मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह पद की भाषा प्रधानत. ब्रजभाषा है, यद्यपि दो एक राजस्थानी शब्दो का प्रयोग भी हुआ है। पद के बीच मे ही “मै जन” का प्रयोग अन्य पदो से सर्वथा पृथक पडता है। ३ कैसे जिऊ री माई, हरि बिन कैसे जिऊ री। उदक दादुर पीनवत है, जल से ही उपजाई। पल एक जल कूँ मीन बिसरे, तलफत मर जाई। पिया बिन पीली भई रे, ज्यो काठ घुन खाय। औषध भूल न सचरै रे, बाला, बैद फिरि जाय। उदासी होय बन बन फिरू, रे बिथा तन छाई। दासी मीराँ लाल गिरधर, मिल्या है सुखदाई ॥२९४॥ सम्पूर्ण पद से वियोग ही लक्षित होता है, तथापि अतिम पक्ति से मिलन की ही अभिव्यक्ति होती है। ४ मै हरि बिन क्यो जिऊ री माय। पिय कारण बौरी भयी, जस काठ ही घुन खाय। औषद भूल न सचरे, मोहि लागो बौराय। कमठ दादुर बसत जल मह, जल ही ते उपजाय। मीन जल के बिछुरे तन, तलफि के मर जाय। पिय ढूँढन बन बन गई, कहु मुरली धुन पाय। मीराँ के प्रभु लाल गिरधर, मिल गए सुखदाय ॥२९५॥ इस पद की तुलना मे प्रथम पद से पूर्वापर सगति अधिक है। ५ प्रभु बिन ना सरै माई। मेरा प्राण निकस्या जात, हरि बिन ना सरै माई। कमठ दादुर बसत जल में, जल से उपजाई।