भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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रघुवंश के इन्दुमती स्वयंवर में सुनन्दा सर्वप्रथम मगध के राजा की प्रशंसा करती है। गुप्तवंश के राजा मगध पर शासन करते थे, यह बात तो निर्विवाद है ही। प्रो० कीथ सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा किये जाने को यह मानते हैं कि कालिदास ने इस तरह प्रच्छन्नभाव से अपने आश्रयदाता का संकेत एवं कृतज्ञता घोषित करने के लिए प्रशंसा अपने काव्यों में की है। उनका कहना है कि कालिदास ने इसी तरह रघुवंश में ‘आसमुद्रक्षितीशानाम्’ इस वाक्य के द्वारा समुद्रगुप्त के राज्यविस्तार का संकेत किया है, इसी तरह ‘ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रि:’ इस श्लोकांश में आये ‘चन्द्र’ शब्द के द्वारा अपने आश्रयदाता चन्द्रगुप्त का एवं ‘कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम्’ इस श्लोक में आये ‘कुमार’ शब्द के द्वारा उसके पुत्र कुमारगुप्त का संकेत किया है। उनका कहना है कि ‘कुमारसम्भव’ नामक महाकाव्य की रचना कालिदास ने चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्म के उपलक्ष्य में की है।

उन्होंने कालिदास को गुप्त काल में मानने के लिए कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं। उनका कहना है कि अश्वघोष कनिष्क के शासनकाल में विद्यमान थे। अश्वघोष एवं कालिदास की रचनाओं में अनेक स्थल पर भाव-साम्य है। भावसाम्य के कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं—

महाकवि अश्वघोष का अपने बुद्धचरित में सिद्धार्थ के जन्म का वर्णन—

वाता ववुः स्पर्शसुखा मनोज्ञा दिव्यानि वासांस्यवपातयन्तः।
सूर्यः स एवाऽभ्यधिकं चकासे जज्वल सौम्यार्चिरनीरिरतोऽग्निः ॥
( बुद्धचरित, १–२२ )

यदि इस तरह करते हैं तो महाकवि कालिदास भी अपने कुमारसंभव में कार्तिकेय के जन्म का भी वर्णन उसी प्रकार करते हैं—

वाता ववुः सौख्यकराः प्रसेदुः आशाविधूमो हुतभुग् दिदीपे।
जलान्यभूवन् विमलानि तत्रोत्सवेऽन्तरिक्षं प्रसाद सद्यः ॥ ( ११–३७ )

यदि अश्वघोष राजकुमार सिद्धार्थ जिस समय वनविहार के लिए राजमार्ग पर निकले उस समय उनको देखने के लिए उत्कण्ठित नगर-नारियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं—

वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परम्परायासितकुण्डलानि।
स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि ॥
( बुद्धचरित, ३–१९ )