मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें( १० )
'अस्ति कश्चिद्वाग्विशेषः' (क्या वाणी की कुछ विशेषता है ?) महाकवि ने पत्नी के विद्याभिमान का मर्दन करने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त वाक्य के तीन पदों को लेकर तीन काव्यों का निर्माण किया जो संस्कृत साहित्य के अनूठे काव्य हैं। जैसे कि 'अस्ति' इस वाक्यांश को लेकर 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'कुमारसंभव' महाकाव्य, “कश्चित्' इस वाक्यांश को लेकर 'कश्चित् कान्ताविरहगुरुणा' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'मेघदूत' नामक खण्डकाव्य तथा 'वाक्' इस वाक्यांश को लेकर 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'रघुवंश' महाकाव्य । यह किंवदन्ती बहुत प्रसिद्ध है ।
इनके सम्बन्ध में दूसरी जनश्रुति है कि ५०० ई० में वर्तमान लङ्का के महाराज कुमारदास स्वयं कवि थे और कलामर्मज्ञ भी । अतः उन्होंने कालिदास को अपनी राजसभा में ही नहीं रखा अपितु अपना मित्र भी बना लिया । राजभोग का उपभोग करते हुए इनका सम्बन्ध किसी वेश्या से हो गया और उसी के द्वारा इनकी हत्या कर दी गयी । पर यह जनश्रुति बिल्कुल निराधार जान पड़ती है ।
कुछ लोग इन्हें महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में एक मानते हैं । जैसा कि इनके काव्यों में 'विक्रम' शब्द का साभिप्राय प्रयोग किसी विक्रम राजा के आश्रित होने का संकेत करता है ।
कालिदास का सम्प्रदाय :— कालिदास जाति के ब्राह्मण थे । ये किस सम्प्रदाय के थे ? इनके उपास्य देव कौन थे ? इन सब प्रश्नों का उत्तर हमें उनके काव्यों के आदि में किये गये मङ्गलाचरणों से मिलता है । रघुवंश के मङ्गलाचरण में उन्होंने जगत् के माता-पिता शङ्कर और पार्वती को प्रणाम किया है—जैसे
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥
इसी प्रकार मालविकाग्निमित्र नाटक में उन्होंने अष्टमूर्ति शङ्कर की वन्दना की है । जैसे :—
एकैश्वर्ये स्थितोऽपि प्रणतबहुफले यः स्वयं कृत्तिवासाः,
कान्तासंमिश्रदेहोऽप्यविषयमनसां यः परस्ताद्यतीनाम् ।
अष्टाभिर्यस्य कृत्स्नं जगदपि तनुभिर्बिभ्रतो नाऽभिमानः,
सन्मार्गालोकनाय व्यपनयतु स वस्तामसीं वृत्तिमीशः ॥