मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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करवा देंगे तुम कुछ न बोलना हमलोग राजसभा में तुम्हारा परिचय ‘ये हमारे गुरुजी हैं’ इस तरह देंगे इत्यादि बातें समझाकर अपने साथ ले गये। राजसभा में जाकर पण्डितों ने इनका पूर्वनियोजित ढंग से परिचय दिया तथा शास्त्रार्थ के लिए राजकुमारी को कहा एवं यह भी सूचित कर दिया कि ‘इस समय हमारे पूज्य गुरुवर ने मौन व्रत ले रखा है अतः शास्त्रार्थ साङ्केतिक ( इशारों से ) होगा।’ शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। विद्योत्तमा ने ‘ईश्वर एक है’ इस अभिप्राय से अपनी एक अंगुली उठाकर गुरुजी की तरफ दिखाया। गुरुजी ने ‘यह मेरी एक आँख फोड़ने का संकेत कर रही है’ ऐसा समझकर ‘मैं तुम्हारी दोनों आँखें फोड़ दूँगा’ इस अभिप्राय से अपनी दो अंगुली ऊपर उठाकर राजकुमारी को दिखाया। इस पर गुरुजी के शिष्यों ने एकजुट होकर ऐसा तर्क-कुतर्क प्रस्तुत किया कि विद्योत्तमा को परास्त होना पड़ा। अन्ततः इनका विवाह राजकुमारी से हो गया। कहा जाता है कि सुहागरात के शुभावसर पर बाहर कोई ‘ऊँट’ चिल्लाया और विनोद के लिए राजकुमारी ने अपने पति से किमिदम् ( यह क्या है ) ? ऐसा पूछा। उस मूर्ख ने पत्नी के प्रश्न को सुनकर घबराकर या उच्चारण की असमर्थता से ‘उट्रोऽयम्’ ऐसा उत्तर दिया। राजकुमारी पण्डितों के षड्यन्त्र को समझकर अपने दुर्भाग्य पर पछताती हुई पति महोदय को अपमानित कर राजभवन से निकाल दिया। उस मूर्ख के लिए पत्नी का अपमान असह्य था। अतः उसने विद्या-प्राप्ति के लिए किसी ‘काली मन्दिर’ में जाकर आमरण उपासना प्रारम्भ कर दी। काली ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा, उस मूर्ख ने ‘कवित्वपूर्ण विद्या दो’ ऐसा वर माँगा। भगवती के ‘एवमस्तु’ ऐसा कहकर अन्तर्धान हो जाने पर वह मूर्ख तत्क्षण सकल शास्त्र का पारङ्गत एवं अद्वितीय प्रतिभासम्पन्न विद्वान् हो गया। काली की उपासना के फलस्वरूप उन्हें विद्या मिली अतः उनका नाम ‘कालिदास’ पड़ा, ऐसा भी सुना जाता है। आगे यह भी किंवदन्ती है कि वरदान मिल जाने पर कालिदास को अपनी पत्नी के द्वारा किया गया अपमान भी स्मरण हो आया और उसका बदला लेने वे घर की ओर चले। जिस समय वे घर पहुँचे वह समय सम्भवतः रात का समय था अतः घर का द्वार बन्द था, उन्होंने बाहर से आवाज लगायी ‘अनावृतकपाटं द्वारं देहि’ ( बन्द किवार खोलो ) । विद्योत्तमा पति के स्वर से परिचित थी एवं पति की मूर्खता से भी, अतः उसने साश्चर्य पूछा—