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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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मतभेद २१ सुवरण राग एक ही गति है, अब तो समझ गवारी१ । रतन जटित की टोपी सिर पर, हीरा कठी धारी । पाय घूघरा घमस पडत है, करी स्याम सू यारी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।† उपर्युक्त पद मे अभिव्यक्त भावनाएँ विशेष महत्वपूर्ण है । पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि पद की रचना गृह त्याग के बाद ही हुई है। “जोग लियो कह हारी” जैसी अभिव्यक्ति के आधार पर ऐसा सम्भव प्रतीत होता है कि इस पद की रचना शायद मीराँ को लौटा लाने के प्रयास के अवसर पर हुई है। पद की नवी पक्ति मे प्रयुक्त “गवारी” सम्बोधन किसके प्रति हुआ, यह भी कही से स्पष्ट नही होता । पद विशेष विचारणीय है । २० अरे राणा पहली क्यो न बरजी, लागी गिरधारिया से प्रीत । मार चाहे छाँड राणा, नहीं रहू मै बरजी । सगुना साहिब सुमरता रे, मै थारे कोठे खटकी । राणा जी भेज्या विष रा प्याला, कर चरणामृत गटकी । दीनबन्धु सांवरिया है रे, जाणत है घट घट की । म्हांरे हिरदा माहि बसी है, लटकन मोर मुकुट की । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मै छू नागर नटकी ॥२०॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह नही हुआ है । २१ राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी । कोई निन्दो कोई बिन्दो, मे चलूगी चाल अनूठी । साकली गली मे सतगुरु मिलिया, क्यूकर फिरू अपूठी । सदगुरु जी सू बाता करता, दुरजन लोगा ने दीठी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अँगीठी ॥२१॥ १ कहाँ