मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८७ यह पद उपर्युक्त पद (स० ९) का ही गेय रूपान्तर मात्र प्रतीत होता है। पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर संगति का अभाव है, इतना ही नही पद की अन्य पंक्तिया अर्थहीन भी सिद्ध होती हैं। १० राणाजी मै तो सावरे रंग राची। साजि सिगार बाध पग घूघरु, लोक लाज तजि नाची। गई कुमति लई साधु की संगति, भगत रूप भई साँची। गाय गाय हरि के गुण निसदिन, काल व्याल सो बाची। उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची। मीराँ श्री गिरधरलाल सूं भगति रसीली जाची॥३०१॥† भाव और भाषा दोनो ही के विचार से पद अपने मे पूर्ण है “मीराँ श्री गिरधरलाल” जैसी अभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। ऐसा प्रयोग और भी कुछ पदो मे मिलता है, परन्तु ऐसे पदो की प्रामाणिकता विशष संदिग्ध है। ११ मै तो रंगराती गुँसाइयां, मै तेरे रंगराती। औरो के पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजती पाती। मेरे पिया मेरे निकट बसत है, कह ना सकूँ सरमाती। सुवा सुवा चोला पहर सखी, मै झरमट खेलन जाती। खेलत खेलत मिले सांवरे, खोल मिली हिय गाती। मदवा मी पी सब मदमाती, मै विन पिया मदमाती। प्रेम मदी का मै इषचाष्या, मै छकी रहू दिन राती। वह दूल्हा मोहि व्याहन आवै, आप कृश्न ब्रजवासी। मीराँ के गिरधर मन मान्यो, मै स्याम सुन्दर की दासी ॥३०२॥ इस पद पर सतमत का गहरा प्रभाव सुस्पष्ट है।