मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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कालिदास भास से अर्वाचीन हैं यह बात तो निबिवाद ही है क्योंकि कालिदास स्वयं मालविकाग्निमित्र नाटक के प्रारम्भ में भास को प्राचीन यशस्वी कवि मान चुके हैं। जैसे—प्रथितयशसां भाससौमिल्लकविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ कथं बहुमानः ? अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया है। हम पहले ही लिख चुके हैं कि अश्वघोष कनिष्क के समय में विद्यमान थे। कनिष्क सम्भवतः खृष्ट की प्रथम या द्वितीय शताब्दी के प्रारम्भ में पञ्जाब का शासन करते थे। इस स्थिति में भास यदि तृतीय शताब्दी के कवि माने जाएँ तो कालिदास उनसे परवर्ती कवि माने जाएँगे।
दूसरी बात बाणभट्ट की रचनाओं से पता चलता है कि वे हर्षवर्द्धन के सभा-पण्डित थे। हर्षवर्द्धन सातवीं शताब्दी के मध्यभाग में राज्य करते थे एवञ्च बाणभट्ट ने कालिदास की प्रशंसा में 'निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु' ऐसा लिखा है जिससे सिद्ध होता है कि कालिदास सातवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे।
“सविजयतां रविकीर्तिः कविताऽऽश्रितकालिदासभारविकीर्तिः” द्वितीय पुलकेशी के इस प्रस्तरलेख से सिद्ध होता है कि कालिदास द्वितीय पुलकेशी जो ६३४ खृष्टाब्द का माना जाता है, के पूर्व विद्यमान थे। इस तरह कालिदास ६३४ खृष्टाब्द से पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं।
वत्सभट्टि नाम के कवि ने प्राचीन दशपुर आधुनिक मन्दसोर नाम के स्थान के सूर्यमन्दिर के प्रशस्ति की रचना की है। जिस प्रशस्ति पर मालव संवत् ५२९ का उल्लेख है। पूर्वोक्त लेख की भाषा और शैली में कालिदास की भाषा और शैली की समानता पायी जाती है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास मालव सं० ५२९ से पूर्व विद्यमान थे।
प्रो० साहेब ने पूर्वोक्त प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहा है कि कालिदास तृतीय शताब्दी से पीछे एवं पाँचवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे। एवञ्च यह सिद्ध होता है कि कालिदास गुप्त वंश के राजाओं के राज्यकाल में विद्यमान थे। इनकी आनन्दपूर्ण शान्तिप्रदायिनी काव्यधारा उसी सौभाग्य समय में प्रवाहित हुई थी। एवञ्च पूर्वोक्त पद्य में 'चन्द्र' शब्द के आधार पर इनके आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय को मान लिया जाता है, जिसका राज्यकाल ४१४