये। उन दोनों (तोरण एवं नीड) की परिधि स्तम्भ के मूल भाग के तीन चौथाई के बराबर होनी चाहिये। हार के मध्य, भवन-मध्य, कूट पर एवं कोष्ठ पर तोरण से अलङ्करण करना चाहिये॥३७॥ द्वारस्योभयपार्श्वे द्वारसमीपे तु वाथ पदमध्ये। द्वारपवासगुहा स्यादुत्तरमण्डान्तकं तु वोच्चं तत् ॥३८॥ खण्डान्तपोतिकान्तं तोरणमात्रोदयं तु वा कथितम्। युक्त्या प्रवेशयुक्त्या सर्वस्मिन् धाम्नि कर्तव्याः ॥३९॥ इति मयमते वस्तुशास्त्रे द्विभूमिविधानं नाम विंशोऽध्यायः द्वार के रक्षक का कक्ष द्वार के दोनों पार्श्वों में, द्वार के समीप अथवा पद के मध्य में होना चाहिये। इसकी ऊँचाई उत्तरमण्डपर्यन्त, खण्डपर्यन्त, पोतिकापर्यन्त अथवा तोरणपर्यन्त कही गई है। सभी भवनों में उचित रीति से प्रवेश-भाग का निर्माण युक्ति- पूर्वक करना चाहिये॥३८-३९॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी १. द्विभूमि-विधान शिल्परत्न (पूर्व.-३७.१३-१७) में विस्तार से प्राप्त होता है। २. कुम्भलता कुम्भलता (श्लोक ८) का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. २८ अ.) में प्राप्त होता है— स्तम्भान्तरे महति धामनि पादविस्तारोच्चाधिपादततपद्मगकुम्भसंस्थाम्। पादायतां घटमुखोद्गतपत्रचित्रमूलां प्रकल्पयतु कुम्भलतां समन्तात्।।१।। ∗</p> विनिर्गतोन्नतिं कुम्भं पार्श्वयोस्तस्य तन्मुखात्। पत्रैर्विनिर्गतैश्चित्रं यथाशोभं नियोजयेत्।।३।।

विंशोऽध्यायः 卐 द्विभूमिविधानम् २४७ तदूर्ध्वं कुड्यचरणसमपादाम्बुजासनम्। अखण्डकलशं कुर्यात्पद्मं कुम्भलतान्वितम्।।१४।। तस्याः कुम्भलता संज्ञा सैव खण्डोपरि क्रमात्। नक्रतोरणविन्यस्ता स्तम्भकुम्भलता मता।।१५।। ३. सञ्चित आदि भवन-भेद सञ्चित आदि भवन-भेदों का वर्णन मानसार ( १९ अ. ) में प्राप्त होता है— आसनं सञ्चितं प्रोक्तं स्थानकं स्यात्त्वसञ्चितम् ।।५।। अपसञ्चितंशयनं चेत्स्यात्तत्रिविधहर्म्यके ।।६।।