भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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( १४ )

तो कालिदास भी स्वयंवर में आते हुए अज को देखने के लिए उत्कण्ठित नगरस्त्रियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं—

तासां मुखैरासवगन्धगर्भैर्व्याप्तान्तराः सान्द्रकुतूहलानाम्।
विलोचनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षाः सहस्रपत्र·भरणा इवाऽऽसन् ॥ (रघुवंश, ७-११)

बुद्धचरित में तपस्या में लीन बुद्ध को तपस्या से विरत करने के लिए प्रयत्नशील काम को आकाशस्थ विशिष्टभूत इस प्रकार फटकारता है—

मोघं श्रमं नार्हसि मार ! कर्तुं हिंसात्मतामुत्सृज गच्छ शर्म।
नैष त्वया कम्पयितुं हि शक्यो महागिरिर्मेरुरिवाऽनिलेन ॥
( बुद्धचरित, १३-५७ )

रघुवंश में नन्दिनी सेवा में तत्पर दिलीप की परीक्षा के लिए माया-निर्मित सिंह भी राजा को उसी प्रकार कहता है—

'अलं महीपाल! तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्तिरंहः शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ (रघुवंश, २-३४)

इसी तरह सौन्दरनन्द में नन्द को बुद्ध के गौरव से एवं सुन्दरी प्रिया के अनुराग से हुई दुविधा का वर्णन अश्वघोष इस प्रकार करते हैं—

तं गौरवं बुद्धगतं चकर्ष, भार्यानुरागः पुनराचकर्ष ।
सोऽनिश्चयान्नाऽपि ययौ न तस्थौ तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः ॥ ( ४-४२ )

कुमारसंभव में तपश्चर्यरत पार्वती की परीक्षा के लिए आये हुए ब्रह्मचारी वेशधारी शिव ने शिव की निन्दा सुनाने के कारण जाती हुई पार्वती को अपना स्वरूप दिखला कर जैसी दुविधा में डाला—कालिदास के द्वारा उसका वर्णन देखिए—

तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टि-निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती ।
मार्गाऽचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराज-तनया न ययौ न तस्थौ ॥
( ५-८५ )

इस प्रकार दोनों महाकवियों की रचनाओं में बहुत-से स्थलों पर समानता पायी जाती है जो इस बात को प्रमाणित करती है कि एक ने दूसरे का अनुकरण किया है। किसने अनुकरण किया और किसकी रचना अनुकार्य है इसका विवेचन यदि किया जाय तो समय की कुछ जानकारी हो सकती है । प्रो० साहेव का कहना है कि महाकवि भास ने अपने नाटकों में जैसी प्राकृत भाषा का प्रयोग किया है वह अश्वघोष के द्वारा प्रयुक्त प्राकृत से परिष्कृत और अर्वाचीन है, इससे सिद्ध होता है कि महाकवि भास अश्वघोष से अर्वाचीन हैं। महाकवि