मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कोई करत है हासी, कोई साची। ताल मृदग बाजै मन्दिर मे, हौ हरि आगे नाची। मीराँ दासी गिरधर जू की, जनम जनम की जाची ॥२९८॥ पदाभिव्यक्ति से वैष्णव परम्परा का प्रभाव ही सुस्पष्ट हो उठता है। ८ माई मे तो गिरधर के रग राची। माई हू स्याम केृ रग राची। मेरे बीच परो मत कोऊ, बात चहु दिसी माची। जागत रैनि रहै उर ऊपर, ज्यूँ कंचन मणि खाची। होय रही सब जग मे जाहर, फेरि प्रगट होय नाची। मिलि निसान बजाय कृष्ण सूं, ज्यो कछु कहो सो साची। जन मीराँ गिरधर की प्यारी, मोहबत है नाहि काची ॥२९९॥† उपर्युक्त पद की भाषा और अभिव्यक्ति दोनो ही विचारणीय है। अभिव्यक्ति मे वह सरस गाम्भीर्य नही जो मीराँ के पदो की विशेषता है। पद की तृतीय पक्ति अर्थ-हीन है। 'जन मीराँ' का प्रयोग पद की प्रामाणिकता मे सदेह की पुष्टि करता है। ९ माई मे तो गिरधर रंग राची। मेरे बीच पडो मत कोई बात चहू दिस माची। जो मन सार मेरे मन उपज्यो, ज्यो कंचन मणि साँचो। और सब हीरो हो सिर ऊपर, मै परगट होय नाची। मुलक¹ निसान बजावा कृष्ण के, जे कोई कहो सोई सांची। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मो मति नही कांची ॥३००॥† १ हँस कर, खुश होकर ।