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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

२८२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ कैसे आवों हो नन्दनलाल तेरी ब्रजनगरी, गोकुल नगरी। इत मथुरा उत गोकुल नगरी, बीच बहे जमुना गहरी। पाँव धर्यौँ मेरी पायल भीजै, कूदि परौ वहि जाओ सारी। मै दधि बेचन जात वृन्दावन, मारग मे मोहन झगरी। बरज यशोदा अपने लाल को, छीन लई मोरी नथली। रहु रहु ग्वालिन झूठ न बोलो, कान अकेलो तुम सगरी। मेरो कन्हैया पाँच बरस कौ, तुम ग्वालन अलमस्त भई। जाय पुकारो हो कंस राजा से, न्याय नही तेरी गोकुल नगरी। वृन्दाबन की कुज गलिन मे, बाँह पकर राधे झगरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साधु संग करि हम सुधरी ॥५०४॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर संबंध और संगति का अभाव है। तृतीय पंक्ति “पाँव धर्यौँ”· · जाओं सारी” सर्वथा अर्थहीन है। “झूठ न बोलो,” “तेरी,” “तुम” आदि शब्दो से पद की भाषा पर खड़ी बोली का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है। “अलमस्त” शब्द का प्रयोग उर्दू के प्रभाव को भी इंगित करता ह। इसी प्रकार का एक पद मीराँ के नाम पर प्रचलित गुजराती पदों मे भी प्राप्त है। ५ हमरो प्रणाम बाँके बिहारी को। मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे, कुडल अलकाकारी को। अधर मधुर पर बसी बाजे, रीझ रीझावै राधा प्यारी को। यह छवि देख मगन भई मीराँ, मोहन गिरिधारी को ॥५०५॥† अन्तिम पंक्ति की शैली सर्वथा नूतन है। ६ झट द्यो मेरो चीर रे मोरारी रे, झट द्यो मेरो चीर। मेरो चीर कदम चढ बैठो, मै जल बीच उघाडी।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८३ हाँरे वा'ला मै जलबीच उघाडी । उभी राधा अरज करत है, दो चीरदो ओ गिरधारी । प्रभु मैं तेरे पाय परूँगी । जो राधा तेरो चीर चहावत हो, जल से हो जा न्यारी । हाँ रे, वा'ला जल से हो जा न्यारी । जल से न्यारी कान्हा कबुए न होव्गी, तुम हो पुरुष हम नारी । लाज मोकूँ आवत भारी । तुम तो कुँवर नन्दलाल कहावो, मैं बृषभानु दुलारी । हाँ रे, वा'ला मे वृषभानु दुलारी । मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, तुम जीते हम हारी । चरण जाऊँ बलिहारी ॥ ५०६ ॥† उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली का और शैली पर गुजराती भाषा मे प्राप्त पदों की शैली का प्रभाव सुस्पष्ट है । गुजराती में प्राप्त पद १ वारो यशोदा तारा दानी ने, आली गारा आल करे छे । लाडकवायो बाई लामज तमने, ते थी घनो राधा राणी ने । जल यमुना जतॉ मारगे पालव, ग्रहियो मारो तानी न । एक बार साख्युं बीजी बार साख्युं शरम तमारी घनी आनी ने । बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित मानी ने ॥५०७॥† २ बोले झीणा मोर, राधे तारा डुँगरिया पर बोलेझीणा मोर । ए मौर ही बोले ब पैया ही बोले, कोयल करे घन शोर । ······भली बीजली चमके, बादल हुआ घन घोर । झरमर झरमर मेहुलो बरसे, भीजे मारा सालुडानी कोर । बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण,प्रभुजी म्हाँरा चितडानो चोर॥५०८॥†

२८४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ३ काहानो माग्यो दे,धुतारो माग्यो दे,वर तो राधानो,मने कहानो माग्यो दे। वृन्दारे वनमाँ जेदी रास रम्याँ, ता सोल से गोपी माँ घेलो कहान। हाथी ने घोडा बाई माल खजाँना, हैया केरो हार ले मान। तल भर जव भर वछो नव कीधो, जवे तोली ने पाछो ले। बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल मे चित दे ॥५०९॥† बाँसुरी वर्णन ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ कान्हा रसिया वृन्दाबन बासी। जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे,मुरली बजावे मृदुलासी। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, श्रवण कुडल फलासी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बिना मोल की दासी ॥५१०॥ पाठान्तर १, म्हारी बालपना की परीति थे निभाज्यो रैना। जमुना के नीराँ तीराँ धेनु चरावै, कुडल झलकत काना। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हर नौ माह रो धाना। यह पद उपर्युक्त पद का गेय रुपान्तर मात्र प्रतीत होता है, क्योकि प्रथम पंक्ति के सिवा सम्पूर्ण पद की भाव और भाषा भी लगभग एक ही है। विभिन्न स्थानो पर प्रचलित होने के कारण स्थानीय बोलियो का प्रभाव पदो से स्पष्ट होता है। पद की भाषा पर राजस्थानी प्रभाव स्पष्ट है। इस रूपान्तर की अभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। इसी पद से साम्य रखता एक और भी निम्नांकित पद प्राप्त है -- या मोहँन के मै रूप लुभानी। सुन्दर वदन कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मद मुसकानी।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८५ जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावै, बसी मे गावै मीटी बानी । तन मन धन गिरिधर पर बारूँ, चरण कवल माही लपटानी । २ आजु मै देख्यो गिरधारी । सुन्दर बदन मदन की शोभा, चितवन अनियारी । बजावत वशी कुज मे । गावत ताल तरग रंग ध्वनि, नाञ्चत ग्वाल गन मे । माधुरी मूरति वह प्यारी । बसि रहै निस दिन हिरदै बिच, टरै नही टारी । वाही पर तन मन हो वारी । वह मूरति मोहनि निहारत, लोक लाज डारी । तुलसी बन कुंजन सचारी । गिरिधर नवल नटनागर मीराँ बलिहारी ॥ ५११ ॥ ३ प्यारी मै ऐसे देखे श्याम । बाँसुरी बजावत गावत कल्याण । कब की ठाढी भैयाँ, सुध बुध भूल गैयाँ । छौने जैसे जादू डारा, भूले मोसे काम । जब धुन कान पैयाँ, देह की ना सुध सैयाँ । तन मन हर लीन्हो, विरहो वाले कान्ह । मीराँ बहि प्रेम पाया, गिरिधर लाल ध्याया । देह सो विदेह भैयाँ, लागो पग ध्यान ॥५१२॥† उपर्युक्त पद मे तीन विभिन्न बोलियो का सम्मिश्रण विचारणीय है । पद की भाषा प्रमुखत ब्रज है तथापि क्रियापदो पर पजाबी प्रभाव स्पष्ट है । “मै ऐसे देखे श्याम”, “पाया” आदि प्रयोगो से आधुनिक प्रभाव भी स्पष्ट हो उठता है । निम्नाकित एक और पद ऐसा मिलता है जिसकी प्रथम पक्ति उपर्युक्त पद की प्रथम पक्ति का पाठान्तर प्रतीत होती है, परन्तु शेष पद सर्वथा विभिन्न पडता है ।

२८६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ कही ऐसे देखे री घनश्याम । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल झलकन काना । साँवरी सूरत पर तिलक बिराजे, तिस मे लगे रहे मेरे प्राना । बरसाने सो चली गुजरिया, नन्दग्राम को जाना । आगे केशव धेनु चरावे, लगे प्रेम के बाना । सागर सूखि कमल मुरझाना, हंसा किया पयाना । भौरे रह गये प्रीति के धोखे, फेर मिलन को जाना ॥५१३॥† इस पद मे कही से भी यह स्पष्ट नही होता कि यह पद किस के द्वारा बनाया गया है, तथापि तथाकथित मीराँ क पदसंग्रहो मे प्राप्त हैं। पदाभिव्यक्ति स्पष्ट ही अर्थहीन है। ५ बाँके साँवरियाँ ने घेरि मोहि आन के। जो गई जमुना जल भरन, मारग रोक्यो मेरो आन के । वृन्दाबन की कुज गलिन मे मुरली बजावे, आन तान के । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रीत पुरातन जान के ॥५१४॥† ६ भई हो बावरी सुन के बाँसुरी । श्रवण सुनत गोरी सुध बुध बिसरी, लगी रहत तामे मनकी बाँसुरी । नेम धरम कोन कीनी मुरलिया, कौन तिहारे पासुरी । मीराँ के प्रभु वश कर लीन्हे, सप्त ताननि की फाँसुरी॥५१५॥† पद की तृतीय पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही होता । ७ मुरलिया बाजे जमुना तीर । मुरलि सुनत मेरो मन हरि लीन्हों, चीत धरत नही धीर । कारो कन्हैया, कारी कामरिया, कारो जमुना को नीर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पै सीर ॥५१६॥†

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८७ ८ मोरे अगना मे मुरली बजाय गयो रे । छोटे छोटे चरण, बडे बडे नयना, वृन्दाबन की कुज गलिन मे, मारि गयो सयना ' मेरी आली, मेरी आली कहो कित जाऊँ, मुरली मे गावै लै लै मेरो नाम । ऊँची नीची घाटी, मोसे चढऊँ न जाय, मुरली की धुनि सुनि, मोसे रहऊँ न जाय । कित गई गैया, कित गए ग्वाल, कित गये बसी बजावन हारा । घर आई गैया, घर आये ग्वाल, अजहूँ न आये मेरे मदन गोपाल । मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल, पाये.है दर्शन भई निहाल । ॥५१७॥† उपर्युक्त पद मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। पद स० ३ और उपर्युक्त दोनो पदो मे 'मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर' न होकर "मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल" का ही प्रयोग हुआ है, जो विचारणीय है । ९ कवन गुमान भरी बसी, तू कवन गुमान भरी । अपने तन पै छेद परेचे, बाला तूं बिछरी । जाँत पाँत सब तेरो मै जाणूँ, तू बन की लकरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राधा से क्यूँ झगरी ॥५१८॥† पद की दूसरी पक्ति का द्वितीयाश “बाला तू बिछरी” अर्थहीन प्रतीत होता है। ऐसा ही एक पद सूरदास का भी प्राप्त है .- बाँसुरी तू कवन गुमान भरी । सोने की नाही, रूपे की नाही, नाही रतन जरी । जात सिफत तेरी सब कोई जानै, मधुवन की लकरी ।

२८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह क्या री भयो जब हरि मुख लागी, बाजत विरह भरी । सूरदास प्रभु अब क्या करिये, अधरन लागत री । ( 'बृहद्राग रत्नाकर' पद १५०, पृष्ठ ४८ ) उपर्युक्त पदो मे भाव और भाषा देखते यही अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि सूरदास का ही पद मीराँ के नाम पर भी चल पडा हो । १० राधा प्यारी दे डारो जू बसी हमारी । ये बसी मे मेरा प्राण बसत है, वो बसी गई चोरी । ना सोने की बसी, ना रूपे की, हरे हरे बाँस की पोरी । घडी एक मुख मे,घडी एक कर मे,घडी एक अधर धरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर चरण कमल पर बरी ॥५१९॥† पाठान्तर १, श्री राधे रानी, दे डारो बंसी मोरी । जा बसी मै मेरो प्राण बसत है, सो बसी गई चोरी । काहे से गाऊँ, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरी । मुख से गाओ कान्हा,हाथो से बजाओ,लकुटी से लाओ गैया घेरी । हा हा करत तेरे पैया परत हूँ, तरस खाओ प्यारी मोरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बसी लेकर छोडी । उपर्युक्त पाठान्तर में पहले पद से कुछ अधिक पक्तियाँ है । साथ ही इस पाठान्तर की भाषा के क्रिया पदो पर आधुनिक प्रभाव विशेष विचारणीय है । भाव और भाषा साम्य रखता हुआ एक ऐसा ही पद 'चन्द्र सखी' के नाम पर भी प्रचलित है -- श्री राधे रानी, दे डारो ना बाँसुरी मोरी । जा बंसी मे मेरो प्राण बसत है, सो बंसी गई चोरी ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८६ सोने की नाही कान्हा, रूपे की नाही, हरे बाँस की पोरी । काहे से गाऊँ राधे, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरी । मुख से गाओ प्यारे, ताल से बजावो, लकुटिया से लाओ गैया घेरी चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, हरि चरणन की चेरी । ११ चालो मन गंगा जमुना तीर । - गंगा जमुना निरमल पाणी, सीतल होत सरीर । बसी बजावत गावत कान्हा, सग लियो बलबीर । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल झलकत हीर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पै सीर ॥५२०॥ उपर्युक्त पद मे कुछ पक्तियाँ निम्नांकित रूप मे भी प्राप्त है - द्वितीय पंक्ति :- “या बसी मे मेरो प्राण बसत है, वो बसी लेई गई चेरी ।” चतुर्थ पंक्ति मे “घड़ी” शब्द के बदले 'घटी” का भी प्रयोग मिलता है । १२ बसीवारे हो कान्हा मोरी रे गागरी उतार । गगरी उतार मेरो तिलक सभार । यमुना के नीरे तीरे बरसीलो मेह, छोटे से कन्हैया जी सू लागो म्हाँरो नेह । वृन्दाबन मे गऊएँ चरावे, तोर लियो गरवा को हार । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तोरे गई बलिहार ॥५२१॥† पदाभिव्यक्ति मे संगति नही है । उपर्युक्त पद की शैली का चन्द्रसखी के पदो की शैली से बहुत साम्य है । १६

२६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १३ तो सो लाग्यो नेहरा, प्यारे नागर नंद कुमार । मुरली तेरी मन हर्यो, विसर्यो घर व्यवहार । जब ते श्रवननि धुनि परी, घर आगण न सुहावै । पारधि ज्यूँ चूकै नही, मृगी बेधि दई आय । पानी पीर न जानई ज्यों, मीन तडफि मरि जाय । रसिक मधुप के मरण को, नहि समझत कमल सुझाव । दीपक को जो दया नही, समझत उडि उडि मरत पतग । मीराँ प्रभु गिरिधर मिले, जैसे पानी मिलि गयो रंग ॥५२२॥† उपर्युक्त पद की प्रथम पंक्ति का निम्नांकित पाठान्तर प्राप्त है - “तू नागर नन्दकुमार, तों सो लाग्यो नेहरा ।” १४ गाव राग कल्याण, मोहन गावे राग कल्याण । आप गावे ने आप बजावे, मोरली सुँ मिलावे तान । मोर पछी सिर मुकुट-बिराजे, कुण्डल झलके कान । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, गोपियें तजियो ध्यान । ॥५२३॥† १५ गौड़ी तो अब मिट गई, जब अस्त भयो है भाण । रात घटिका हो गई जब, प्रकट्यो राग कल्याण । कल्याण कल्याण सब को कहै, मै क्या कहूँ कल्याण । जा घेर सेवा श्याम की, ता घेर सदा कल्याण । अगो अंग की उलट भयो, जब प्रकट्यो राग कल्याण । कल्याण राग सो महाबली, सब राग को राखत मान । सिंघल देश की पद्मिनी, जपती राग कल्याण ॥५२४॥†

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २९१ भाषा मे अर्थ-सगति नही है। उपर्युक्त पद मीराँ-विरचित है ऐसा भी कोई आभास पदाभिव्यक्ति से नही मिलता। पद स० ३, १४ और १५ इन तीनो ही पद मे राग कल्याण की व्युत्पत्ति का वर्णन या प्रशसा है।* पद स० ३ की भाषा पजाबी से प्रभावित है। पद स० २४ की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है और पद स० १५ की भाषा गुजराती से प्रभावित है। उपर्युक्त परिस्थिति मे ऐसे पदो को प्रक्षिप्त मानना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। गुजराती में प्राप्त पद १ वागे छे रे, वागे छे रे, पेला वनडा माँ, मीठी वेणु वागे छे दुरनो डर लागे छे। सासु सती माती सुख निद्रा माँ, जाऊँ तोरे ननदल जागे छे। ससुरो हमरो परम सुहागी, दियेरी वो छन छेनो दिल माँ दाझे छे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, जनम मरण भे भागे छे ।।५२५।।† २ अरे मोरली नन्दावन रागी, बागी छे जमनाने तीरे रे। मोरली ने नादे घेलाँ कीधाँ, मन काँई काँई कामण कीधाँ रे। जमनाने नीर तीर धेनु चरावे, काँधे काली काँबली रे। मोर मुगट पिताम्बर शोभे, मधुरी सी मोरली बजावे रे। मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरणकमल बलिहारी रे ।।५२६।।† ३ चालो नी जोवा जइये रे, माँ मोरली वागी। भर निद्रा माँ हुँरे सुती ती, जब कि ने जोवा जागी॥ वृन्दावन ने मारग जाता, सामो मलियो सुहागी। मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल लेहे लागी ।।५२७।।†

२१२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ एक दिन मोरली बजाई, कन्हैया एक दिन मोरली बजाई। मोरली नाना दे मेरो मन हरि लीनो, ओम की सुरता उठाई। गौओ तो सब घास ना खाये, ............। शर्वरी तो बली स्तभ भई हे, चन्द्र गयो छुपाई रे। मेघ घटा घट थई रही छे, बादरी कारी गै वाही रे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल चित छाई रे। ॥५२८॥† ५ लीधाँ रे भटके, म्‍हाँरा मन लीधाँ रे लटके। गात्र रग कीधाँ गिरिधारिए, जो मार्या झटके। मन रे मारू मोरली मे मोह्युँ, पेला बाँस तणे कटके। मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, हो रग लाग्य अटके ॥५२९॥† ६ मोरलीए मोह्याँ मोहन, तारी मोरलीए मन मोह्याँ। थारे कारण शामलिया वाहला, गण भुवन मेणे जोया रे। थारा सरीखा प्रभु नव कोई दीठा, गण भुवन मनडे न मोह्याँ रे। मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित्र प्रोयाँ रे ॥५३०॥† ७ मार्या छे मोहन बाण, वा'ली डे मार्या छे मोहना बाण। तमारी मोरलीए माराँ मनड़ाँ बिधायाँ, बिधायाँ, तन मन प्राण। वृन्दावन ने मारग जाताँ, हाँ रे मारो पालवडो मो ताण। जल जमना जल भरवा गयाँ ताँ, काँठले उभो पेलो काण। मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित्त आण ॥५३१॥†

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २९३ ८ वागे छे रे, वागे छे, वृन्दावन मुरली वागे छे, तेनो शब्द गगन मॉ गॉजे छे । वन्द्रा ते वन ने मारग जाता, वां'लो दान दधिना मॉगे छे । वन्द्रा ते वन मॉ रास रचायो छे, वां'लो रास मण्डल मॉ विराजे छे । पीला पीताम्बर जरकस जामा, वां'ला ने पीलो ते पटको विराजे छे । काने ते कुण्डल मुस्तके मुगट, हॉरे वां'ला मुख पर मुरली विराजे छे । वन्द्रा ते वन नी कुज गलिन मॉ, वां'ले थनक थई थई नाचे छे । बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वां'ला दरशन यो दुखड़ा भागे छे । ॥५३२॥†

नाथ-प्रभाव् द्योतक पद राजस्थानी में प्राप्त पद १ जावा दे जावा दे, जोगी किस का मीत। सदा उदासी रहै मोरी सजनी, निपट अटपटी रीत। बोलत बचन मधुर से मानूँ, जोरत नाहि प्रीत। मैं जाणूँ या पार निभेगी, छोड़ि चले अधबीच। मीराँ के प्रभु स्याम मनोहर, प्रेम पियारा मीत ॥५३३॥ २ जोगिया जी छाइ रह्यो परदेस। जब का बिछुडिया फेर न मिलिया, बहोरि दियो न सदेस। या तन ऊपरि भसम रमाऊँ, खोर करूँ सिर केस। भगवाँ भेख धरूँ तुम कारण, ढूँढत च्यारूँ देस। मीराँ के प्रभु राम मिलण कूँ, जीवनि जनम अनेस ॥५३४॥ ३ जोगिया जी ' निसि दिन जोहाँ थॉरी बाट। पॉव न चालै, पथ दुहेलो, आडा ओघड घाट। नगर आई जोगी रम गया रे, मो मन प्रीत न पाइ। मैं भोली भोलापन किन्हो, राख्यो नही बिलमाइ। जोगिया कूँ जोवत बहूँ दिन बीता, अजहूँ आयो नाहि। बिरह बुझावण अन्तरि आवो, तपत लगी तन मॉहि। कै तो जोगी जग मे नाही, कैर बिसारी मोय।

२९६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कॉई करूँ, कित जाऊँ सजनी, नैण गुमायो रोय। आरति तेरे अन्तरि मेरे, आवो अपनी जाणि। मीराँ व्याकुल विरहणी रे, तुम बिन तलफत प्राण ॥५३५॥ ४ पिय बिन सूनो छै जी म्हाँरो देस। ऐसा है कोई पिव कूँ मिलावै, तन मन करूँ सब पेस। तेरे कारण बन बन डोलूँ, कर जोगण को भेस। अवधि बदीति अजहूँ न आये, पडर होइ गया केस। मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, तजि दियो नगर नरेस ॥५३६॥ ५ जोगिया जी आवो थे या देस। नैणन देखूँ नाथ मेरो, ध्याय¹ करूँ आदेस। आया सावण मास सजनी, भरे जल थल ताल। रावल कुण बिलमाइ² राख्यो, बिरहिन है बेहाल। बिछडियाँ कोई भौं³ भयो रे, जोगी, ए दिन अहला४ जाइ। एक बेर देह फेरि, नगर हमारे आइ। वा सूरति मेरे मन बसे रे, जोगी छिन भर रह्यो न जाइ। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दरसण द्यो हरि आइ ॥५३७॥ पाठान्तर १, जोगिया जी आजो इण देस। मै जास्या देखूँ नाथ नैं, धाइ करूँ आदेस। आया सावण भादवा, भरिया जल थल ताल। साँई कूँ बिलमाई राख्यो, ब्रहनी है बैहाल। १ दौडकर, २ फुसला रखना, ३ युग, ४ व्यर्थ।

नाथ-प्रभाव द्योतक पद २९७ बिसरयाँ बोहो˙ दिन भया, बिसरयो पलक न जाइ । ऐक बेरी देह फेरि, नगरि हमारै आइ । वा मूरत म्हारे मन बसे, बिसरयो पलधू न जाइ । मीराँ के कोई नहि दूजौ, दरसण दीजो आइ । प्रथम पाठ की अभिव्यक्ति मे अधिक सगति है ।

६ म्हाँरो घर रमतो ही आई रे तू जोगिया । कानाँ बिच कुंडल, गले बिच सेली, अग भभूत रमाई रे । तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है, ग्रिह आँगणी न सुहाई रे । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दरसण द्यो मोकूँ आई रे ॥५३८॥ पद की प्रथम पक्ति मे प्रयुक्त “म्हाँरो” र्शब्द के स्थान पर “सारो” का प्रयोग भी कही कही मिलता है । अर्थ सगति के विचार से “म्हारो” का प्रयोग ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है । पद की अन्तिम पक्तियो के निम्नाकित पाठान्तर भी मिलते हैं:— “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ध्यावै सेस महेस”। और “मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तज दियो नगर नरेस”

७ जोगिया जी दरसण दीजो राज । कर जोडिया करण कहूँ, म्हाँरी बाहा गहवाँ की लाज । लोक लाज जब सारी डारी, छाडचो जग उपदेस । ब्रह्म अगिन मे प्राण दाझे, म्हाँरो सुण लीजो आदेस । साँच मुद्रा भाव कंथा, साज्यो नष सब साज । जोगणि होय जग ढूँढसूं रे, म्हाँरी घर घर फेरी आस । दरध दिवानी तन देषि आपनूं, मिलिया परम दयाल । मीराँ के मनि आनन्द हुआ, रुम रूम षुसियाल ॥५३९॥†

२९८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पाठान्तर १, जोगिया दरस दीजो राज, बाँह गह्मां की लाज। लोक लाज बिसारि डारिस, छाँड्‌यो जग उपदेस। विरह अगिन मे प्राणि दाझै, सुणि लिज्यो आदेस। पाँच मुद्रा भाव कथा, नष सिष साजे साज। जोगिण होय जग ढूँढसूँ, म्हारी घर घर फेरी आज। दरद दिवानी'तन जाणि आपनी, मिलिया राम दयाल। मीराँ के मन आनन्द उपज्यौ, रोम रोम खुसियाल।† दोनो ही पाठो मे अन्तिम दोनो पक्तियाँ मिलन और आनन्द को ही अभिव्यक्त करती है, जब शेष सम्पूर्ण पद से वियोग और प्रतीक्षा के साथ ही साथ जोगी द्वारा प्रदर्शित अवहेलना के प्रति एक गहरी शिकायत भी लक्षित होती है। शिकायत की यह अभिव्यक्ति नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो की विशेषता है। ८ तेरो मरम नहि पायो रे जोगी। आसण माँडि गुफा मे बैठ्यो, ध्यान हरि को लगायो । गल बीच सेली, हाथ हॉजरियो, अग भभूत रमायो। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, भाग लिख्यो सो ही पायो ।।५४०।। ९ कोई दिन याद करोगे, रमता राम अतीत । आसण माँडि अडिग होय बैठ्या, याही भजन की रीत। मै तो जाणू जोगी सग चलेगा, छोड़ि गया अधबीच। आत न दीसे, जात न दीसे, जोगी किस का मीत। मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, चरण न आवै चीत ।।५४१।। पद की प्रथम पंक्ति की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। इस पद और पद सं० ८ की द्वितीय पंक्ति का भाव और भाषा- साम्य विचारणीय है। इस पद की द्वितीय पंक्ति की अभिव्यक्ति "याही भजन की रीत" मे आराध्य के प्रति बड़ा मार्मिक व्यग है।

नाथ-प्रभाव द्योतक पद २६६ १० धूतारा जोगी एकर सूं हँसि बोल । जगत बदीत करी मनमोहना, कहा बजावत ढोल । अग भभूति गले मृगछाला, तू जन गुढिया खोल । सदन सरोज बदन की सोभा, ऊभी जोऊँ कपोल । सेली नाद बभूत न बटवो, अजूं मुनि मुख खोल । चढती बैस¹ नैण अनियाले², तू घूरि घरि मत डोल । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी,चेरी भई बिन मोल ॥५४२॥ ११ धूतारा जोगी एक बेरिया मुख बोल रे । कान कुडल गल बीच सेली, अवतेरी मुनि मुख खोल रे । रास रच्यो बसी बट जमुना, ता दिन कीनी कोल रे । पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका,अधबिच पड गयो झोल रे । जगत बदी ते तुम करो मोहन, अब क्यूँ बजाओ ढोल रे । तेरे कारण सब जग त्याग्यो, अब मोहैं कर सो लोल रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चैरी भई बिन मोल रे ॥५४३॥† उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्तियो मे गहरा साम्य हैं। द्वितीय पद की अभिव्यक्ति कही कही असगत और अर्थहीन हैं। प्रथम पद पर नाथ-परम्परा का विशेष प्रभाव है और दूसरे पद पर वैष्णव-परम्परा का गहरा प्रभाव है। प्रथम पद मे तो आराध्य “धूतारा जोगी” से “एकर सूं हँसि बोल” की प्रार्थना है और एतदर्थ प्रयास भी है और द्वितीय पद मे पूर्व जन्म के ‘कोल’ की याद दिलाई जा रही है। “पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका” जैसी अभिव्यक्ति वैष्णव-प्रभाव द्योतक अन्य पदो में भी मिलती है।* इस पद की भाषा पर भी खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। १ वयस, २ तीखे ।

  • देखे, मीराँ, एक अध्ययन,

३०० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह उपर्युक्त परिस्थिति मे प्रथम पद ही .प्रामाणिकता के अधिक निकट पडता प्रतीत होता है । अभिव्यक्ति के आधार पर यह पद विशेष .विचारणीय है । १.२ जोगियो आणि मिल्यो अनुरागी । ससा सोक अंग नहि त्रिसना, दुबध्या¹ सब ही त्यागी । मोर मुगट पीताम्बर सोहैं, स्याम बरन बडभागी । जनम जनम को साहिब म्हाँरो, वाही सो लौ लागी । अपणा पिव सो हिलमिल खेलाँ, हरि दरशन अनुरागी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, अब मै भई सुभागी॥५४४॥† पाठान्तर १, जोगियो आणि मिल्यो अनुरागी । ससय सोक अग नहि त्रिसना, दुबध्या सब ही त्यागी । मोर मुकुट पिताम्बर सोहै, स्याम बरन बड भागी । जनम जनम को मित्र हमारो, अधर सुधारस पागी । अपणा पिय सूँ हिलमिल खेलाँ, हरि दरशन अनुरागी । मीराँ तो गिरधर मनमानी, अब तो भई है सुभागी ।† नाथ प्रभाव द्योतक सम्पूर्ण पदो मे यही एक ऐसा पद है जिसमे मिलन और तद्जन्य आनन्द की अभिव्यक्ति हुई है । इस पद की एक और विशेषता भी है । अन्य सभी नाथ प्रभाव द्योतक पदो मे आराध्य की वेशभूषा का वर्णन नाथ-परम्परानुसार सुसज्जित जोगी के अनुकूल ही है, परन्तु यहाँ आराध्य का वर्णन वैष्णव-परम्परानुकूल है । उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ के आराध्य 'जोगी' 'मोर मुकुट पीताम्बर' ही धारण किए हुए है । द्वितीय पाठान्तर पर ब्रजभाषा का कुछ विशेष प्रभाव स्पष्ट है । पद विशेष रूपेण विचारणीय है । १ दुविधा ।

नाथ-प्रभाव द्योतक पद ३०१ मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद १ आपणा गिरधर के कारणे, (वा) मीराँ बैरागण हो गई रे । जब ते सिर पर जटा रखाई, नैणा नीद गई रे । दड कमंडल और गूदड़ी, सिर पर धार लई रे । छापा तिलक बनाये छवि सो, माला हात लिई रे । दोऊ कुल छोड़ि भई वैरागण, हरि सो टेर दई रे । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण भई रे ॥५४५॥† पाठान्तर १, आपणा गिरधर कै कारणै, मीराँ वैरागण भई रे । सिर पर जटा बधाई, नैणा नीद गई रे । दड कमडल और गूदडी, सिर पर धार लई रे । छापा तिलक बनाये छवि सो, माला हात लई रे । दोऊ कुल छोड़ि भई वैरागण, हरि सो टेर दई रे । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण भई रे ।† पाठान्तर २, अपणै प्रीतम के कारणै, मीराँ वैरागण भई रे । जब तै सीस पै जटा रखाई, नैणा नीद गई रे । दोऊ कुल छाँड भई वैरागण, हरि सो टेर देई रे । छापा तिलक तुलसी की माला, कुल की लाज गई रे । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण लई रे ।† पाठान्तर ३, अपने प्रीतम के कारणै, वा मीराँ वैरागन हो गईं रे । जब से सिर पर जटा बिठाई, नैनन नीद गई रे ।

३०२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह दोऊ कुल छोड़ चली वृन्दावन, हरि को टेर गई रे । छापा तिलक माल गल तुलसी, कुल की लाज गई रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, गोविन्द सरण लई रे ।† उपर्युक्त तीनो पाठो मे गेय परम्परा के कारण पडा हलका हेर- फेर स्पष्ट हो उठता है । सभी पाठो मे मीराँ के प्रति किसी अन्य की ही उक्ति स्पष्ट हो उठती है । साथ ही एक और अभिव्यक्ति भी विचार- णीय है । वैराग ण मीराँ की वेशभूषा मे नाथ और वैष्णव, दोनो ही परम्परा का समन्वय है, जैसा कि किसी भी अन्य पद मे नही है । शुद्ध राजस्थानी मे प्राप्त ऐसे पदो मे भी एक पद (स० ६) ऐसा मिलता है जिसमे मीराँ के आराध्य जोगी की वेश भूषा वैष्णव-परम्परानुसार ही है । उक्त पद के द्वितीय पाठ पर ब्रजभाषा का अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव भी है । उपर्युक्त दोनो ही पद विशेष विचारणीय है । २ ऐसी लगन लगाय कहाँ तू जासी । तुम देख्या बिन कल न पडत है, तलफ तलफ जिय जासी । तेरे खातर जोगण हूँगी, करवत लूँगी कासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल की दासी ।।५४६।। पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव स्पष्ट है । ३ माईं १ म्हांनै रमइयो है दे गयो भेष१ । हम जाने हरि परम सनेही, पूरब जनम को लेष । अग बिभूत गले मृगछाला, घर घर जपत अलेय । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, रामजी मिलन की टेक ।।५४७।।† इस पद पर भी वैष्णव और नाथ दोनो ही परम्पराओ का प्रभाव स्पष्ट है । "घर घर अलख जगाय" जैसी अभिव्यक्ति नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो मे प्राप्त है, परन्तु "घर घर जपत अलेष" जैसी अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है । द्वितीय पक्ति मे प्रयुक्त "लेष" के स्थान पर "पेष" का भी प्रयोग मिलता है । १ वेश ।