मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ कैसे आवों हो नन्दनलाल तेरी ब्रजनगरी, गोकुल नगरी। इत मथुरा उत गोकुल नगरी, बीच बहे जमुना गहरी। पाँव धर्यौँ मेरी पायल भीजै, कूदि परौ वहि जाओ सारी। मै दधि बेचन जात वृन्दावन, मारग मे मोहन झगरी। बरज यशोदा अपने लाल को, छीन लई मोरी नथली। रहु रहु ग्वालिन झूठ न बोलो, कान अकेलो तुम सगरी। मेरो कन्हैया पाँच बरस कौ, तुम ग्वालन अलमस्त भई। जाय पुकारो हो कंस राजा से, न्याय नही तेरी गोकुल नगरी। वृन्दाबन की कुज गलिन मे, बाँह पकर राधे झगरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साधु संग करि हम सुधरी ॥५०४॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर संबंध और संगति का अभाव है। तृतीय पंक्ति “पाँव धर्यौँ”· · जाओं सारी” सर्वथा अर्थहीन है। “झूठ न बोलो,” “तेरी,” “तुम” आदि शब्दो से पद की भाषा पर खड़ी बोली का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है। “अलमस्त” शब्द का प्रयोग उर्दू के प्रभाव को भी इंगित करता ह। इसी प्रकार का एक पद मीराँ के नाम पर प्रचलित गुजराती पदों मे भी प्राप्त है। ५ हमरो प्रणाम बाँके बिहारी को। मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे, कुडल अलकाकारी को। अधर मधुर पर बसी बाजे, रीझ रीझावै राधा प्यारी को। यह छवि देख मगन भई मीराँ, मोहन गिरिधारी को ॥५०५॥† अन्तिम पंक्ति की शैली सर्वथा नूतन है। ६ झट द्यो मेरो चीर रे मोरारी रे, झट द्यो मेरो चीर। मेरो चीर कदम चढ बैठो, मै जल बीच उघाडी।