भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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से भगाया और ६०० साल पहले का संवत्सर चलाया' बिलकुल निराधार एवं बेतुका लगता है। यदि उसे अपने नाम से ही संवत्सर चलाना था तो ६०० साल पहले से क्यों चलाता ? साथ ही यूरोपीय विद्वानों ने अपने उक्त कथन में कोई प्रमाण भी नहीं दिया है। अतः यह भी मत अनादरणीय ही है।

अब हम भारतीय विद्वानों के सम्मत प्रथम शताब्दी वाले मत का उल्लेख करने जा रहे हैं।

भारत की बहुप्रचलित जनश्रुति के आधार पर मालवनरेश विक्रम संवत्सर के प्रवर्तक जो खृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व हुए थे उन "विक्रमादित्य" की सभा के नवरत्नों में कालिदास भी एक रत्न थे ।

महाकविकालिदास गुप्तवंश के राजाओं के आश्रित नहीं थे अपितु खृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी के विक्रमादित्य के आश्रित थे, निम्नलिखित प्रमाणों से सिद्ध हो जाता है ।

जे० के० सुब्रह्मण्यम् ने कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक से जो सूक्ष्म प्रमाण प्रस्तुत किये हैं वह महत्त्वपूर्ण हैं। उनका कथन है कि—महाकवि ने अपनी नवीन रचना के विषय में यह लिखा है कि—

"पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चाऽपि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।"

इत्यादि । यहां प्रयुक्त "पुराण" पद श्लिष्ट है । महाकवि ने पुराण शब्द के द्वारा "पुराणख्यातवृत्त" का संकेत किया है। अर्थात् प्राचीन कवियों ने जो प्राचीन ( रामायण, महाभारत आदि ) ख्यातवृत्तों का आश्रयण लेकर अपने काव्यों की रचना की है उसका मैंने ( कालिदास ने ) उल्लंघन किया है, इसलिए वह उपेक्ष्य नहीं है, काव्य-मर्मज्ञजन उसकी परीक्षा करके इस बात का निर्णय कर सकते हैं। वस्तुतः महाकवि ने उक्त नियम का उल्लङ्घन किया है। मालविकाग्निमित्र के भरतवाक्य—

"आशास्यमीतिविगमप्रभृतिप्रजानां
संपत्स्यते न खलु गोप्तरि नाऽग्निमित्रे ॥"

में प्रयुक्त "गोप्तरि, अग्निमित्रे" पद की सप्तमी को भावलक्षणा मानकर उस समय "अग्निमित्र" जीवित थे यह सिद्ध होता है। अग्निमित्र पुष्यमित्रशुङ्ग के पुत्र थे। इनका समय खृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी माना गया है।

महाकवि की रचनाओं के अवलोकन से यह बात (प्रथम शताब्दी की) और भी प्रमाणित हो जाती है। शुङ्गवंश के राजाओं के समय चोरी जैसे अपराधों