मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९ )
करते । और भी ‘चोरी’ चोरी की तरह की जाती है। महाकवि कालिदास यदि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो वे यह साहस कभी नहीं कर सकते थे कि एक ही भाव को अपने दो महाकाव्यों (कुमारसंभव और रघुवंश) में उल्लेख करते। अतः इस आधार पर उन्हें चौथी शताब्दी के शेष भाग से पाँचवीं शताब्दी के पूर्वार्ध का मानना कल्पनामात्र है।
प्रो० मैक्समूलर का यह कहना कि संस्कृत विद्या का चरमोत्कर्ष छठी शताब्दी से हुआ और उस समय कालिदास विद्यमान थे, फर्गुसन के कथन पर आधारित है। फर्गुसन का कहना है कि "खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नाम का कोई राजा था ही नहीं, अतः कालिदास प्रथम शताब्दी के नहीं माने जा सकते। अपितु, उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य ने ५४४ ई० सन् में भारत से शकों को भगाकर उस विजयोपलक्ष्य में ६०० वर्ष पूर्व अपना संवत्सर स्थापित किया और उसी समय कालिदास उत्पन्न हुए।"
परन्तु फर्गुसन के इस मत का खण्डन प्रो० फ्लीट और हर्नैल ने महाकवि कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण नामक ग्रन्थ के इस श्लोक—
धन्वन्तरिक्षपणकाऽमरसिंहशङ्कु-वेतालभट्टघटखर्पर-कालिदासाः। ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
को आधार मानकर किया है। कुछ यूरोपीय विद्वान् ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ को महाकवि कालिदास की कृति नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ में वर्णित ग्रहादि की दशा से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि पन्द्रहवीं शताब्दी के पश्चात् किसी नवीन विद्वान् ने इसका निर्माण किया है और कालिदास के नाम से प्रचरित कर दिया है। 'अस्तु' ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ भले ही कालिदास विरचित न हो परन्तु यह तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि कालिदास विक्रम के नवरत्नों में एक थे। अब रही बात खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नामक राजा के रहने और न रहने की, तो इस पर यदि विचार किया जाय तो यह भी सिद्ध हो जाता है कि खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रम थे।
डॉ० राजबली पाण्डेय ने अपने "विक्रमादित्य" नामक ग्रन्थ में पर्याप्त प्रमाणों से सिद्ध कर दिया है कि खृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व विक्रम नामक राजा थे। यूरोपीय विद्वान् ने जो चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को ही उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य मानकर यह लिखा है कि 'उसी ने ५४४ ई० सन् में शकों को भारत