मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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में मनु, वशिष्ठ और आपस्तम्ब ऋषियों की स्मृतियों के आधार पर मृत्युदण्ड का विधान था। जैसा कि 'अँगूठी की चोरी में पकड़े गये मल्लाह को प्राण-दण्ड दिया जाता है।' अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में कालिदास ने ऐसा अभिनीत करवाया है। परन्तु गुप्तकाल में वैसा कठोर दण्ड–चोरी जैसे अपराध के लिए नहीं था। उस समय याज्ञवल्क्य-स्मृति की मान्यता थी। और भी, कालिदास ने अपने नाटकों में मृतपति के धन का दायभाग विधवा को नहीं दिया जाता है वह राज-कोष की चीज है, ऐसा वर्णित किया है जो कि मनु, वशिष्ठ, बौधायन और आपस्तम्ब स्मृतिसम्मत है। परन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार विधवा को उसके मृतपति के धन का दायभाग मिलता है—ऐसी व्यवस्था गुप्तकाल में थी। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास शुङ्गवंश के राजाओं के समय में थे न कि गुप्तवंश के राजाओं के समय।
कालिदास अपने आश्रयदाता का स्पष्ट संकेत अपनी रचना में ही करते हैं। जैसे कि शाकुन्तल के प्रारम्भ में सूत्रधार नटी से कहता है 'आर्ये ! रस-भावदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्याऽभिरूपभूयिष्ठा परिषत्। अस्यां च कालिदास-ग्रथितवस्तुना नवेनाऽभिज्ञानशाकुन्तलनामधेयेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः।' पूर्वकाल में आजकल के समान उपाधि के तौर पर नाम का प्रयोग नहीं किया जाता था अतः उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'विक्रमादित्य' का अर्थ—
मालवनरेश खृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में विद्यमान संवत्सर-प्रवर्तक विक्रमादित्य' ही है, न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' उपाधिधारी।
महाकवि को प्रथम शताब्दी ई० पू० सिद्ध करने में उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द भी प्रमाण है। उन्होंने कुमारसंभव के तृतीय सर्ग में एक श्लोक में लिखा है—'त्रियम्बकं संयमिनं ददर्श'
यहाँ पाणिनि व्याकरण के नियम से लोक में 'त्र्यम्बक' प्रयोग ही साधु है और उसी का प्रयोग होना चाहिए था। परन्तु उक्त प्रयोग होने के कारण यह सिद्ध होता है कि कालिदास के समय पाणिनि व्याकरण पूर्ण रूप से लोक में प्रचलित नहीं हो पाया था। इसी तरह उन्होंने 'पातयामास' का जहाँ प्रयोग उचित था वहाँ 'पातयाम्' का पृथक् और 'आस' का पृथक् प्रयोग किया है, जैसे—'तं पातयां प्रथममास पपात पश्चात्'। (रघुवंश, ९ ६१) इत्यादि।
३ मे० भू०
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इसी प्रकार जहाँ-जहाँ महाकवि ने प्राकृत का प्रयोग किया वहाँ-वहाँ मागधी प्राकृत का ही—जिसका उल्लेख ईसा के पूर्व में प्राप्त होता है।
इस तरह हम निश्चयपूर्वक यह कह सकते हैं कि 'महाकवि कालिदास खृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में हुए थे न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय।'
महाकवि की जन्मभूमि
जन्मसमय की तरह इनकी जन्मभूमि भी विवादास्पद ही है। भिन्न-भिन्न प्रदेश के विद्वान् इन्हें अपने-अपने यहाँ का सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। कश्मीर प्रदेश के विद्वानों का कहना है कि कालिदास ने अपनी रचनाओं में कई बार 'प्रत्यभिज्ञान' शब्द का प्रयोग कर कश्मीर के 'प्रत्यभिज्ञान-शैव सम्प्रदाय' की ओर संकेत किया है; एवं इन्होंने हिमालय का तथा उसमें होने वाले पदार्थों का बहुत ही बारीकी से वर्णन किया है एवं केशर-पुष्प का भी वर्णन किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि कालिदास कश्मीर के रहने वाले थे। बंगाल के विद्वान् इन्हें बंगाल का सिद्ध करते हैं। उनका तर्क कालिदास के नाम पर आधारित है। काली की उपासना बंग देश में अधिक है और कालिदास काली (देवी) के उपासक थे जैसा कि उनके नाम से ही प्रतीत होता है, अतः वे बंगकवि थे ऐसा उनका कहना है। मैथिलों का कहना है कि महाकवि मिथिला के थे। वे लोग महाकवि के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' के चतुर्थ अंक में दर्शायी गई परिपाटी को आधार मानकर उन्हें मैथिल कहते हैं। साथ ही मिथिला के प्रत्येक परिवार में काली-देवी का एक विशेष घर बनाया जाता है जो काली की प्रबल उपासना का द्योतक है, अतः काली के उपासक कालिदास मिथिला के थे, ऐसा सिद्ध करते हैं। वे लोग वर्तमान 'उच्चैठ' गाँव में वर्तमान काली की मूर्ति को ही कालिदास की उपास्या मानते हैं। कई लोग इन्हें मालवा का भी मानते हैं। 'अस्तु'—भारत की भिन्न-भिन्न भूमि इसे अपना पुत्र कहने को उत्सुक हैं; कहती है, परन्तु यह निराला-बच्चा कभी नहीं कहता कि मेरी मां (जन्मभूमि) कौन है। केवल वह अपने धात्री (पालन-पोषण करने वाली) का निर्देश करता है। उज्जयिनीनरेश महाराज विक्रमादित्य की सभा में इनका जीवन निर्वाह हुआ और इनकी रचना में उज्जयिनी के प्रति इनका विशेष अनुराग देखकर (मेघदूत में) हम यह निश्चय करते हैं कि महाकवि की जन्मभूमि भी उज्जयिनी ही रही होगी।
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कालिदास की काव्यकला
कालिदास की रचनाएँ साहित्य जगत् में अपनी शानी नहीं रखतीं। भाव; कल्पना, आदर्श और भाषा की आधार-शिला पर साहित्यकला की जो सुन्दर अट्टालिका का निर्माण महाकवि ने किया है वह दूसरी जगह देखने को नहीं मिलती। कला की आलोचनात्मक अग्नि-परीक्षा में भी इनकी रचनाएँ इतनी खरी, ज्योत्स्नामयी और उत्कृष्ट निकलती हैं कि विश्व की आँखें चकाचौंध में पड़ जाती हैं। इनकी रचनाओं में वाच्य अर्थ की अपेक्षा व्यङ्ग्य अर्थ की प्रधानता पायी जाती है जिसके कारण इनके काव्यों को ध्वनिप्रधान माना गया है—उत्तम माना गया है। काव्यप्रकाशकार मम्मट उत्तमकाव्य का लक्षण लिखते हैं—"इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ्ग्ये वाच्याद् ध्वनिबुंधैः ।" ( काव्यप्रकाश, १-४ )
इनकी रचनाओं का भाव-तत्त्व जिसे साहित्य में रस या काव्य की आत्मा कहा जाता है, कल्पना के विविध उड़ान एवं उदात्त आदर्शों से समन्वित होकर इतना परिपक्व हो जाता है कि सर्वश्रेष्ठ कहलाने लगता है। कालिदास प्रकृति के पक्के पुजारी हैं। परन्तु इनकी प्रकृति जड़ नहीं, अपितु संवेदनशील है, सजीव है। इनकी रचनाओं में क्या तो बड़ा-से-बड़ा पर्वत और क्या तो छोटा-से-छोटा पुष्प सभी अपना-अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व रखते हैं और संवेदनशील हैं। यदि ऐसा न होता तो रघुवंश में दिलीप का जयकार पेड़-पौधे भला किस तरह कर सकते ? शकुन्तला की विदाई पर लताएँ पाण्डुपत्र छोड़कर अपने आँसू कैसे गिराने लगतीं ? कालिदास ने यद्यपि बाह्य-प्रकृति के भी वर्णन में मानव प्रकृति की तरह अन्तरतम स्तर तक घुसकर निश्चित दृष्टि रखी हैं, पर उन्होंने प्रकृति के कोमल, कान्त एवं मधुर पहलू का ही वर्णन किया है—भीषण या भद्दे का नहीं।
कालिदास की शैली साहित्यजगत् में अपना अनुपम स्थान रखती है। इनकी शैली के कारण ही इन्हें विश्व-वन्द्य कवि माना गया है। भद्दा-से-भद्दा या नीरस-से-नीरस कथानक क्यों न हो ये अपनी कल्पना के द्वारा उसका ऐसा मार्मिक एवं चमत्कृति-पूर्ण वर्णन करेंगे कि हृदय आनन्द-सागर में डूबने-सा लगता है। इनकी शैली वैदर्भी है, जिसका लक्षण विश्वनाथ ने लिखा है—
माधुर्य-व्यञ्जकैर्वर्णै रचना ललितात्मिका ।
अवृत्तिरल्पवृत्तिर्वा वैदर्भी रीतिरिष्यते ॥ ( साहित्यदर्पण )
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उपयुक्त सभी बातें कालिदास की रचनाओं में दृष्टिगत होती हैं। ऐसी ललित, परिष्कृत एवं प्रसादगुण-सम्पन्न रचना अन्यत्र दुर्लभ है।
कालिदास की रचना में अलङ्कार का भी दर्शन होता है। ये अलङ्कार आनुषङ्गिक हैं, कालिदास ने इन्हें जबरदस्ती लादने का प्रयास नहीं किया है। उनका तो कहना है— "किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाऽकृतीनाम्”। इन्हें तो उपमा का आचार्य ही माना गया है। कहा भी है 'उपमा कालि-दासस्य' इति। परन्तु उपमा के अतिरिक्त उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, रूपक, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास, स्वभावोक्ति अलङ्कारों की भी कमी इनकी कविता-कामिनी को नहीं है।
संक्षेप में उनकी काव्य-कला की छटा देखें। क्या ही स्वाभाविक एवं मनोरम युक्ति है उनकी—
अवचितबलिपुष्पवेदिसम्मागंर्दक्षा ।
नियमविधिजलानां बर्हिषाञ्चोपनेत्री ॥
वे सौन्दर्य के कवि तो हैं ही, साथ ही साथ उनमें सत्यम् शिवम् की भी गरिमा भरी पड़ी है। सौन्दर्य को सत्यता की कसौटी में परख कर उससे शिवत्व का सन्देश देना कवि के लिए बाएँ हाथ का खेल लगता है। वे कहते हैं—
त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति भ्रूविलासानभिज्ञैः।
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः ॥
त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ता।
प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसन्त्यः ॥
स्वभाव-चित्रण में भी वे उतने ही सिद्धहस्त हैं। उनका प्रत्येक पात्र अपने स्वाभाविक क्षेत्र से ही गुजरता है और कल्पना में भी वह अयथार्थता को नहीं छूता। इतना होने पर भी वे शिष्टता को कभी नहीं छोड़ते। पार्वती के सौन्दर्य-वर्णन में वे कहते हैं।
असम्भृतं मण्डनमङ्गयष्टेर्नासवासवं करणं मदस्य।
कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्त्रं बाल्यात्परं साऽथ वयः प्रपेदे ॥
वे मर्यादा का कुछ-कुछ उल्लङ्घन भी करते हैं तो इतनी चतुराई के साथ कि पाठक को उसका गन्ध तक नहीं आता। पार्वती के विवाह के प्रसङ्ग में उनकी सखी के द्वारा किया गया परिहास इसका उदाहरण है—
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पत्युः शिरश्चन्द्रकलाम्नेन स्पृशेति सख्याः परिहासपूर्वम् ।
सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान ॥
यहाँ कितना गूढ़ एवं शिष्ट परिहास है । यह देखने लायक है । इसी तरह अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् का चरम समन्वय महाकवि की रचनाओं में पाया जाता है । शब्दों को सजाना उनको बहुत रुचिकर है । वे उपमा के एकमात्र सिद्ध कवि माने जाते हैं । उनकी उपमाछटा सहृदयों को मोह लेती है ।
प्रभामहत्या शिखयेव दीपस्त्रिमार्गयेव त्रिदिवस्य मार्गः ।
संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तया स पूतश्च पवित्रितश्च ॥
सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥
उपमा के साथ यमक भी उनका प्रिय अलङ्कार है । रघुवंश में वसन्त वर्णन में इसकी छटा देखने को मिलती है ।
अनुभवन्नवदोलमृतोत्सवं पटुरपि प्रियकण्ठजिघृक्षया ।
अनयदासनरज्जुपरिग्रहे भुजलता जलनामवलाजनः ॥
कुसुमजन्म ततो नवपल्लवास्तदनुषट्पदकोकिलकूजितम् ।
इति यथाक्रममाविरभून्मधुर्द्रुमवतीमवतीर्य वनस्थलीम् ॥
वस्तुस्थिति का वर्णन तो उनका कहना ही क्या ? वे जो भी वस्तु छूते हैं उसमें स्वाभाविकता एवं सौन्दर्य का समावेश करते हैं । देखिए —
त्यजत मानमलं वत विग्रहाः न पुनरेति गतं चतुरं वयः ।
परभृताभिरितीव निवेदिते स्मरमते रमते स्म वधूजनः ॥
मृगया के सम्बन्ध में उन्होंने इस तरह कहा है—
परिचयचललक्ष्यनिपातने भयरुषोश्च तदिङ्गितवेदनम् ।
श्रमजयात्प्रगुणाञ्च करोत्यसौ तनुमतोऽनुमतः सचिवैर्ययौ ॥
कालिदास वैदर्भीरीति के कवि हैं यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रीतियों का भी अच्छा खासा प्रयोग है ।
तथा समक्षं दहता मनोभवं पिनाकिना भग्नमनोरथा सती ।
निनिन्द रूपं हृदयेन पार्वती प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता ॥
उनकी रचनाओं में प्रसाद गुण सर्वत्र व्याप्त है । जैसे—
सा हंसमाला शरदिव गङ्गां महोषधि रत्न इवात्मभासः ।
स्थिरोपदेशामुपदेशकाले प्रपेदिरे प्राक्तनजन्मविद्याः ॥
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कवि को शृङ्गार एवं वीर रस बहुत प्रिय है यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रसों का भी समावेश कम नहीं है। शृङ्गार रस जैसे शाकुन्तल में—
स्निग्धं वीक्षितमन्यतोऽपि नयने यत्प्रेरयन्त्या तया।
यातं यच्च नितम्बयोर्गुरुतया मन्दं विलासादिव ॥
वैसे तो कालिदास की सभी रचनाओं में उदात्त शृङ्गार है ही।
कालिदास की रचनाओं में अर्थान्तरन्यास, स्वभावोक्ति, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलङ्कारों का प्रशस्त प्रयोग पाया जाता है। स्वभावोक्ति की छटा देखिए—
शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादिताद्धिः।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिस्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ॥
एक वनवासी के द्वारा यह कहना कितना सुहावना लगता है।
कालिदास अभिधा के कवि तो कहे जाते हैं लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उनकी रचनाओं में ध्वनि तत्त्व है ही नहीं। इनमें पर्याप्त ध्वनि है अतः इनका काव्य उत्तम काव्य में आता है।
इनकी रचनाओं में भावपक्ष और कलापक्ष का बहुत अच्छा समन्वय दिखाई पड़ता है। वे आर्य्य-संस्कृति के एक सफल उद्घोषक थे परन्तु उनकी रचनाओं में यही नहीं, अपितु विश्वजनीनता ही अधिकतर झलकती है। यही उनकी उच्चता का परिचय है कि वे विश्वजनीन कवि थे और हरेक दृष्टिकोण उनकी आँखों से ओझल नहीं था। दर्शन, संस्कृति, आध्यात्मिकता, सौन्दर्य आदि विविध विषयों पर उनका उदात्त विचार उनकी रचनाओं में मिलता है। इतना सब-कुछ होने पर भी आत्मश्लाघा इनमें जरा-सी भी नहीं थी। वे कहते हैं—
मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवाऽस्ति मे गतिः ।
इसका अर्थ यह नहीं कि वे प्राचीनता के अन्धभक्त थे। वे तो सही अर्थ में सुधारक भी थे। उनका कहना था—
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूखं परप्रत्ययनेव बुद्धिः ॥
कुछ आलोचक कालिदास के कवित्व में यह आरोप लगाते हैं कि वे समस्या तो उभारते हैं लेकिन समाधान प्रस्तुत नहीं करते। यह उन आलोचकों
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की अल्पदृष्टिता से और कुछ नहीं। कालिदास की रचनाओं में सर्वत्र समस्या के साथ समाधान भी दिये हुए हैं। जरूरत है उनको समझ पाने की दृष्टि का। मानव के मन में उठ सकने वाले भावों की चिरन्तनता एवं ऊहापोह को वे इस प्रकार वर्णन करते हैं—
क्व कार्यं शशलक्षणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम्।
किं वक्ष्यन्त्यकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि का खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ॥
यह श्रेय कालिदास को ही जाता है कि संस्कृत-साहित्य विश्वसाहित्य में उच्चतम स्थान पाया हुआ है।
कालिदास की कृतियाँ
वैसे तो कालिदास की रचनाएँ बहुत-सी हैं। जैसे—ऋतुसंहार, कुमारसंभव, रघुवंश, मेघदूत, श्रुतबोध (छन्दोग्रन्थ) शृङ्गारतिलक, नलोदय, नवरत्नमाला, घटकर्परकाव्य, पुष्पबाणविलास, चिद्गमनचन्द्रिका, ज्योतिर्विदाभरण (ज्योतिषग्रन्थ), कुन्तेश्वरदौत्य, अम्बास्तव, कल्याणस्तव, कालीस्तोत्र, काव्यनाटकालंङ्कार; गङ्गाष्टक, चण्डिकादण्डक स्तोत्र, चर्चास्तव, दुर्घटकाव्य, मकरन्दस्तव, मङ्गलाष्टक, महापद्माष्टक, रत्नकोश, राक्षसकाव्य, लक्ष्मीस्तव, लघुस्तव, विद्वद्विनोदकाव्य, वृन्दावनकाव्य, वैद्यमनोरमा, शुद्धचन्द्रिका, शृङ्गाररसाष्टक, शृङ्गारसार काव्य, श्यामलादण्डक, सेतुबन्ध, मालविकाऽग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय एवं अभिज्ञानशाकुन्तल आदि। परन्तु रचनाशैली की विभिन्नता के कारण आलोचकों ने इनमें से कुछ को ही सर्वसम्मत से कालिदास की कृति माना है। सर्वसम्मत से जो रचनाएँ कालिदास की मानी जा चुकी हैं वे हैं—
( १ ) ऋतुसंहार, ( २ ) कुमारसंभव, ( ३ ) रघुवंश, ( ४ ) मालविकाऽग्निमित्र, ( ५ ) विक्रमोर्वशीय, ( ६ ) अभिज्ञानशाकुन्तल तथा मेघदूत।
अब हम इन प्रसिद्ध कृतियों के सम्बन्ध में संक्षिप्त परिचय देते हैं—
( १ ) ऋतुसंहार :— प्रस्तुत रचना कालिदास की प्राथमिक मानी जाती है क्योंकि इसमें वैसी प्रौढि नहीं पायी जाती जैसी कवि की अन्य कृतियों में
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दृष्टिगोचर होती है। इसमें आये पद्य अन्यत्र कहीं लक्षणादिग्रन्थों में उदाहरण के तौर पर नहीं पाये जाते और मल्लिनाथ ने इस पर टीका भी नहीं लिखी है इसीलिए पहले कुछ विद्वान् इसको महाकवि की रचना नहीं मानते थे, परन्तु कतिपय सूक्ष्म प्रमाणों के मिलने पर पुनः इसे उनकी कृति मान लिया गया है। इसमें ग्रीष्म से लेकर वसन्त तक के षट् ऋतुओं का बड़ा ही मनोरम चित्रण छः सर्गों में किया गया है। इसमें १४४ पद्य हैं।
( २ ) कुमारसंभव :—१७ सर्गों का यह महाकाव्य महाकवि की दूसरी रचना मानी जाती है। इसमें कार्तिकेय का जन्म एवं उनके चरित्र का वर्णन ही प्रधान विषय है। इसमें प्रथम सर्ग से लेकर सप्तम सर्ग तक क्रमशः हिमालय पर्वत का वर्णन एवं पार्वती का जन्म, तारकासुर की उच्छृङ्खलता, उसके वध के लिए शिवजी के औरस पुत्र हेतु तपस्या में लीन शिवजी के तपोभङ्ग के लिए देवताओं के द्वारा कामदेव को शिवजी के पास भेजना, उनके तृतीय नेत्र से उत्पन्न अग्नि के द्वारा कामदाह, काम की पत्नी रति का विलाप, रति को सान्त्वना देना, पार्वती की तपश्चर्या और उनका शिवजी से विवाह वर्णित है। अष्टम सर्ग में शिव और पार्वती के काम-केलि का वर्णन है। महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी की टीका यहीं तक उपलब्ध है, अर्वाचीन विद्वान् इसीलिए नवम सर्ग से लेकर अन्त तक के सर्गों की शैली में कालिदास की शैली से भिन्नता होने के कारण भी 'अष्टम' सर्ग तक को ही कालिदास की रचना मानते हैं। परन्तु यह महाकाव्य है और उसका लक्षण है कि 'सर्गाऽष्टाधिका इह' अर्थात् महाकाव्यों को आठ सर्गों से अधिक होना चाहिए। साथ ही आठ सर्ग तक केवल कामकेलि का वर्णन है जो कार्तिकेय के जन्म की भूमिका मात्र है। यदि इसे आठ सर्गों का ही माना जाये तो 'कुमारसंभव' यह नाम भी युक्ति-संगत नहीं हो पायेगा। अतः इसे कालिदास की ही रचना मान लीजिए, या आठ सर्गों तक की रचना महाकवि ने की और नवम से सत्रहवें सर्ग तक की किसी परवर्ती कवि ने की होगी, ऐसा मानना चाहिए।
( ३ ) रघुवंश :—१९ सर्गों का यह महाकाव्य है। इसमें दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक के सूर्यवंश के राजाओं के चरित्र का वर्णन बड़े ही प्रौढ़ एवं मनोरम ढंग से किया गया है। भारतीय संस्कृति का लोकोत्तर चित्रण इसमें
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है। किंवदन्ती है कि इसके पञ्चम सर्ग में सरस्वती का बीजमन्त्र है एवं इस सर्ग के अन्तिम १३ श्लोकों की रचना स्वयं सरस्वती ने की है। कान्तासम्मित उपदेश का यह अनूठा उदाहरण है।
( ४ ) मालविकाग्निमित्र :-पाँच अङ्क का यह रूपक, रूपकरचना में महाकवि की प्रथम कृति है। इसमें तात्कालिक विदिशाधिप राजा अग्निमित्र एवं मालविका के उत्कृष्ट प्रेम का वर्णन बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से किया गया है।
( ५ ) विक्रमोर्वशीय :-यह पाँच अङ्कों का त्रोटक है। इसमें महाभारत की कथा के आधार पर पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम का वर्णन है। इसमें विप्र-लम्भ शृङ्गार का मनोरम ढंग से वर्णन कर ‘न विना विप्रलम्भेन संभोगः पुष्टिमश्नुते’ वाले सिद्धान्त को महाकवि ने और भी पुष्ट किया है। महाकवि ने अपने आश्रयदाता का संकेत इसके नामकरण से किया है।
( ६ ) अभिज्ञानशाकुन्तल :-यह संस्कृत साहित्य में ही नहीं अपितु विश्वसाहित्य में अद्वितीय नाटक है। इसमें सात अङ्क हैं। इसमें महाभारत के कथानक के आधारपर चन्द्रवंशी महाराज दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम का वर्णन है। कहा जाता है कि विश्वसाहित्य में कालिदास अद्वितीय हैं और उनकी रचनाओं में शाकुन्तल उत्कृष्ट है और इसमें भी चौथा अङ्क उत्कृष्ट है और उस अङ्क में निम्नलिखित चौथा श्लोक हृदयस्पर्शी है, जो वास्तविक हैं और सहृदय-संवेद्य है। जैसे—
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संश्लिष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भित-बाष्प-वृत्ति-कलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनया विश्लेषदुःखैर्नवैः॥
अर्थात् (कण्व कह रहे हैं) आज शकुन्तला (अपने पति-गृह) चली जायगी यह सोचकर ही उत्कण्ठा के कारण मेरा हृदय भरा-सा जा रहा है, गला रुँधा-सा जा रहा है और आँसुओं से परिप्लुत आँखों से देखा नहीं जाता। स्नेह के कारण (धर्मपुत्री के लिए) यदि मुझ जैसे वनवासी को भी इतनी विकलता है तो फिर भला जो गृहस्थ अपनी औरस पुत्री को विदा करता होगा उसे कितना कष्ट होता होगा। सम्भवतः कालिदास की ऐसी ही रचना को देखकर पाश्चात्य कवि गेटे ने कहा था—
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वासन्तं कुसुमं फलं च युगपद्ग्रीष्मस्य सर्वं च यद् ।
यच्चान्यन्मनसो रसायनमतः सन्तर्पणं मोहनम् ॥
एकीभूतमभूतपूर्वमथवा स्वर्लोकभूलोकयो-
रैश्वर्यं यदि वाञ्छसि प्रियसखे ! शाकुन्तलं सेव्यताम् ॥
इसमें कालिदास ने आर्यनारी के पातिव्रत्य को विरहाग्नि में तपाकर कुन्दन-सा चमकाकर उसकी महत्ता का चूडान्त निदर्शन किया है।
मेघदूत
काव्य दो प्रकार का होता है—( १ ) महाकाव्य, ( २ ) खण्डकाव्य । महाकाव्य एक विस्तृत-प्रबंधकाव्य होता है, जैसे रघुवंश, कुमारसंभव आदि । खण्डकाव्य, इसमें पूर्ण जीवन वृत्तान्त नहीं होता अपितु जीवन के एक भाग का वर्णन होता है । प्रकृति में मेघदूत वैसा ही एक खण्डकाव्य है इसे लोग 'गीतिकाव्य' भी कहते हैं ।
यह संस्कृत साहित्य के गीतिकाव्यों में सर्वप्रथम गिना जाने वाला है । कला का चरमपरिपाक, कल्पना की ऊँची उड़ान, परिष्कृत मधुरिमामयी सरस भाषा, विषय की अक्षुण्णगति एवं छन्द की एकतानता का जो समन्वय कालिदास की इस कृति में पाया जाता है वैसा संसार में अन्यत्र मिलना दुर्लभ क्या असंभव ही है । इसका वर्ण्य विषय अत्यन्त मर्मस्पर्शी है । इसमें दो भाग हैं, पूर्व एवं उत्तर ।
कोई यक्ष अपनी नवोढा प्रिया के प्रणयपाश में उलझकर अपने कर्त्तव्य में प्रमाद कर जाता है, अतः स्वामी कुबेर के कोप का भाजन ही नहीं शाप का पात्र भी बन जाता है । इस तरह वह यक्ष प्रभु कुबेर के शाप से अपनी भूमि अलकापुरी से निर्वासित होकर एक वर्ष के लिए रामगिरि-पर्वत पर रहता है । पूर्वमेघ में इसी यक्ष की करुण कहानी है ।
पूर्वमेघ :—अपनी प्राणेश्वरी के विरह में कृश, कामुक वह यक्ष आषाढ़ मास के प्रारम्भ में मेघ को देखकर जड़-चेतन के विवेक से शून्य-सा होकर उससे अपनी प्रिया के पास संदेश ले जाने के लिए कहता है । पहले मेघ की प्रशंसा करता है, अलकापुरी जाने के लिए उसे रास्ते में कहाँ-कहाँ जाना होगा, इन सबका वर्णन पूर्वमेघ में जिस ढंग से किया है वैसा तो कोई भी कवि
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आज तक नहीं कर सका। अलकापुरी के रास्ते में मेघ को कहीं तो भोली-भाली ग्रामीण युवतियों की आनन्दभरी कटाक्षरहित आशान्वित आँखें पीयेंगी तो कहीं वह अपने गर्जन से आकाश में उड़ती बलाकाओं को गिनती हुई सिद्धवनिताओं को डराकर उनके द्वारा अपने प्रियों का आलिङ्गन करवाकर उनके धन्यवाद का पात्र बनेगा। आगे वह उज्जयिनी में महाकालेश्वर का दर्शन करेगा एवं अपनी विद्युत् के द्वारा अभिसारिकाओं को केवल मार्ग ही दिखायेगा—गरजकर उन्हें डरायेगा नहीं। इसके बाद ज्ञातास्वाद रसिक की तरह वह मेघ विवृत-जघना नायिका के समान गम्भीरा नदी का रसास्वाद करेगा। इस प्रकार वह ब्रह्मावर्त, क्रौंचपर्वत आदि मार्गों का अतिक्रमण कर अलका में पहुँचेगा।
उत्तरमेघ :—मेघ उस अलका में पहुँचेगा जहाँ की लड़कियाँ रत्नों को धूल में छिपा-छिपाकर आंखमिचौनी खेला करती हैं, जहाँ की कामिनियाँ अपने को विवस्त्रा होती देखकर लज्जा से चूर्णमुष्टियों से मणिदीपों को बुझाना तो चाहती हैं पर बुझा नहीं पातीं और जहाँ के राजमार्ग प्रातःकाल अभिसारिकाओं के कानों से गिरे कनक-कमल धागे के टूट जाने से बिखरी हुई मालाएँ और पैरों से कुचले हुए मन्दार पुष्पों के द्वारा उनके अभिसरण की सूचना देते हैं। तदनन्तर यक्ष, मेघ से अपने निवास स्थान का सरस एवं विलासपूर्ण वर्णन करता है तथा तन्वी अपनी प्रिया की जो स्त्रियों के सम्बन्ध में विधाता की सर्वप्रथम सृष्टि है विरहविदग्ध क्लान्तदशा का बड़ा ही हृदयस्पर्शी वर्णन करता है। अन्त में यक्ष मेघ से अपनी प्रिया के लिए वह सन्देश कहता है जिससे सहृदयों का हृदय करुणा एवं आनन्द के अपारसागर में निमग्न हो जाता है, जिसमें कालिदास ने अपने प्रेमी की भावना को भर दिया है।
मेघदूत का उद्गम
कालिदास की कृतियों के प्रसिद्ध टीकाकार महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने मेघदूत का उपजीव्य रामायण माना है 'सीतां प्रति रामस्य हनुमत्सन्देशं मनसि निधाय मेघदूत-संदेशं कविः कृतवानित्याहुः' अर्थात् कालिदास ने वाल्मीकि-रामायण में भगवान् रामचन्द्र ने सीताजी के लिए हनूमान् को जो संदेश दिया था उसी को मन में रखकर 'मेघदूत' इस गीतिकाव्य की रचना
( ३२ )
की। मेघदूत में आये 'जनकतनया-स्नान-पुण्योदकेषु' 'रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु' 'दशमुखभुजोच्छ्वासितप्रस्थसन्धेः' एवं 'इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा' इत्यादि पद्यांश महामहोपाध्याय की शक्ति को और प्रबल बनाते हैं। मेघदूत के कथानक का उद्गम संभवतः ब्रह्मवैवर्तपुराण का वह स्थल है जहाँ 'भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से 'आषाढ कृष्ण पक्ष की 'योगिनी' नामक एकादशी के माहात्म्य को कहा है।' माहात्म्य इस प्रकार है—
‘अलकाऽधिपतिर्नाम्ना कुबेरः शिवपूजकः । तस्यासीत् पुष्पबटुको हेममालीति नामतः ॥ तस्य पत्नी सुरूपाऽऽसीद्विशालाक्षीति नामतः । स तस्यां स्नेहसंयुक्तः कामपाशवशंगतः ॥ मानसात् पुष्पनिचयमानीय स्वगृहे स्थितः पत्नीप्रेमसमायुक्तो न कुबेरालयं गतः ॥ कुबेरो देवसदने करोति शिवपूजनम् । मध्याह्नसमये राजन् पुष्पाणि प्रसमीक्षते ॥ हेममाली स्वभवने रमते कान्तया सह । यक्षराट् प्रत्युवाचाऽथ कालाऽतिक्रमकोपितः ॥ ‘कस्मान्नायाति भो यक्षा, हेममाली दुरात्मवान् । निश्चयः क्रियतामस्य’ प्रत्युवाच पुनः पुनः ॥
यक्षा ऊचुः
‘वनिता कामुको गेहे रमते स्वेच्छया नृप’ । तेषां वाक्यं समाकर्ण्य कुबेरः कोपपूरितः ॥ आह्वयामास तं तूर्णं बटुकं हेममालिनम् । ज्ञात्वा कालाऽत्ययं सोऽपि भयव्याकुललोचनः ॥ आजगाम नमस्कृत्य कुबेरस्याऽग्रतः स्थितः । तं दृष्ट्वा धनदः क्रुद्धः कोपसंरक्तलोचनः ॥ प्रत्युवाच रुषाविष्टः कोपाद्विस्फुरिताऽधरः ।
कुबेर उवाच
रे पाप ! दुष्ट ! दुर्वृत्त ! कृतवान्देवहेलनम् ॥ अतो भव श्वित्रयुक्तो वियुक्तः कान्तया सह ।
( ३३ )
अस्मात्स्थानादपध्वस्तो गच्छस्यानमथाऽधमम् ॥
इत्युक्ते वचने तेन तस्मात् स्थानात् पपात सः।
अर्थात् “अलका के स्वामी यक्षराज कुबेर शिवजी के भक्त थे। वे प्रतिदिन भगवान् शिव की पूजा करते थे। पूजा के लिए फूल तोड़कर लाने वाला कुबेर का अनुचर 'हेममाली' नाम का था। उसकी पत्नी अत्यन्त सुन्दर रूप वाली 'विशालाक्षी' नाम की थी। एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल तोड़कर कुबेर के यहाँ न पहुँचाकर अपने घर ही अपनी प्रिया के पास रह गया। उधर दोपहर में शिवजी की पूजा पर बैठे कुबेर फूल की प्रतीक्षा कर रहे थे। समय के बीत जाने पर क्रुद्ध होकर उन्होंने दूसरे सेवकों से जब पूछा कि 'हेममाली क्यों नहीं आया, पता लगाओ ?' तो यक्षों ने कहा कि 'वह अपने घर अपनी प्रिया के साथ विहार कर रहा है'। इसे सुनकर कुबेर आग-बबूला हो गये और तुरन्त यक्ष को बुलवाया। यक्ष ने भी कुबेर की बुलाहट जब सुनी तब उसे अपना कार्य स्मरण आया फिर क्या ? डर के मारे वह थरथराता हुआ कुबेर के सामने प्रणाम कर एवं हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। तब कुबेर ने यह कहकर कि तुमने जिस प्रिया के प्रणय-पाश में आबद्ध होकर देवता का निरा-दर किया है, उस प्रिया से एक वर्ष के लिए वियुक्त हो जाओ एवं हमारे इस अलकापुरी से गिर कर नीचे के लोक में जाओ।' कुबेर के ऐसा शाप देने पर वह यक्ष वहाँ से गिर पड़ा। मेघदूत के कथानक का मूल तो यह है ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु कालिदास ने अपनी कल्पना-प्रसूत सृष्टि-नैपुण्य से जो कलेवर इसे प्रदान किया है उसके कारण कवि की यह कृति मौलिक हो गयी है, यह कहने से हम नहीं चूक सकते।
मेघदूत का वैशिष्ट्य — कल्पना का विविध विलास, भावों की कोमल व्यञ्जना तथा माधुर्य के सतत प्रवाह का अनुपम समन्वय होने के कारण मेघ-दूत ने, महाकवि को, जो प्रतिष्ठा रघुवंश एवं कुमारसंभव से मिली, उसमें चार-चांद लगा दिया। मेघदूत वस्तुतः विरह-पीड़ित मानव का सम्पूर्ण अन्तर्जगत् आशा हो या निराशा, हर्ष हो या विषाद सब भावों को हमारे सामने खड़ा कर देता है। मेघदूत के प्रतिश्लोक के हर एक शब्द में विरह-पीड़ित हृदय की कसक और सूक्ष्म धड़कन सुनाई देती है। कवि ने उसके उपयुक्त मन्दाक्रान्ता छन्द का भी उपयोग किया है। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने—
( ३४ )
'निसृष्टार्थो मितार्थश्च तथा सन्देशहारकः । कार्यप्रेष्यस्त्रिधा दूतो दूत्यश्चापि तथाविधाः ॥' (३-५८)
यह लिखकर दूत के तीन भेद माने हैं—(१) निसृष्टार्थ, (२) मितार्थ, (३) सन्देशहारक । अब हम तीनों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
(१) निसृष्टार्थ—विश्वनाथ ने इसके सम्बन्ध में लिखा है— "उभयोर्भावमुन्नीय स्वयं वदति चोत्तरम् । सुश्लिष्टं कुरुते कार्यं निसृष्टार्थस्तु स स्मृतः ॥"
अर्थात् निसृष्टार्थ दूत वह है जो दोनों—( ३-५९ ) पक्षों (जिसने भेजा एवं जिसके पास भेजा ) के भावों को जानकर स्वयं संन्देश कहे और पूछे जाने पर वैसा ही उपयुक्त उत्तर भी दे और कार्य को सफल करे ।
( २ ) मितार्थ—'मितार्थभासी कार्यस्य सिद्धकारी मितार्थकः' (साहित्य दर्पंण, ३-६०) अर्थात्—जो दूत कम बोलकर कार्य सिद्ध कर दे उसे मितार्थ-भाषी कहते हैं ।
( ३ ) सन्देशहारक—'सन्देशहारक' वह दूत है जो भेजने वाले व्यक्ति के द्वारा जितना ही कहा जाय उसी वाक्य को वह वहाँ कहे । जैसा कि विश्वनाथ लिखते हैं—
'यावद्भाषितसन्देशहारः सन्देशहारकः' ॥ ( सा० द०, ३-७० )
वाल्मीकि-रामायण में राम के सन्देश को सीता के पास पहुँचाने वाले श्री हनुमान् जी 'निसृष्टार्थ' दूत हैं, इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में रुक्मिणी के संदेश को भगवान् श्रीकृष्ण के पास पहुँचाने वाले ब्राह्मण भी निसृष्टार्थ दूत हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल का 'मिश्रकेशी' मितार्थदूती है । मालतीमाधव में नन्दन से भेजा गया पुरुष 'सन्देशहारक' दूत है ।
प्रकृत प्रबन्ध में महाकवि ने मेघ का ऐसा चित्रण किया है कि वह उपर्युक्त तीनों दूतों में से किसी में भी अन्तर्भूत नहीं हो सकता । क्योंकि सन्देश पहुँचाने वाले दूत के लिए चाहे वह जिस श्रेणी का दूत हो चेतन होना आवश्यक है । अन्यथा वह वक्ता के भाव को कैसे समझ सकता है । प्रस्तुत काव्य का दूत तो 'धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः' है । परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि साधारण व्यक्ति प्रायः ( सन्देशहारक ) अभिधावृत्ति से अपने अभिप्राय का प्रतिपादन कर अपना पिंड छुड़ा लेता है, वहाँ मध्यम प्रतिभा
( ३५ )
वाला ( मितार्थ ) 'लक्षणावृत्ति' के द्वारा अपने भावों को लक्षित कराकर कार्यनिष्पन्न करता है। परन्तु अद्भुत प्रतिभा-सम्पन्न परिपक्व विचारवाला ( निसृष्टार्थ ) दूत, लक्षणा से भी ऊपर उठकर व्यञ्जना वृत्ति के द्वारा अपने वक्तव्य को अभिव्यक्त करता है।
प्रकृत में महाकवि कालिदास ध्वनिकवि हैं। व्यङ्ग्यप्रधानवाक्य ही 'ध्वनि' कहलाता है। महाकवि ने इसीलिए प्रस्तुत रचना में व्यञ्जनावृत्ति के द्वारा संदेश अभिव्यक्त कराकर अपनी अद्भुत कल्पना का चमत्कार दिखलाया है।
मेघदूत की अमरवाणी
( १ ) 'मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्तिचेतः कण्ठाऽऽश्लेष-प्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे' ? [ १-३ ] ( २ ) 'कामार्ता हि प्रकृति-कृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु । [ १-५ ] ( ३ ) 'याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाऽधमे लब्धकामा । [ १-६ ] ( ४ ) 'आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्यःपाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि' । [ १-१० ] ( ५ ) 'न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृताऽपेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः' । [ १-१७ ] ( ६ ) 'रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय' । [ १-२० ] ( ७ ) 'स्त्रीणामाद्यं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु' । [ १-२८ ] ( ८ ) 'मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेताऽर्थकृत्या' । [ १-३८ ] ( ९ ) 'ज्ञाताऽऽस्वादो विवृतजघनां को विहातुं समर्थः' । [ १-४१ ] ( १० ) 'आपन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम् । [ १-५३ ] ( ११ ) 'के वा न स्युः परिभवपदं निष्फलाऽऽरम्भयत्नाः' । [ १-५४ ] ( १२ ) 'सूर्याऽपाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम्' । [ २-१९ ] ( १३ ) 'प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरार्द्राऽन्तरात्मा' । [ २-३२ ] ( १४ ) 'कान्तोदन्तः सुहृदुपगतः सङ्गमात्किञ्चिदूनः' । [ २-३९ ] ( १५ ) 'कस्याऽत्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण' । [ २-४८ ] ( १६ ) स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्ते त्वभोगा दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति' । [ २-५१ ] ( १७ ) प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सिताऽर्थ-क्रियैव । [ २-५३ ]
( ३६ )
आभार
रचना में उन व्यक्तियों के प्रति जिनसे लेखक लाभान्वित होता है लेख के माध्यम से आभार प्रदर्शन एक प्रथा है जिसका मैं निर्वाह कर रहा हूँ नहीं तो परम पूज्य गुरुवर पं० श्री कीर्त्यानन्द झा जी (न्याय प्रवक्ता का० हि० वि० वि०) के लिए भी मेरे पास कोई ऐसा शब्द हो सकेगा जिसके माध्यम से उनका आभार व्यक्त कर सकूँ ? सच्ची कृतज्ञता तो हृदय से होती हैं। मेघदूत की इस इन्दुकलाटीका में जो कुछ भी लिख सका हूँ वह सब पूज्य गुरुजी के कारण ही। अतः श्री चरण में शतकोटि प्रणाम करता हुआ आशा करता हूँ कि आगे भी इसी प्रकार आपके वात्सल्य की सुखद छाया हमें मिलती रहेगी।
अग्रज रूप पं० श्री हरेकान्त जी मिश्र का भी मैं परम आभारी हूँ जिनके सुन्दर पथ-प्रदर्शन के कारण ही मैं इस टीका को पूर्ण कर सका हूँ। सतीर्थ्य श्री बौआनन्द जी.झा एवं श्री राधारमण ठाकुर जी का भी उपकृत हूँ। अतः हृदय से आभारी हूँ। एवं जिनके वस्तुतत्त्वनिर्देशन एवं सदुत्साहवर्द्धन के कारण ही यह टीका सम्पूर्ण हो सकी और जिनके अमोघ आशीर्वाद का मैं आजीवन अभिलाषी हूँ उन पूज्य गुरुचरण पं० श्री रतिनाथ झा (रीडर का० हि० वि० वि०) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के अतिरिक्त मैं क्या निवेदन कर सकता हूँ ?
अन्त में प्रकाशक महोदय का भी आभारी हूँ जिनके सदुत्साहपूर्ण प्रेरणा के कारण ही, मैं सरस्वती की इस उपासना में लग सका हूँ। यद्यपि मेघदूत की अन्य बहुत-सी टीकाएँ उपलब्ध हैं परन्तु मैंने अपनी इस टीका में उन सब अभावों की पूर्ति का प्रयास किया है जिनका अन्य टीकाओं में अभाव रहा है या कठिनाई रही है। टीका के शब्द प्रायः सरल हैं, अतः यदि इसके माध्यम से छात्र-गण थोड़ा भी लाभान्वित हो सकेंगे तो मैं अपने परिश्रम को सफल समझूँगा। इस टीका में कतिपय अन्य टीका एवं ऐतिहासिक ग्रंथों की सहायता मुझे लेनी पड़ी है, अतः उन सब के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ।
प्रकाशन की भूल से या मेरे मतिभ्रम से यदि टीका में किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो तो—इस रीति से क्षमा करेंगे।
'गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः,
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
ग्राम—अलपुरा, पो०—रतुपाड़ (ताजपुर)
अनु०—झंझारपुर, जि०—मधुबनी (बिहार)
विनीत
—वैद्यनाथ झा
श्लोकानुक्रमणिका
पूर्वमेघः
| श्लोक | श्लो० | पृ० | श्लोक | श्लो० | पृ० |
|---|---|---|---|---|---|
| अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः० | १४ | ३७ | त्वन्निष्यन्दोच्छ्वसति-वसु० | ४२ | १०५ |
| अप्यन्यस्मिञ्जलधर ! म० | ३४ | ८९ | त्वय्यादातुं जलमवनते शा० | ४६ | ११६ |
| अम्भोविन्दुग्रहणचतुरांश्च० | ५५ | त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति० | १६ | ४३ | |
| आपृच्छस्व प्रियसखममुं० | १२ | ३३ | त्वामारूढं पवनपदवीमुद्० | ८ | २४ |
| आराध्यैनं शरवणभवं देव० | ४५ | ११४ | त्वामासार-प्रशमित-वनो० | १७ | ४५ |
| आसीनानां सुरभितशिलं० | ५२ | १३८ | दोर्घीकुर्वन्पटुमदकलं कू० | ३१ | ७७ |
| उत्पश्यामि त्वयि तटगते० | ५० | १४७ | धूमज्योतिः सलिलमरुतां० | ५ | १५ |
| उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे० | २२ | ५७ | नीचैराख्यं गिरिमधिवसे० | २५ | ६३ |
| कर्तुं यच्च प्रभवति महीमु० | ११ | ३१ | नीपं दृष्ट्वा हरितकपिशं० | २१ | ५३ |
| कश्चित्कान्ता-विरहगुरुणा० | १ | १ | (पत्रश्यामा दिनकरहयस्प०) | ८४ | |
| गच्छन्तीनां रमणवसतिं० | ३७ | ९७ | पश्चादुच्चैर्भुज-तरुवनं म० | ३६ | ९४ |
| गत्वा चोर्ध्वं दशमुखभुजो० | ५८ | १४५ | पाण्डुच्छायोपवनवृतयः के० | २३ | ५९ |
| गम्भीरायाः पयसि सरित० | ४० | १०३ | पादन्यासैः क्वणित-रश० | ३५ | ९२ |
| छन्नोपान्तः परिणतफल० | १८ | ४६ | प्रत्यासन्ने नभसि दयिता० | ४ | १३ |
| जातं वंशे भुवन-विदिते० | ६ | १८ | (प्रद्योतस्य प्रियदुहितरं व०) | ८२ | |
| जालोद्गीर्णैरुपचितवपु० | ३२ | ८५ | प्राप्यावन्तीनुदयनकथा-को० | ३० | ७५ |
| ज्योतिर्लेखावलयि गलितं० | ४४ | ११२ | प्रालेयाद्रेरुप-तटमति-क्र० | ५६ | १४२ |
| तं चेद्वायौ सरति सरल० | ५३ | १३३ | ब्रह्मावतं जनपदमथच्छा० | ४८ | १२१ |
| तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्या० | ५५ | १३८ | भर्तुः कण्ठच्छविरितिगणैः० | ३३ | ८७ |
| तत्र स्कन्दं नियतवसतिं० | ४३ | ११० | मन्दं मन्दं नुदति पवन० | ९ | २७ |
| तत्रावश्यं वलयकुलिशोद्० | ६१ | १५१ | मार्गं तावच्छृणु कथयत० | १३ | ३५ |
| तस्मात् गच्छेरनुकनखलं० | ५० | १२६ | ये संरम्भोत्पतनरभसाः० | ५४ | १३६ |
| तस्मिन्काले नयनसलिलं० | ३९ | १०१ | रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इ० | १५ | ४१ |
| तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबला० | २ | ६ | वक्रः पन्था यदपि भवतः० | २७ | ६८ |
| तस्य स्थित्वा कथमपि पुर० | ३ | १० | विश्रान्तः सन्ब्रज वनन० | २६ | ६६ |
| तस्याः किञ्चित्करधृतमि० | ४१ | १०८ | वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रे० | २८ | ७१ |
| तस्याः पातुं सुरगज इव० | ५१ | १२१ | वेणी-भूतप्रतनु-सलिला० | २९ | ७३ |
| तस्यास्तिक्तैर्वनगजमदैर्वा० | २० | ५१ | शब्दायन्ते मधुरमनिलैः० | ५६ | १४० |
| तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव० | ६३ | १५५ | सन्तप्तानां त्वमसि शरणं० | ७ | २१ |
| तां कस्यांचिद्भवन-वलभौ० | ३८ | ९९ | स्थित्वा तस्मिन्वनचर० | १९ | ४८ |
| तां चावश्यं दिवसगणनात्० | १० | २९ | (हारांस्तारांस्तरलगुटिका०) | ८० | |
| तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रू० | ४७ | ११९ | हित्वा तस्मिन् भुगज-व० | ६० | १४९ |
| तेषां दिक्षु प्रथितविदिशा० | २४ | ६१ | हित्वा हालामभिमतरसां० | ४९ | १२३ |
| हेमाम्भोजप्रसवि सलिलं० | ६२ | १५३ |
४ मे० दू०
उत्तरमेघः
| श्लोक-प्रतीक | श्लो० | पृ० | श्लोक-प्रतीक | श्लो० | पृ० |
|---|---|---|---|---|---|
| अक्ष्यान्तर्भवन-निधयः प्र० | ८ | १७९ | नीवीबन्धोच्छ्वसितशिथि० | ५ | १७२ |
| अङ्गेनाङ्गं प्रतनु तनुना० | ३९ | २५४ | नूनं तस्यां प्रबलरुदितो० | २१ | २१० |
| आद्ये बद्धा विरहदिवसे या० | २९ | २३१ | नेत्रा नीतोः सततगतिना० | ६ | १७४ |
| आधिक्षामां विरहशयने स० | २६ | २२४ | पादानिन्दोरमृतशिशिरा० | २७ | २२६ |
| (आनन्दोत्थं नयनसलिलं०) | १६५ | भर्तुर्मित्रं प्रियमविधवे ! वि० | ३६ | २४७ | |
| आलोके ते निपतति पुरा० | २२ | २१३ | भित्त्वासद्यः किसलयपुटा० | ४४ | २६५ |
| आश्वास्यैवं प्रथमविरहोद० | ५० | २८० | भूयश्चाहं त्वमपि शयने० | ४८ | २७४ |
| इत्याख्याते पवनतनयं मै० | ३७ | २४९ | मत्वा देवं धनपतिसखं य० | १० | १८३ |
| उत्सङ्गे वा मलिनवसने० | २३ | २१६ | मन्दाकिन्याः सलिल-शि० | ४ | १७० |
| एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रा० | ५२ | २८५ | मामाकाशप्रणिहितभुजं० | ४३ | २६३ |
| एतस्मान्मां कुशलिनमभि० | ४९ | २७६ | यत्र स्त्रीणां प्रियतमभुजा० | ७ | १७७ |
| एभिः साधो हृदयनिहि० | १७ | २०० | (यत्रोन्मत्तभ्रमरमुखराः०) | १६३ | |
| कच्चित्सौम्य ! त्ववसि० | ५१ | २८२ | यस्यां यक्षाः सितमणिम० | ३ | १६७ |
| गत्युत्कम्पादलकपतितैर्य० | ९ | १८१ | रक्ताशोकश्चलकिसलयः० | १५ | १९५ |
| गत्वा सद्यः कलभतनुतां० | १८ | २०२ | रुद्धापाङ्गप्रसरमलकैरञ्ज० | ३२ | २३८ |
| जाने सख्यास्तव मनः म० | ३१ | २३६ | वापी चास्मिन् मरकत० | १३ | १९० |
| (तं सन्देशं जलधरवरो ) | २८८ | वामश्चास्याः कररुहपदैर्मु० | ३३ | २४० | |
| तत्रागारं धनपतिगृहानुत्त० | १२ | १८८ | वासश्चित्रं मधु नयनयो० | ११ | १८६ |
| तन्मध्ये च स्फटिकफलका० | १६ | १९७ | विद्युत्वन्तं ललित-वनि० | १ | १५८ |
| तन्वी श्यामा शिखरिदश० | १९ | २०४ | शब्दाख्येयं यदपि किलः० | ४० | २५६ |
| तस्मिन् काले जलद ! यदि० | ३४ | २४३ | शापान्तो मे भुजगशयना० | ४७ | २७१ |
| तस्यास्तीरे रचितशिखरः० | १४ | १९२ | शेषान्मासान्विरहदिवस्था० | २४ | २१९ |
| तां जानीथाः परिमितक० | २० | २०७ | श्यामास्वङ्गं चकितहरि० | ४१ | २५८ |
| तामायुष्मन्म च वचना० | ३८ | २५२ | (श्रुत्वाबातांजलदकवितां०) | २९० | |
| तामुप्याप्य स्वजलकणिका० | ३५ | २४५ | संक्षिप्यते क्षण इव कथं० | ४५ | २६७ |
| त्वामालिख्य प्रणयकुपितां० | ४२ | २६१ | सव्यापारामहनि न तथा० | २५ | २२१ |
| नन्वात्मानं बहु विगणय० | ४६ | २६९ | सा संन्यस्ताभरणमबला० | ३० | २३३ |
| निःश्वासेनाधरकिसलयक० | २८ | २२८ | हस्ते लीलाकमलमलके० | २ | १६० |
॥ श्रीः ॥
मेघदूतम्
'इन्दुकला' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्
अथ पूर्वमेघः
कश्चित् कान्ता-विरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः ।
यक्षश्चक्रे जनक-तनया-स्नान-पुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ॥ १ ॥
अन्वयः—स्वाधिकारात् प्रमत्तः कान्ताविरहगुरुणा वर्षभोग्येण भर्तुः शापेन अस्तङ्गमितमहिमा कश्चित् यक्षः जनक-तनया-स्नानपुण्योदकेषु स्निग्धच्छाया-तरुषु रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्रे।
व्याख्या—स्वाधिकारात् = निजकर्तव्यात्, प्रमत्तः = असावधानः, कान्ता-विरहगुरुणा = प्रेयसीवियोगदुःसहेन, वर्षभोग्येण = संवत्सराप्येन, भर्तुः = स्वामिनः कुबेरस्येति यावत्, शापेन = दुरेषणया, अस्तङ्गमितमहिमा = अक्षम-महत्त्वः, कश्चित् = अकथ्यनामा, यक्षः = गुह्यकः, जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु = सीतामज्जनपूतजलेषु, स्निग्धच्छायातरुषु = सान्द्रच्छायावृक्षेषु, रामगिर्याश्रमेषु = रामगिरिनामकपर्वताश्रमेषु, वसतिं = वासं, चक्रे = चकार।
शब्दार्थः—स्वाधिकारात् = अपने कर्तव्य से, प्रमत्तः = असावधान, कान्ता-विरहगुरुणा = प्रेयसी के वियोग से दुःसह, वर्षभोग्येण = (एक) वर्ष तक भोगे जाने वाले, भर्तुः = मालिक (कुबेर) के, शापेन = शापसे, अस्तंगमितमहिमा = जिसकी महिमा मलिन (असमर्थ) बना दी गयी है, यक्षः = गुह्यक "एक
२ | मेघदूतम्
देवयोनिविशेष," जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु = सीता जी के स्नान करने के कारण पवित्र हो गया है जल जहाँ का, स्निग्धच्छायातरुषु = घने छाया वाले वृक्ष हैं जहाँ पर, ( ऐसे ) रामगिर्याश्रमेषु = रामगिरि नामक पर्वत के आश्रमों में ' वसति = अपना निवास, चक्रे = बनाया।
**भावार्थ:—**स्वकर्तव्ये असावधानः कश्चिदज्ञातनामधेयो यक्षः, स्वामिनः कुबेरस्य प्रियावियोगरूपैकवर्षभोग्यात् शापात्, (तमभिशप्तसमयमतिवाहयितुम्) गहनच्छायायुक्तवृक्षेषु "रामगिरि" पर्वतकुटीरेषु स्वनिवासं कृतवान् ।
**हिन्दी—**अपने कर्तव्य में असावधानी करने वाले, ( अत एव ) अपनी प्रियतमा के वियोग के कारण दुःसह एवं एक वर्ष तक भोगे जाने वाले स्वामी कुबेर के शाप से असमर्थ महिमावाले, किसी यक्ष ने, "रामगिरि" नामक पर्वत के आश्रमों में अपना निवासस्थान बनाया ।
**समास:—**कान्ताविरहगुरुणा = कान्तायाः विरहः कान्ताविरहः ( ष० तत् ० ) कान्ताविरहेण गुरुः ( तृ० तत् ० ) कान्ताविरहगुरुस्तेन कान्ताविरहगुरुणा । स्वाधिकारात् = स्वस्य अधिकारः स्वाधिकारः ( ष० तत् ०) अथवा स्वः अधिकारः = स्वाधिकारः ( कर्मधारय ) । अस्तंगमितमहिमा = अस्तंगमितो महिमा यस्य ( बहुव्रीहि ) स अस्तंगमितमहिमा । वर्षभोग्येण = वर्षं भोग्यः वर्षभोग्यः, यहाँ पर वर्ष के आगे जो द्वितीया विभक्ति है वह "कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से विहित है; पश्चात् "अत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से समास किया गया है । जनकतनयायाः स्नानं = जनकतनयास्नानम् ( ष० तत् ० ) जनकतनयास्नानैः पुण्यानि उदकानि येषु ( बहुव्री० ) जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । स्निग्धच्छायातरुषु = स्निग्धा च सा छाया स्निग्धच्छाया (कर्मधारय), यहाँ पर "पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु" इस सूत्र से "स्निग्धा" इस स्त्रीवाचक शब्दको पुंवद्भाव होकर स्निग्ध ऐसा रूप बना; पश्चात् तुगादि करके स्निग्धच्छाया ऐसा प्रयोग बनाया जाता है । स्निग्धच्छाया प्रधानास्तरवो येषु स्निग्धच्छायातरुषु,यहाँ पर "शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपश्च" इस वार्तिक से "प्रधान" इस मध्यम पद का लोप कर समास किया गया है ।