मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
सघर्षाभिव्यक्ति १०७ पाठान्तर २, राणा म्हासूँ क्यो ने जी राखो बैर । मारू घर मेवाड मेडत्यों, सारा छोडया सहैर । आप राणा जी म्हॉने इसका·लागो, जैसा जगल मे कैर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राम भरोसे पियो जहरै । दूसरा पाठ प्रथम पाठ का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है। प्रथम पाठ की ठेठ राजस्थानी भाषा द्वितीय पाठ मे ब्रजभाषा की ओर झुकती प्रतीत होती है। जैसे 'म्हाँसू', 'मोसूं', 'इसडा लागो', 'असा लगत हो।' द्वितीय पाठ की "मारू घर मेवाड मेडतो" अभिव्यक्ति प्रथम पाठ से सर्वथा भिन्न पडती है। पूर्वापर सबंध देखते भी "मारू" शब्द का प्रयोग अशुद्ध ही ठहरता है । शुद्ध रूपेण 'म्हाँरो' होना चाहिए । म्हाँरो का अर्थ है "मेरा" । इन सभी पाठो से समान रूपेण व्यक्त होनेवाली एक अभिव्यक्ति “म्हाने इसडा लागो ज्यो बिरछन मे केर'।" विशेष विचारणीय है। १ केर एक कटीला पेड जो राजस्थान के जगलो मे बहुतायत से पाया जाता है। इसमे गोल गोल, छोटे हरे फल लगते हैं जो बहुत खारे होते हैं। इन फलो मे छोटे छोटे बीज भी होते हैं। इनको नमक के पानी मे एक लम्बे अरसे तक के लिए भिगो दिया जाता है, जिससे इसका खारापन निकल जाता हैं तब इसको कूट कर बीज अलग कर दिया जाता है और इसकी तरकारी या अचार बनाया जाता है। इस पेड के काटे बहुत तीखे होते हैं। इसकी टहनियाँ काटकर खेत आदि के किनारे दो तीन तीन फिट ऊची दीवार के रूप मे खडी कर दी जाती है, जिससे जानवर आदि खेत खराब न कर सके । सुरक्षा के ख्याल से मकान के चारो तरफ भी प्रात लोग इसको लगा देते है। इन झाडो को केर की झाडी कहते हैं। झाडी शब्द ही इसके लिये रूढ़यार्थ हो गया है। इन झाडियो पर भूत-प्रेत का निवास माना जाता हैं। अत सूर्यास्त के समय से कोई इनके पास से गुजरता भी नही है। "इसडा लागो ज्यो ब्रच्छन मे "कैर" जैसी अभिव्यक्ति से राणा के प्रति मीराँ की कटु और हीनतम भावनाए स्पष्ट हो उठती है।
१०८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह इस पद का एक और भी पहलू विशेष विचारणीय है। पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट है कि मीराँ ने गृह-त्याग कर दिया है किन्तु अब भी राणा को मीराँ के प्रति उपालंभ है। अब भी राणा का मन मीराँ के प्रति कठोर भावनाओ से पूर्ण है। मीराँ कराह उठती है कि जहर पीने पर और घर छोड देने पर भी राणा का व्यवहार उनके प्रति कठोर है। गृह-त्याग के बाद भी मीराँ के समक्ष राणा के बैर का प्रश्न ही क्योकर उठ सका, प्राप्त वृतान्त यहाँ सर्वथा मौन है। अस्तु, स्पष्ट ही है कि पद को प्रामाणिक मान लेने पर पदाभिव्यक्ति से व्यक्त होती घटनाओ पर खोज होना नितान्त आवश्यक हो जाता है। १६ सिसोद्या राणो, प्यालो म्हाँने क्यूँ रे पठायो। भली बुरी तो मै नहि कीन्ही राणा क्यूँ है रिसायो। थाने म्होने देह दिवी है ज्याँ रो हरि गुण गायो। कनक कटोरे लै विष घाल्यो दयाराम भडो लायो। अठी उठी१ तो मै देख्यो कर चरणामृत पायो। आज कल की मै नाही राणा जद यह ब्राह्माण्ड छायो। मेडतिया घर जन्म लियो है मीराँ नाम कहायो। प्रहलाद की प्रतिज्ञा राखी खभ फाड बेगो धायो। मीराँ कहे प्रभु गिरिधर नागर, जन को बिडद बढायो।।१७९।।† पदाभिव्यक्ति मे संगति का अभाव है। "आज काल की मै नही" जैसी अभिव्यक्ति के तुरन्त बाद ही "मेडतिया घर जन्म लियो है" जैसी अभिव्यक्ति अमान्य ही हो उठती है। पद का प्रारम्भ होता है राणा के प्रति सम्बोधन से और अन्त होता है कृष्ण की लीलाओ के वर्णन से, यहाँ भी पूर्वापर सबंध की असबद्धता स्पष्ट हो उठती है। पदाभिव्यक्ति से व्यक्त होती बाते विशेष विचारणीय है। पदाभिव्यक्ति के अनुसार राणा की आज्ञा से मीराँ तक विष का प्याला ले जाने वाला व्यक्ति का नाम दयाराम पांडे था। परन्तु मुंशी १ यहाँ वहाँ—चारो तरफ।
संघर्षाभिव्यक्ति १०९ देवीप्रसाद तथा अधिकांश आधुनिक विद्वानो के मतानुसार अपने मुँह लगे “मुसाहिब जो बीजावर्गी जात का महाजन था” की सलाह से ही (इसीके द्वारा) राणा ने मीराँ तक विष पहुँचाया था। कहा जाता है कि मरते मरते मीराँ ने श्राप दिया था जिसके कारण आज तक इनके कुटुम्ब मे धन और सन्तान दोनो की एक साथ वृद्धि नही होती। यदि इस विषपान द्वारा मीराँ की मृत्यु मान ली जाती है तो तथाकथित मीराँ के पदो की रचयित्री यह कौन देवी है ? इस घटना पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से खोज करने पर बहुत सम्भव है कि मीराँ के जीवन पर गहरा प्रकाश पड सके। पद की सातवी पक्ति “मेडतिया 'कहायो” दूसरी विचारणीय पदाभिव्यक्ति है। स्पष्ट ही इस पक्ति का शेष पद से पूर्वापर सबंध नही मिलता। भाषा की दृष्टि से भी यह पक्ति विचारणीय है। सम्पूर्ण पद की भाषा ठेठ राजस्थानी है, परन्तु इस पक्ति पर ब्रजभाषा की छाप है।' पद की अतिम पक्ति मे प्रयुक्त “जन” शब्द विचारणीय है। पूर्वापर सबंध को देखते हुए यह शब्द “भक्त” के अर्थ मे भी प्रयुक्त हुआ प्रतीत होता है। सत-मत से प्रभावित तथाकथित मीराँ के कुछ पदो मे 'जन' शब्द का प्रयोग मिलता है। अन्तिम तीनो पक्तियो की भाषा शेष पद से भिन्न पडती है। सम्पूर्ण पद की भाषा पुरानी राजस्थानी है जब कि इन तीन पक्तियो की भाषा आधुनिक राजस्थानी ही कही जा सकती है। क्या यह संभव नही है कि यह तीन पक्तिया ही पीछे से जुडा ली गयी हो। यो भी, पदको प्रामाणिक मान लेने पर अद्यावधि मान्य वृत्तान्त को बहुत कुछ बदल देना होगा। १७ इण सरवरिया री पाल मीराँ बाई सांपडे¹। [L27: ] सापड किया असनान सूरज सामी² जप करे। होय बिरगी³ नार डगराँ⁴ बीच क्यूँ खडी ? काई थांरो पीहर दूर घराँ सासू लडी 7 १ तैर रही हैं, २ सम्मुख, ३ उत्साहहीन, उदास, ४ रास्ते।
११० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह चल्यो जा रे असल गुवार¹ तन्ने² मेरी के पडी । गुरु म्हारा दीनदयाल हीरा रा पारखी । दियो म्होने ज्ञान बताय, सगत कर साध री । खोई कुल की लाज, मुकुन्द थारे कारणे । बेग ही लीज्यो सम्हाल मीराँ पडी बारणे³ ॥१८४॥† यह पद कुछ हेरफेर से निम्नाकित रूप मे भी मिलता है “गाई थॉरो पीहर ॰ सासू लड़ी ।” पक्ति के बाद निम्नाकित पक्ति है — “नहि म्हारो पीहर दूर घरा सासू लडी” जो पूर्वापर सगति को दखते अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है । “दियो म्हाने ˚ साध री” पक्ति के बाद निम्नाकित चार पक्तियाँ है . इण सरवरिया रा हस, सुरग थॉरी पाखड़ी । राम मिलण कब होय फड़ुके म्हॉरी आँखड़ी । राम गये बनवास को सब रग ले गये । ले गये म्हॉरी काया को सिंगार, तुलसी की माला दे गये ।” पूर्वापर सबध देखते उपर्युक्त पक्तियाँ उपयुक्त नही प्रतीत होती । इस पदके अन्य पाठान्तरो मे भी इसकी प्रथम दो पक्तियाँ हू-बहूआयी हैं । अन्तिम दोनो पंक्तियो की अभिव्यक्ति विचारणीय है । पाठान्तर १, ऊभी मीराँ सरवरिया री पाल, मन मे आमण दूमणी४ । भर भर धोबा धोये नैन साधां रे संग जोवती⁵ । १ मूर्ख, २ तुमको, ३ शरण, ४ आमणदूमणी आशकाजनित व्याकुलता, व्याकुलतायुक्त, ५ प्रतीक्षा करती ।
संघर्षाभिव्यक्ति १११ तू छे ए भले घर री नार¹ गेले बीच क्यूँ खँडी। के थारो पियो परदेस के थॉरी सासू लड़ी। चल्यो जा रे असल गवार तन्ने मीराँ की के पड़ी। चल्यो जा रे असल ग्वार तन्ने मेरी के पडी। म्हारे हर गया बनवास ने सदेशा ओ हर ने ज्यूँ खडी। पोवे मोतीडारो हार हीरा री राखडी²। राधा रुकमण को नोसर हार किसन जी की राखडी। उड जा उड जा सरवरियाँ हस जे सुरग थारी पाखडी। कद आसी गोपिया वालो कान्ह फरके बाई आखडी। सतगुरु मिलिया चतुर सुजान हीरा रा कहिए पारखी। पाठान्तर २, ऊभी मीरा, सरवरिया री पाल, ऊदासी मीराँ क्यूँ खडी, थे छो भले घर की नार। के थारो पियो दूर, काईं थाने सासु लडी। ना म्हारो पियो दूर, ना सासु लडी। जा न जा असल गँवार, मीराँ की तन्ने के पड़ी। आज म्हाँरा हर गया बनवास ने, संदेशा ल्यूँ खड़ी। गया है तो मीराँ जान भी द्यो, थारो काईं ओ ले गया गोपाल। ले गया ले गया म्हारा हर जी सोलह सिणगार। ढक गया प्रभुजी सजन किवाड़। ताला ढँक कूँची³ ले गया। कद म्हाँरा प्रभुजी आवे बनवास संदेशा ल्यूँ खड़ी। उड़ जा उड जा सरवरिया रा हस सोने मे गढा दूँ तेरी चॉच रूपे मे गढा दूँ तेरी पाखड़ी। १ स्त्री। नारी राजस्थानी मे शब्द की मात्राओ पर ध्यान नही दिया जाता। प्राय अकार और इकार लय की सुविधानुसार परिवर्त्तित हो जात हैं। २ राखी, शुभ समझा जाने वाला एक प्रकार का जेवर, ३ ताली।
११२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह मीराँ पोवै मोतीडारो हार, भल गूँथे राखड़ी। फडूूँके म्हॉरी आंखडी। आज म्हॉरा प्रभु जी आया बनवास, फरूखै म्हारी आखँडी। यूँ कहै मीराँ बाई। इस पाठान्तर की एक पक्ति "ना म्हॉरो पियो दूर ना सासु लडी" विशेष विचारणीय है, क्योकि इससे मीराँ का सधवा होना सिद्ध होता है। पाठान्तर ३, (तू तो) सॉवड़ली गोरी नार, मारग बिच क्यो खडी। (मीराँ) कोई थॉरी दूषै छै आँख कै घरोँ सास लडी। (मीरा) कॉइ थॉरो पिया परदेस सदेसै यो पडी। (तू तो) चल्यो जा रे असल गँवार, तुझे तो मेरी क्या रे पडी। (तू तो) उड़ रे हरिया बनका सूवटा¹ तू तो उड रे द्वारिका मे जाय सॉवरिया ने कहियो ओलमा²। मीराँ क्याँ पर लिखोला³ सलाम⁴, क्याँ पर तो करडा⁵ ओलमा। सूआ चूँचा पै लिखूँली सलाम परैवा⁶ पै करडा ओलमा। मीराँ ग्यारसने करो जी निहार⁷ बारस ने खोलो पारनो⁸। मीराँ तेरस ने चालै दीनानाथ, चौदस ने हरि आ मिले। राणा थे छो म्हॉरा झूठा भरतार, साचा छै श्री हरि सॉवरा। यह पाठान्तर अन्य पदो से कुछ अलग पडता है। इसकी कुछ पक्तियाँ खडी बोली से प्रभावित है और शैली राजस्थानी लोक गीतो से। "सलाम" लिखने की जैसी अभिव्यक्ति राजस्थान के अन्य लोकगीतो मे भी मिलती है। मुगलो के विरुद्ध अपने कठिन विरोध के होते हुए भी १ तोता, २ शिकायत, ३ लिखोगी, ४ नमस्कार, ५ कठिन, ६ पख, ७ निराहार, ८ व्रत।
संघर्षाभिव्यक्ति ११३ राजपूतो की भाषा पर, वेशभूषा पर, रहन सहन पर मुगल दरबार का प्रभाव पडा था। कुछ ऐसे लोकगीतो मे जिनकी अभिव्यक्ति के आधार पर परवर्त्ती काल का कहा जा सकता है, “सलाम” लिखने की अभिव्यक्ति मिलती है। इस पाठान्तर की भाषा और शैली के आधार पर इसको भी गेय रूपान्तर मात्र ही समझना सगत होगा। पद की अन्तिम पक्ति से व्यक्त होती भावना भी विचारणीय है। मीराँ के पदों की अभिव्यक्तियो व परम्परागत मान्यताओ दोनो के ही आधार पर मीराँ का विधवा होना प्रमाणित नही होता।
१८
सिसोद्यो रूठ्यो तो म्हारो काई कर लेसी। म्हे तो गुण गोविन्द का गास्या हो माई। राणो जी रूठ्यो वारो देस रखासी। हरि रूठ्या कुम्हलास्यां हो माई। लोक लाज की काण न मानूं। निरभै निसाण घूरास्या हो माई। राम नाम का झाझ¹ चलास्यां भव सागर तिरजास्या हो माई। मीराँ सरण सावल गिरधर की, चरण कवल लपटास्या हो माई। ॥१८॥
कही पद की चतुर्थ पंक्ति मे प्रयुक्त “कुम्हलास्या” के बदले “कठे जास्या” “किये जास्या” या “कोठे जास्या” का प्रयोग भी मिलता है। “किथे” राजस्थानी भाषा का शब्द नही है और ‘झेठे’ अर्थहीन प्रतीत होता है। “केंठे जास्या” पाठ असगत भी नही ठहरता तथापि यह कहना कि “कुम्हलास्यां” या “कठे जास्या” दोनो मे से कौन पाठ प्रामाणिक है, सम्भव नही।
१ जहाज। ८
११४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १९ राणे जी मेवाडॊ, म्हारो काईं करसी । म्हे तो गोविन्दरा गुण गास्या हो माय । राणा जी रूससी गाव रखासी । हरि रूस्या कुम्लास्या हो माय । म्हारो तो पण चरणामत रो, नित उठि मदिर जास्या हे माय । मदिरया मे माधुरी मूरति निरख निरख गुण गास्या हे माय । राणे जी भेज्या विषरा प्याला, कर चरणामृत पीस्या हे माय । राणे जी भेज्या साप पिटारा, तुलसी की माला कर पैरा हे माय । हाथा से करताल बजावा घूघरिया धमकास्या१ हे माय । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर हरि चरणा चित ध्यास्या२ हे माय । ॥१८२॥ २० राणा जी मेवाडो म्हारो काईं करसी । मै रूसियो राम रिझाया ये माय । राणे जी रूठ्या गाव रखासी, हरि रूस्या कुम्हलास्या ये माय । तन करताल, मना कर मोहचिंग,३ घूघरिया धमकास्या ये माय । राणे जी भेज्या विष को प्यालो, कर चरणामृत पीस्या ये माय। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, हरि चरणा चित लास्या ये माय ॥१८३॥ १ बजाऊँगी, २ ध्यान करूँगी, ३ डफली ।
संघर्षाभिव्यक्ति ११५ २१ रसियो राम रिझास्या हे माय राणो जी मेवाडो म्हारो काई करसी । राणो रूससी गाव रखासी, हरि रूस्या कुम्हलास्या हे माय । गोपी चन्दन गगारी माटी, घसि घसि अग लगास्या हे माय । श्री तिलक तुलसी की माल, नित उठि मदिर जास्या हे माय । बाँध घूघरा निरत करा म्हे, कर सूँ ताल बजास्या हे माय । राणो भेज्यो विषरो प्यालो, चरणामृत करि पीस्या हे माय । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर हरि चरणा चित लास्या हे माय ॥१८४॥ पद सं० २० की द्वितीय पंक्ति के पूर्वाद्ध में निम्नांकित पाठ भेद मिलता है, 'हरि रूठ्या मर जास्या' । इस पाठ मे भी सर्प भेजे जाने की कथा का वर्णन नही मिलता। साथ ही, वैष्णव प्रभाव का विशेष स्पष्ट हो उठना इस पाठ की विशेषता है । २२ मेरे राणा जी मै गोविन्द गुण गाना । राजा रूठे नगरी राखै, हरि रूठ्या कहां जाना । राणा भेज्यो जहर पियाला अमृत कहि पी जाना । डबिया मे काला नाग भेजिया, सालगराम कर जाना । मीराँ बाई प्रेम दिवानी सांवरिया वर पाना ॥१८५॥
११६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव विचारणीय है । सर्प भेजे जाने की कथा का भी वर्णन इस पाठ मे हुआ है । परन्तु यहाँ “नाग” का “सालिगराम” हो जाना ही सिद्ध होता है, जब कि पद स० १९ के अनुसार वही “नाग”, “तुलसी की माला' मे परिवर्तित हो जाता है । “नाग” भज जाने की कथा ही प्रक्षिप्त सिद्ध होती है । २३ राणा जी मै तो गोविन्द का गुण गास्या । चरणामृत को नेम हमारे, नित उठि दरसन जास्या । हरि मदिर मे निरत करास्या, घूघरिया धमकास्या । शनम नाम का जहाज चलास्या, भवसागर तर जास्या । मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर,निरख परख गुण गास्या ॥१८४॥ २४ राणो म्हारो कहाई कर लेसी राज, म्हे तो छोडी कुल की लाज । पगा तो बाध्या घूघरा जी, हाथा बनावा ताल । भो सागर महां रो माहिरो१ जी, हरि चरणा सूं प्यार । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जास्या द्वारिकानाथ ॥१८७॥† उपर्युक्त पद की अन्तिम दो पंक्तियो मे निम्नाकित पाठान्तर मिलता है — ‘भो सागर तुमरो जी ससुराल हरि चरणां पीहर छै जी । मीराँ कहै जास्यां द्वारिका जी बैकुंठश बास ।” उपर्युक्त पद की अन्तिम दोनो पंक्तियो के दोनो पाठ विशेष विचारणीय हे । अन्य पदो से दोनो की तुलना करने पर उनकी प्रक्षिप्तता ही इंगित होती है । १ पीहर ।
संघर्षाभिव्यक्ति ११७ २५ म्हारो मनडो राजी राजा जी। काइ करैसा म्हारो दुरजन पुरजन। काई करैला झूठा पाजी जी। काई करैला म्हांरो राजा राणी। काई करैला मुल्ला काजी जी। राम प्रीतम सूं हिलूमिल खेलूं। परत न छोड़ू बाजी जी । मोराँ के प्रभु प्रात पुरबली। तुम मत जाणो आजी१ जी ॥ १८८॥ सम्पूर्ण पद विशेष विचारणीय है। "मुँल्ला काजी" आदि वर्णन स पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। पद मे प्रथम पक्ति को छोडकर हर जगह "करैला" क्रिया का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है, करेगे। केवल प्रथम पक्ति मे यह 'करैला' 'करैसा' मे परिवर्तित हो गया है। सम्पूर्ण पद की सगति देखते हुए "करैला" होना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। २६ गिरधर म्हारा साचा पति छै, मै गिरधर री दासी हे माय राणो जी म्हासू रूस रह्यो छै, कडा वचन निकासै हे माय। राणो कहै सोरा कन माना म्हे, साध दुवारै नित आसी है माय। मीराँ के प्रभु सेज चढै जब, ठाढी करै खवासी हे माय ॥१८६॥ पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। २७ गिरधर म्हारे मन भाया मोरी माय, राणो जी म्हांरे दाय न आवै। राणा जी म्हासे रूस रहा छै, कूडा बचन सुनाया। १ सम्भवतः इसका भावार्थ "इस समय" हो सकता है।
११८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह गुरू कृपा से सत पधार्या, सता स्याम मिलाया । मीराँ की प्रभु आस पुजोई१, गिरिधर सगा आया ॥१९०॥ पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। अन्तिम पंक्ति से आनन्द ही लक्षित होता है। २८ राणे जी हट माडचो२ म्हासू,गिरधर प्रीतम प्यारा जी । वो तो मद माया रो आधो, थे मत हो ज्यो न्यारा जी । साची प्रीत लगी है तुम सूं झक मारो ससारा जी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर थाने,भक्त पियारा जी । ॥१९१॥† २९ राणा जी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो हो, राणा जी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारे । व्यापक होय रह्यो घट घट मे, है सब ही से न्यारे । सबको सरजण हारो, अन्तर घट की सबही जाणे । आप तो भेज्या विषरो प्याला दे मीराँ ने मारो । कर चरणामृत पी गईं जी, गिरधर संकट टारो । जनम जनम रो पति परमेश्वर राणी जी कोन विचारो । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साचो बसंरी वारो ॥१९२॥† ३० निन्दा म्हारी भलाई करो नै सोने काट न लागै जोग लियो जग जातौ देख्यौ हरि भजवा के काजै । १ परिपूर्ण की, २ बनाया, यहाँ होगा जिद्द की ।
संघर्षाभिव्यक्ति ११६ जो कोई करणी मे चूक पडै तो सतगुरु म्हारा लाजै। धन रे लोक थांरी करणी कीडी रो कुजर बरगायो। अण दीठी अण सामलेरे, वद वद बाद उठायौ। कुल कूँ छाडि कड्बो छाड्यो छाँडी ममता भाई ! और दुनिया को दावो छोड्यो मन मरवै ज्यूँ कहियौ। यो जस मीराँबाई गावै ज्यूँ कहीयौ ज्यौ सहीयौ ॥१९३॥† ३१ तुलसा की माला हिवड लागी जी “मेवाड राणा” राम ताण गुण गास्या। लिख पत्तर राणूं मीराँ नै भेज्या सग साध पिस्तास्यो जी। लिख रे पत्तर मीरा राणा जी नै भेज्या साधूडा सग सुख पास्यां जी। बिसरा पियाला राणा जी भेज्या पिवतां पिवता म्हानै आवै हासी जी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर हरि चरणां मे चितल्यास्या जी ॥१९४॥† पदाभिव्यक्ति का प्रथम अर्द्धांश अन्य पुरुष मे है, जब कि द्वितीय अर्द्धांश प्रथम पुरुष मे है। अत पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। मीराँ और राणा द्वारा एक दूसरे को पत्र भेजे जाने की अभिव्यक्ति और भी पदो मे मिलती है। ३२ मेड़तिया रा कागद आया, बाई मीराँ ने जा खीज्यो१ जी। भोहूत२ भात से लिख्या ओलमा, कुल कै दाग३ मति दीज्यो जी। साधा को सग परो निवारो, वेद साख४ सुण लीज्यो जी। मीराँ प्रभु को संग छाड्यो, पति आज्ञा मे रीज्यो जी ॥१९५॥† १ नाराज होना, २ बहुत, ३.कलक, ४ साक्षी।
१२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पद विशेष महत्वपूर्ण है। यह एक ही पद ऐसा है जिसमे “मेडतिया रा कागद” (मेडतिया के यहाँ से आया हुआ पत्र) का वर्णन है। इस पद के आधार पर मीराँ का सधवा होना ही प्रामाणित हो जाता है। पद का किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कहा जाना भी अभिव्यक्ति से ही सुस्पष्ट हो उठता है। अत ऐसे पदो की प्रामाणिकता की विशेष विवेचना आवश्यक है। ३३ हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो वैरागी धन¹ रो क्या करू। जहर का प्याला राणा जी भेज्या कोई द्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत मीराँ पी गई कोई आप जाणो रघुनाथ। साप पिटारा राणा जी ने भेज्या कोई द्योने मीराँ ने जाय। कर खग वालो पहिरयो कोई आप जानो दीनानाथ। राणा जी दासी भेज्या कोई जावो ने मीराँ पास। मर गया होय तो जला दीज्यो नातर नदी मे बहाय। हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो, वैरागी धन रो क्या करू। ।।१९६।। राणा जी द्वारा मीराँ के पास दासी भेजे जाने की सर्वथा नवीन कथा ही इस पद की विशेषता है। कथानक की प्रामाणिकता सर्वथा संदिग्ध होते हुए भी राणा और मीराँ के पारस्परिक सबध के प्रति चली आती परम्परागत भावना सुस्पष्ट हो जाती है। पद की शैली वर्णनात्मक ह। अस्तु, यह पद तत्कालीन भावनाओ का प्रतिबिम्ब ही कहा जा सकता है। ३४ राणौ म्हाने ऐसी कही महाराज। भक्तन² होय मीराँ जगत लजायो,कीन्हों सारो साज। १ स्त्री। २ विशेष उत्सव के अवसरो पर नाचने गाने वाली एक निम्नजाति विशेष की स्त्री जो 'भगतन' के अर्थ मे रूढ़ि वाचक हो गया है।
संघर्षाभिव्यक्ति १२१ जावो ने मीराँ म्हाने मुख न दिखावो, म्हाने आवै थारी लाज । लाजै मीराँ पीहर सासरो, और लाजै म्हारो साज¹। गोपी चन्दन तुलसी की माला, भीख मागत्यारो² साज । धन मीराँ धनि मेडतो, धनि राठोडारो राज । मीराँ के प्रभु अविनासी, चलि आयो व्रजराज ।।१९७।।† ३५ राणा जी हो जाति रो कारण म्हाँरै को नही लागो म्हांरो हरि भगतां सूं हेत। बिदुर कुला घरि जनमिया ज्या कै पावणा हुवा गोपाल वदि छुडाई बसुदेव की कस कियो खो काल। पाचू पाडू छठी द्रोपदी ज्या की न्यारी न्यारी जात, सहस अठ्यासी मुनि आविया जाकी पण राखी रघुनाथ । वन मे होती स्योरी भीलणी ज्यांहका ओरग्य³ ठाकुर बोर । ऊच नीच हरि ना गिणै ऐसी म्हारा हरि भगतां की कोर । येक बेल दोय तूंबड़ा ज्याहूं की छै न्यारी न्यारी जात, एक तूंबो जतर⁴ चढ़ै, दूजो हरि भगता कै हाथ । सख समदा५ नीपजै ज्याहू की न्यारी न्यारी जात, एक सख सेवा६ चढै दूजौ भो पडता के हाथ । एक माटी दोय कलस है ज्याहूं की न्यारी न्यारी जात, एक कलस सेवा चढै दूजो कलाला रै हाथ । कलक कटोरे विष धोलियो दियो मीराँ के हाथ, हरि चरणोदक करि पी लियो हरि जी भयो सुनाथ । सब मिलि मत उपाइयौ मीराँ नै विष चौहा कहियौ, । सुण्यो मानै नाहि नीच लग्यो हूठ. योह। १ विभव, ठाठ, २ माँगने वालो का, ३ खाया, ४ वाद्य-यन्त्र ५ समुद्र, ६ पूजा ।
१२२ मीरॉँ-वृहद्-पद-संग्रह नगर बसै बामण बाणिया भीतर शुद्र पवार, मुहुँ मोडे मुलबया हसे समझे नही गवार। गढ चितौडा न रहा नही रहणा को जोग, बसस्या सूडी द्वारिका जहाँ हरि भगता का भोग। पंरख लेत परचो भयो मन उपज्यो विस्वास, सिर पर सिरजन हार रहै पूगी म्हा मन की आस। कुम्भ श्याम के देवरे मिली है राणौ राणूँ, मीराँ ने गिरधर मिलिया कोई पूरबली पहिचाण। ।।१९८।।† पदाभिव्यक्ति के प्रथम और द्वितीय अर्द्धांशो मे कोई सगति नही बैठती प्रतीत होती। मीराँ द्वारा किए गए गृहत्याग का कारण भी अति स्पष्ट हो उठता है। कुम्भश्याम के मदिर के साथ मीराँ के जीवन की किसी घटना का सम्पर्क भी उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट हो उठता है। ऐसी अभिव्यक्ति इस पद की नवीनता है। इस पद की शैली भी वर्णनात्मक ही है। ३६ प्रभु जी अरज बन्दी री सुण हो। मो निगुणी ए सुगुण साहब अवगुण धारी ए गुण हो। राणा जी विष को प्यालो भेज्यो मो चरणामृत को पण हो। म्हारी पत परमेश्वर राखत, मारण वालो कुण हो। प्रभु जी उचले¹ मदिर (सीतारामजी) बिराजे दरसण रोयण हो मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मै जाणु प्रभु जी कुण हो। ।।१९९।। पदाभिव्यक्ति में संगति नही है। १ ऊँचे।
संघर्षाभिव्यक्ति १२३ मिश्रित भाषा में प्राप्त पद १ म्हारे सिर पर सालिगराम, राणाजी म्हारे काईं करसी। मीराँ सूं राणा ने कही थे, सुण मीराँ मोरी बात। साधो की सगत छोड हो रे, सखिया सब सकुचात। मीराँ ने सुन यो कही रे, सुण राणाजी बात। साध तो भाई बाप हमारे, सखियाँ क्यूँ घबरात। जहर का प्याला भेजिया रे, दीजो मीराँ हाथ। अमृत कर के पी गई रे, भली करें दीनानाथ। मीराँ प्याला पी लिया रे, बोली दोऊ कर जोड। तै तो मारण की करी रे, मेरी राखणहारो और। आधे जोहड कीच है रे, आधे जोहड हौंज। आधे मीराँ एकली रे, आधे राणा की फौज। काम क्रोध को डाल केरे सील लिए हथियार। जीती मीराँ एकली रे, हारी राणा की धार। काचागेरी का चौतरा रे, बैठे साध पचास। जिनमे मीराँ ऐसी दमके रे, लख तारो मे परकास। टाडा जब वे लादिया रे, बेगी दीन्हा जाण। कुल की तारण अस्तरी रे, चली हे पुष्कर न्हाण ॥२००॥† अधिकांश संघर्ष द्योतक पदो की तरह यह पद भी वर्णन और कथनोपकथन दोनो ही शैलियो मे है। “काचगिरी का चोतरा” का वर्णन इस पद के महत्व को विशेष रुपसे बढा देता है। “पुष्कर न्हाण” की अभिव्यक्ति प्राय. अन्य पदो मे भी मिलती है। २ राणा जी थे जहर दियो म्हैं जाणी। जैसे कंचन दहत अगिन भें, निकसत बारह बाणी।
१२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह लोक लाज कुल काण¹ जगत की, दइ बदाय जस पाणी । अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौराणी । तरकस तीर लाग्यो मेरे हिय रे, गरक गयो सनकाणी । सब संतन पर तन मन बारो, चरण कवल लपटाणी । मीराँ के प्रभु राखि लईं है, दासी अपनी जाणी ॥२०१॥ पाठान्तर १, राणा जी जहर दियो हम जानी । जानबूझ चरणामृत सुन के पियो, नही बौराणी । जिन हरी मेरी नाव निवेरियो, छान्यो दूध अरु पानी । कचन असत कसौटी जैसे, तन रह्यो बारह बानी । राणा कोट करु न्योछावर, मै हरि हाथ बिकानी । मीराँ प्रभु गिरिधर नागर, के चरण कवल लिपटानी । पाठान्तर २, राणा जी जहर दियो हम जानी । अपने कुल को परदा कर ले, मै अबला बौराणी । राणा जी परधान पठायो, सुन जो जी थे राणी । जो साधन को सग निबरो, करा तुमे पटराणी । हथलेवी राणा सग जुड़ियो, गिरधर घर पटराणी । क्रोड भूप साधन पर वारुं, जिन की सरण रहाणी । मीराँ को पति एक रमैया, चरण कवल लपटानी । पाठान्तर ३, जहर दियो म्हे जाणी । राणा जी थे तो अपने कुल को परदो कर ले मै अबला बौराणी ।
१ मर्यादा ।
१२६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह साधू रो सग परो निवररो, थाने करा पटराणी । कोट भूप वारा रतन पर, जिनके हाथ बिकाणी । हथलेवा मै थास्यूँ जोडयो, गिरधररी पटराणी । पीहर म्हारो देस मेडतो, छाडी कुल की काणी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल लिपटानी । उपर्युक्त दोनो पाठान्तर एक दूसरे के गेय रूपान्तर मात्र प्रतीत होते है । सभी पाठो से व्यक्त होती भावना "अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौराणी" भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष विचारणीय है । दूसरी विचारणीय अभिव्यक्ति है "हथलेवी राणा सग जुहियो, मै गिरधर पटराणी" जो सभी पाठो मे मिलती है । यह पद और उसके सभी पाठान्तर भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष रूप से विचारणीय है । ३ म्हारा नटनागर गोपाल लाल बिन, कारज कौन सुधारे । घूम रह्यो दुरयोधन राजा, जैसे गज मतवारो । सिह होय केर हस्ती¹ मारे, बड़ो भरोसो थारो । मीराँ ने राणा जी बरजै, मतना जनम बिडारे² । थे सगत साध की सीख्या, मत आयो महल हमारे । म्हे सगत साध की सीख्या, थांरे कछ्यु³ न सारे⁴ । तन मे रीस भई राणा के, उठ खडग ले मारे । प्याला मे विष घोल राणा जी, मन मे कपट बिचारे । अमृत कर के मीराँ पी गई, जहर सावरों झारे । जब जब पीड परी भक्तन पर, आप ही कृष्ण पधारे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि भक्ताने न्यारे ॥२०२॥† १ हाथी, २ व्यर्थ खोना, ३ जरा भी, ४ सहारे ।
संघ गी अभिव्यक्ति १२७ “मीराँ ने ˙ ˙ ˙ न सारे” जैसी तीन पक्तियाँ कथोपकथन शैली मे लिखी गयी है । शेष सम्पूर्ण पद वर्णनात्मक शैली मे है । अन्तिम पक्ति अर्थ हीन है । ४ राणो म्हांरो काई करिहै, मीराँ छोड दई कुल लाज । विष को प्यालो राणाजी ने भेज्यो, मीराँ मारन काज । हँस के मीरा पाय गई है, प्रभु परसाद पर राग । डब्बो खोल मीराँ जब देख्यो, हैं गये सालिगराम । जै जै धुनि सब सत सभा भई, कृपा करि घनश्याम । सजि सिगार पग बाँध घूँघरू, दोऊ पर देती ताल । ठाकुर आगे नृत्य करत ही, गावत श्री गोपाल । साध हमारे हम साधन के, साध हमारे जीवन । साधुन मीराँ मिलि जा रही है, जिमि माखन मे घीव ॥२०३॥† प्रथम पक्ति के अतिरिक्त जो कथनोपकथन की शैली मे है, सम्पूर्ण पद वर्णनात्मक शैली मे है । ५ मेरो मन हरिसूँ जोर्यो, हरि सूं जोर्यो सकल सूं तोर्यो । मेरी प्रीति निरन्तर हरि सूं, ज्यूँ खेलत बाजीगर गोर्यो । जब मै चली साध के दरसण कूँ, तब राणा मारण को दोर्यो । जहर देन की घात विचारी, निरमल जल मे ले विष घोर्यो । जब चरणोदक सुण्यो सखणा१, राम भरोसे मुखमे ढोर्यो । नाचन लागी तब घूंघट कैसो, लोक लाज तिणका ज्यूँ तोर्यो । नेक बदी हूँ सिर पर धारी, मन हस्ती अंकुस दे मार्यो । प्रकट निसान बजाय चली मै, राणा राव सकल जग जोर्यो । ॥२०४॥† १ कानो से ।