भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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विद्या का चरमोत्कर्ष विक्रमादित्य और राजा भोज के समय में हुआ और उसे ही संस्कृत का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। जिन विद्वानों ने 'चीनांशुकमिव-' यहाँ प्रयुक्त 'चीन' शब्द को देशपरक मानकर तात्कालिक सभ्यता का आदान-प्रदान आदि की कल्पना की है वह भ्रम मात्र है सत्य नहीं। क्योंकि 'चीन' शब्द का मेदिनी कोश के 'चीनो देशांशुकव्रीहिभेदे तन्तौ मृगान्तरे' इस पंक्ति के अनुसार 'रेशमी' वस्त्र भी अर्थ है। और यही अर्थ शाकुन्तल के उक्त स्थल के उपयुक्त भी है। 'चीनांशुक' में चीन (देश) का अंशुक (कपड़ा) ऐसा षष्ठी तत्पुरुष समास न मानकर 'चीनं च तदंशुकम्' ऐसा कर्मधारय मानने से उपर्युक्त रेशमीवस्त्र वाला मत पुष्ट हो जाता है। एवञ्च इन्दुमती स्वयंवर में सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा करवाने के कारण कालिदास यदि मगध के राजाओं के आश्रित मान लिये जायें तो, उनकी जन्मभूमि के विषय में अनेक तरह के प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। जैसे मेघदूत में अलकापुरी की अत्यधिक प्रशंसा करने से वे अलकापुरी के कोई यक्ष मान लिये जायें एवञ्च कुमारसंभव में हिमालय की पर्याप्त प्रशंसा करने के कारण वे कोई हिमालयवासी किन्नर मान लिये जाएँ, रघुवंश में रघु और अज की अत्यधिक प्रशंसा करवाने के कारण उन्हें अयोध्यावासी मान लिया जाए, शाकुन्तल में शकुन्तला प्रस्थान के समय आचार को देखकर उन्हें मिथिलावासी ही न क्यों मान लिया जाए इस प्रकार बहुतेरे प्रश्न हो सकते हैं। अतः विद्वानों का उक्त आधार भी बालू की भीति ही है।

इसी तरह 'ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः' इस श्लोकांश एवं 'गुप्तमूल प्रयत्नतः' इत्यादि स्थलों को आधार मान कर यह कहना कि कालिदास ने अपने आश्रयदाता गुप्त वंशज राजाओं का एवं 'चन्द्र' पद से 'द्वितीय चन्द्रगुप्त' का निर्देश किया है तो यह कहना भी युक्तिमूलक नहीं प्रतीत होता क्योंकि जब कवि सर्वतन्त्रस्वतन्त्र होता है एवं उन्हें यदि अपने आश्रयदाता का संकेत ही करना था तो स्पष्ट रूप से कह सकते थे। कुमारसंभव की रचना चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्मोत्सव पर की गयी यह भी कोरी कल्पना है, इसमें सत्यता नहीं क्योंकि इसमें कोई प्रबल प्रमाण नहीं है।

इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया इस लिए वे अश्वघोष के परवर्ती हैं, यह भी नहीं कह सकते।