मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
राजा भोज का सभा-पण्डित माना है। वल्लालसेन ने यह बात सुनी-सुनायी बातों के आधार पर लिखी है क्योंकि वे स्वयं भोज के समकालिक नहीं थे। यह बात उन्हीं के कथनों से पुष्ट होती है। क्योंकि जहाँ पर कालिदास को भोज का सभा-पण्डित उन्होंने कहा वहीं भारवि, दण्डी, माघ आदि कवियों को भी (जो विभिन्न समय के थे) भोज के सभा-पण्डित कहा है। अतः यह मत बिल्कुल नगण्य है। क्योंकि राजा भोज ग्यारहवीं शताब्दी के थे और कादम्बरी तथा हर्षचरित के रचयिता बाणभट्ट छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुए थे। एवञ्च बाणभट्ट ने अपने 'हर्षचरित' में कालिदास की प्रशंसा में लिखा है—
'निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु ।
प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥'
यदि कालिदास भोज के सभापण्डित होते तो उनकी प्रशंसा ५०० वर्ष पूर्व कैसे होती ? हो सकता है वल्लालसेन ने भोज के समय हुए परिमल कालिदास या कालिदास उपाधिवाले किसी और कवि को ही भ्रमवश दीप-शिखा 'कालिदास' मान लिया हो ।
( २ ) दूसरा मत है चौथी शताब्दी के अन्त से पाँचवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अर्थात् चन्द्रगुप्तविक्रमादित्य और समुद्रगुप्त का राज्यकाल। प्रो० लासेन, कर्नल विल्फोर्ड, जेम्स प्रिन्सेप, प्रो० मैकडानल, प्रो० कीथ और विन्सेण्ट स्मिथ आदि विदेशी विद्वानों का कहना है कि गुप्तवंश के राजाओं के राज्यकाल में भारत का साहित्यसूर्य मध्याह्न के आकाश में स्थित होकर सारे संसार को अपने प्रखर किरणों से प्रभावित कर रहा था। कालिदास की रचना में जो तृप्ति और आनन्द की अजस्र धारा प्रवाहित हुई वह उसी सुख एवं समृद्धि के सौभाग्य समय में संभव हो सकी है। प्रो० विन्सेण्ट स्मिथ कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल में आये 'चीनांशुकमिव केतोः' इस उक्ति के आधार पर यह मानते हैं कि जिस बौद्ध धर्म के प्रभाव से भारत और चीन की पारस्परिक मैत्री होकर दोनों देशों की सभ्यता के संमिश्रण से एक तीसरी सभ्यता उत्पन्न हुई उसका पूर्ण विकास गुप्त वंश के राज्यकाल में ही हुआ।
कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् ।
नक्षत्रताराग्रहसंकुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥ (रघुवंश, ६-२२)