मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमोऽध्यायः ( मानोपकरणम् ) सर्वेषामपि वास्तूनां मानेनैव विनिश्चयः । तस्मान्मानोपकरणं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् ॥१॥ भूमि-मापन के उपकरण—सभी प्रकार के वास्तुओं ( भूमि एवं भवन ) का निर्धारण मान या प्रमाण से ही किया जाता है; अतः मैं ( मय ऋषि ) संक्षेप में मापन के उपकरणों के विषय में बतलाता हूँ।।१।। परमाणुक्रमाद् वृद्धं मानाङ्गुलमिति स्मृतम् । परमाणुरिति प्रोक्तं योगिनां दृष्टिगोचरम् ॥२॥ ( मापन की प्रथम इकाई ) अङ्गुल-माप परमाणुओं के क्रमशः वृद्धि से होती है। परमाणुओं का दर्शन योगी-जनों को होता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।।२।। परमाणुभिरष्टाभी रथरेणुरुदाहृतः । रथरेणुश्च वालाग्रं लिक्षायूकायवास्तथा ॥३॥ आठ परमाणुओं के मिलने से एक 'रथरेणु' ( धूल का कण ), आठ रथरेणुओं के मिलने से एक 'बालाग्र' ( बाल की नोक ), आठ बालाग्र से एक 'लिक्षा', आठ लिक्षा से एक 'यूका' एवं आठ यूका से एक 'यव' रूपी माप बनता है।।३।। क्रमशोऽष्टगुणैः प्रोक्तो यवाष्टगुणितोऽङ्गुलम् । अङ्गुलं तु भवेन्मात्रं वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलम् ॥४॥ उपर्युक्त माप क्रमशः आठ गुना बढ़ते हुये 'यव' बनते हैं। यव का आठ गुना 'अङ्गुल' माप होता है। बारह अङ्गुल माप को 'वितस्ति' ( बित्ता ) कहते हैं।।४।। तद्द्वयं हस्तमुद्दिष्टं तत् किष्क्विति मतं वरैः । पञ्चविंशतिमात्रं तु प्राजापत्यमिति स्मृतम् ॥५॥ दो वितस्ति का एक 'हस्त' होता है, जिसे 'किष्कु' भी कहा गया है। पच्चीस हाथ का एक 'प्राजापत्य' होता है।।५।। षड्विंशतिर्धनुर्मुष्टिः सप्तविंशद्धनुर्ग्रहः । याने च शयने किष्कुः प्राजापत्यं विमानके ॥६॥