मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ११ )
इसी प्रकार विक्रमोर्वशीय त्रोटक के मङ्गलाचरण में उन्होंने शङ्कर की प्रार्थना की है। जैसे—
वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाऽक्षरः।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते
स स्थाणुः स्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायाऽस्तु वः॥
इसी प्रकार विश्वविश्रुत ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ के मङ्गलाचरण में उन्होंने अष्टमूर्ति शङ्कर को ही प्रणाम किया है। जैसे—
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या, वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः॥
इस प्रकार हम यह निश्चय कर सकते हैं कि ये भगवान् शिव के उपासक थे और इनका सम्प्रदाय ‘शैव’ था। परन्तु यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व के सर्वश्रेष्ट महाकवि कालिदास स्वयं शैव होते हुए भी साम्प्रदायिक संङ्कीर्णता से बहुत ही दूर थे। यह बात मैं नहीं, उनका काव्य स्वयं कह रहा है। कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्माजी की स्तुति एवं रघुवंश के दशम सर्ग में की गयी ‘विष्णु’ की स्तुति इसका प्रमाण है। इतना ही नहीं, ये एक ही परब्रह्म के तीनों रूप (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) मानते हैं-जैसा कि कुमार संभव के सप्तम सर्ग में उन्होंने प्रतिपादित किया है। जैसे—
एकैव मूर्तिर्बिभिदे त्रिधा सा सामान्यमेषां प्रथमाऽवरत्वम्।
विष्णोर्हरस्तस्य हरेः कदाचिद्-वेधास्तयोस्तावपि धातुराद्यौ। (७।४४।)
कालिदास का स्थितिकाल— कालिदास का स्थितिकाल संस्कृत साहित्य के इतिहास में विभिन्न इतिहासज्ञों के अन्तःसाक्ष्य प्रमाणों के आधार पर ईसा के पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक के सात सौ वर्षों के लम्बे समय में झूल रहा है। यहाँ पर संक्षेप में प्रधान मतों का उल्लेख किया जायगा। उनमें सामान्यतः चार मत प्रधान हैं। जिसमें प्रथम है—
( १ ) धारा नगरी के राजा भोज का समय (१००५-१०५४) खृष्ट की ग्यारहवीं शताब्दी। वल्लालसेन नामक किसी विद्वान् ने कालिदास को