मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१ )
में मनु, वशिष्ठ और आपस्तम्ब ऋषियों की स्मृतियों के आधार पर मृत्युदण्ड का विधान था। जैसा कि 'अँगूठी की चोरी में पकड़े गये मल्लाह को प्राण-दण्ड दिया जाता है।' अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में कालिदास ने ऐसा अभिनीत करवाया है। परन्तु गुप्तकाल में वैसा कठोर दण्ड–चोरी जैसे अपराध के लिए नहीं था। उस समय याज्ञवल्क्य-स्मृति की मान्यता थी। और भी, कालिदास ने अपने नाटकों में मृतपति के धन का दायभाग विधवा को नहीं दिया जाता है वह राज-कोष की चीज है, ऐसा वर्णित किया है जो कि मनु, वशिष्ठ, बौधायन और आपस्तम्ब स्मृतिसम्मत है। परन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार विधवा को उसके मृतपति के धन का दायभाग मिलता है—ऐसी व्यवस्था गुप्तकाल में थी। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास शुङ्गवंश के राजाओं के समय में थे न कि गुप्तवंश के राजाओं के समय।
कालिदास अपने आश्रयदाता का स्पष्ट संकेत अपनी रचना में ही करते हैं। जैसे कि शाकुन्तल के प्रारम्भ में सूत्रधार नटी से कहता है 'आर्ये ! रस-भावदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्याऽभिरूपभूयिष्ठा परिषत्। अस्यां च कालिदास-ग्रथितवस्तुना नवेनाऽभिज्ञानशाकुन्तलनामधेयेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः।' पूर्वकाल में आजकल के समान उपाधि के तौर पर नाम का प्रयोग नहीं किया जाता था अतः उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'विक्रमादित्य' का अर्थ—
मालवनरेश खृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में विद्यमान संवत्सर-प्रवर्तक विक्रमादित्य' ही है, न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' उपाधिधारी।
महाकवि को प्रथम शताब्दी ई० पू० सिद्ध करने में उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द भी प्रमाण है। उन्होंने कुमारसंभव के तृतीय सर्ग में एक श्लोक में लिखा है—'त्रियम्बकं संयमिनं ददर्श'
यहाँ पाणिनि व्याकरण के नियम से लोक में 'त्र्यम्बक' प्रयोग ही साधु है और उसी का प्रयोग होना चाहिए था। परन्तु उक्त प्रयोग होने के कारण यह सिद्ध होता है कि कालिदास के समय पाणिनि व्याकरण पूर्ण रूप से लोक में प्रचलित नहीं हो पाया था। इसी तरह उन्होंने 'पातयामास' का जहाँ प्रयोग उचित था वहाँ 'पातयाम्' का पृथक् और 'आस' का पृथक् प्रयोग किया है, जैसे—'तं पातयां प्रथममास पपात पश्चात्'। (रघुवंश, ९ ६१) इत्यादि।
३ मे० भू०