भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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तक था। इस प्रकार सिद्ध हुआ कि महाकवि कालिदास द्वितीय चन्द्रगुप्त के समय में उत्पन्न हुए थे।

परन्तु पाश्चात्य विद्वानों के इस मत का यदि ठीक से विवेचन किया जाए तो उनका कथन मात्र काल्पनिक सिद्ध होगा, सत्य नहीं। जिसका विचार हम आगे करेंगे।

तीसरा मत है छठी शताब्दी अर्थात् विश्वविख्यात ज्योतिषी वराहमिहिर का समय। इस मत को मानने वाले प्रमुख पाश्चात्य विद्वान् हैं-प्रो० मैक्स-मूलर, डॉ० भण्डारकर, प्रो. कर्न एवं डॉ. भाऊदा जी। इन लोगों का आधार भारतीय जनश्रुति है।

कालिदास के ग्रन्थों के टीकाकार मल्लिनाथजी ने मेघदूत की टीका में कालिदास को महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक माना है-पूर्वोक्त विद्वान् ने इसी पर निर्भर होकर इनको छठी शताब्दी का मान लिया है। क्योंकि कालिदास जिन नवरत्नों में एक थे उन्हीं में ज्योतिष के उद्भट् विद्वान् वराहमिहिर भी एक रत्न थे। ब्रह्मगुप्त के खण्डनखाद्य की टीका में अमरराज लिखते हैं-

‘नवाधिक-पञ्चशतसंख्याके वराहमिहिराचार्यो दिवं गतः’।

नवाधिक पञ्चाशत का अर्थ ५०९ होगा।

इस उक्ति के आधार पर वराहमिहिर की मृत्यु ५८७ खृष्टाब्द मानी जा सकती है। इस तरह कालिदास भी छठीं शताब्दी के सिद्ध होते हैं। आचार्य दिङ्नाग और धर्मकीर्ति असङ्ग के छात्रथे। असङ्ग ५४१ खृष्टाब्द में विद्यमान थे।

स्थानादस्मात्सरसनिचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं
दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान्।

इस श्लोक की टीका में मल्लिनाथ ने दिङ्नाग एवं निचुल शब्द को श्लिष्ट माना है। दिङ्नागाचार्य वसबन्धु के भी छात्र थे। उसी समय उज्जयिनी में ‘विक्रमादित्य’ नामक राजा राज्य करते थे। कालिदास उन्हीं के सभा-रत्न थे, यह बात प्रमाणित होती है परन्तु यह मत भी निःसार ही प्रतीत होता है।

अब हम कालिदास को प्रथम शताब्दी का सिद्ध करने से पहले पूर्वकथित मतों का संक्षेप में विवेचन कर वास्तविकता की ओर बढ़ें।

गुप्तकाल में ही संस्कृतविद्या का पुनर्जागरण हुआ यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह सर्वसम्मत मत नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत