मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह साधू रो सग परो निवररो, थाने करा पटराणी । कोट भूप वारा रतन पर, जिनके हाथ बिकाणी । हथलेवा मै थास्यूँ जोडयो, गिरधररी पटराणी । पीहर म्हारो देस मेडतो, छाडी कुल की काणी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल लिपटानी । उपर्युक्त दोनो पाठान्तर एक दूसरे के गेय रूपान्तर मात्र प्रतीत होते है । सभी पाठो से व्यक्त होती भावना "अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौराणी" भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष विचारणीय है । दूसरी विचारणीय अभिव्यक्ति है "हथलेवी राणा सग जुहियो, मै गिरधर पटराणी" जो सभी पाठो मे मिलती है । यह पद और उसके सभी पाठान्तर भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष रूप से विचारणीय है । ३ म्हारा नटनागर गोपाल लाल बिन, कारज कौन सुधारे । घूम रह्यो दुरयोधन राजा, जैसे गज मतवारो । सिह होय केर हस्ती¹ मारे, बड़ो भरोसो थारो । मीराँ ने राणा जी बरजै, मतना जनम बिडारे² । थे सगत साध की सीख्या, मत आयो महल हमारे । म्हे सगत साध की सीख्या, थांरे कछ्यु³ न सारे⁴ । तन मे रीस भई राणा के, उठ खडग ले मारे । प्याला मे विष घोल राणा जी, मन मे कपट बिचारे । अमृत कर के मीराँ पी गई, जहर सावरों झारे । जब जब पीड परी भक्तन पर, आप ही कृष्ण पधारे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि भक्ताने न्यारे ॥२०२॥† १ हाथी, २ व्यर्थ खोना, ३ जरा भी, ४ सहारे ।