मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
महाकवि कालिदास की रचना कवित्वप्रदर्शन मात्र के लिए अर्थात् 'कला कला के लिए' थी, जब कि अश्वघोष की रचना अध्यात्ममार्ग से अन्यमनस्क लोगों का ध्यान काव्य के माध्यम से अध्यात्म की ओर आकृष्ट करना था। जैसा कि उन्होंने सौन्दरनन्द में स्पष्ट रूप से लिख भी दिया है।
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भा कृतिः श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात्कृता । इत्यादि
अतः रचना की समता को लेकर किसी महाकवि की रचना को मौलिक और किसी की रचना को अनुकृतिमूलक कहना साहसमात्र है। वैसे यदि कहा जाय कि अश्वघोष ने ही कालिदास का अनुकरण किया तो युक्तियुक्त भी हो सकता है। जैसे—
अपने नगर में अपने पिता द्वारा अवरुद्ध सिद्धार्थ का वन-विहार के लिए निकलने पर नगर-स्त्रियों की उत्सुकता उतनी नहीं रही होगी जितनी कि कुमारसंभव में ओषधिप्रस्थ में वरयात्रा के प्रसङ्ग में शिवजी या इन्दुमती स्वयंवर के अनन्तर अज की यात्रा में उसे देखने के लिए स्त्रियों की उत्सुकता अपूर्व रही होगी, अतः महाकवि ने जो स्त्रियों के औत्सुक्य का वर्णन किया है वह स्वाभाविक है अतः मौलिक एवं मनोरम है। अश्वघोष को तो अनुकृतिमूलक है।
कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण नहीं किया इसमें एक युक्ति यह भी है कि अनुकरण आदर्श का; उत्तम का किया जाता है जो स्वयं अपूर्ण है उसका कोई भला क्या अनुकरण करेगा? अश्वघोष की भाषा-शैली अपरिमार्जित है च्युति-संस्कृति दोषग्रस्त और साथ ही उतना हृदयावर्जक भी नहीं जितनी कि महाकवि कालिदास की। कालिदास की शैली परिमार्जित, सरस एवं मनोरम है।
साथ ही महाकवि कालिदास कितने निरभिमानी थे इस बात को मैंने प्रारम्भ में ही लिख दिया है। ये अपने से प्राचीन प्रतिष्ठित कवियों का यशो-गान करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते और न अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग ही मानते थे। अतः उन्होंने मालविकाग्निमित्र में लिखा है कि—
'भास-सौमिल्लककविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ कथं बहुमानं' इत्यादि ।
यदि कालिदास महाकवि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो उपर्युक्त पंक्ति में क्या उनका नामोल्लेख नहीं करते ? अवश्य