मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसघर्षाभिव्यक्ति १०७ पाठान्तर २, राणा म्हासूँ क्यो ने जी राखो बैर । मारू घर मेवाड मेडत्यों, सारा छोडया सहैर । आप राणा जी म्हॉने इसका·लागो, जैसा जगल मे कैर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राम भरोसे पियो जहरै । दूसरा पाठ प्रथम पाठ का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है। प्रथम पाठ की ठेठ राजस्थानी भाषा द्वितीय पाठ मे ब्रजभाषा की ओर झुकती प्रतीत होती है। जैसे 'म्हाँसू', 'मोसूं', 'इसडा लागो', 'असा लगत हो।' द्वितीय पाठ की "मारू घर मेवाड मेडतो" अभिव्यक्ति प्रथम पाठ से सर्वथा भिन्न पडती है। पूर्वापर सबंध देखते भी "मारू" शब्द का प्रयोग अशुद्ध ही ठहरता है । शुद्ध रूपेण 'म्हाँरो' होना चाहिए । म्हाँरो का अर्थ है "मेरा" । इन सभी पाठो से समान रूपेण व्यक्त होनेवाली एक अभिव्यक्ति “म्हाने इसडा लागो ज्यो बिरछन मे केर'।" विशेष विचारणीय है। १ केर एक कटीला पेड जो राजस्थान के जगलो मे बहुतायत से पाया जाता है। इसमे गोल गोल, छोटे हरे फल लगते हैं जो बहुत खारे होते हैं। इन फलो मे छोटे छोटे बीज भी होते हैं। इनको नमक के पानी मे एक लम्बे अरसे तक के लिए भिगो दिया जाता है, जिससे इसका खारापन निकल जाता हैं तब इसको कूट कर बीज अलग कर दिया जाता है और इसकी तरकारी या अचार बनाया जाता है। इस पेड के काटे बहुत तीखे होते हैं। इसकी टहनियाँ काटकर खेत आदि के किनारे दो तीन तीन फिट ऊची दीवार के रूप मे खडी कर दी जाती है, जिससे जानवर आदि खेत खराब न कर सके । सुरक्षा के ख्याल से मकान के चारो तरफ भी प्रात लोग इसको लगा देते है। इन झाडो को केर की झाडी कहते हैं। झाडी शब्द ही इसके लिये रूढ़यार्थ हो गया है। इन झाडियो पर भूत-प्रेत का निवास माना जाता हैं। अत सूर्यास्त के समय से कोई इनके पास से गुजरता भी नही है। "इसडा लागो ज्यो ब्रच्छन मे "कैर" जैसी अभिव्यक्ति से राणा के प्रति मीराँ की कटु और हीनतम भावनाए स्पष्ट हो उठती है।