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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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११६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव विचारणीय है । सर्प भेजे जाने की कथा का भी वर्णन इस पाठ मे हुआ है । परन्तु यहाँ “नाग” का “सालिगराम” हो जाना ही सिद्ध होता है, जब कि पद स० १९ के अनुसार वही “नाग”, “तुलसी की माला' मे परिवर्तित हो जाता है । “नाग” भज जाने की कथा ही प्रक्षिप्त सिद्ध होती है । २३ राणा जी मै तो गोविन्द का गुण गास्या । चरणामृत को नेम हमारे, नित उठि दरसन जास्या । हरि मदिर मे निरत करास्या, घूघरिया धमकास्या । शनम नाम का जहाज चलास्या, भवसागर तर जास्या । मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर,निरख परख गुण गास्या ॥१८४॥ २४ राणो म्हारो कहाई कर लेसी राज, म्हे तो छोडी कुल की लाज । पगा तो बाध्या घूघरा जी, हाथा बनावा ताल । भो सागर महां रो माहिरो१ जी, हरि चरणा सूं प्यार । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जास्या द्वारिकानाथ ॥१८७॥† उपर्युक्त पद की अन्तिम दो पंक्तियो मे निम्नाकित पाठान्तर मिलता है — ‘भो सागर तुमरो जी ससुराल हरि चरणां पीहर छै जी । मीराँ कहै जास्यां द्वारिका जी बैकुंठश बास ।” उपर्युक्त पद की अन्तिम दोनो पंक्तियो के दोनो पाठ विशेष विचारणीय हे । अन्य पदो से दोनो की तुलना करने पर उनकी प्रक्षिप्तता ही इंगित होती है । १ पीहर ।

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