मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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आभार
रचना में उन व्यक्तियों के प्रति जिनसे लेखक लाभान्वित होता है लेख के माध्यम से आभार प्रदर्शन एक प्रथा है जिसका मैं निर्वाह कर रहा हूँ नहीं तो परम पूज्य गुरुवर पं० श्री कीर्त्यानन्द झा जी (न्याय प्रवक्ता का० हि० वि० वि०) के लिए भी मेरे पास कोई ऐसा शब्द हो सकेगा जिसके माध्यम से उनका आभार व्यक्त कर सकूँ ? सच्ची कृतज्ञता तो हृदय से होती हैं। मेघदूत की इस इन्दुकलाटीका में जो कुछ भी लिख सका हूँ वह सब पूज्य गुरुजी के कारण ही। अतः श्री चरण में शतकोटि प्रणाम करता हुआ आशा करता हूँ कि आगे भी इसी प्रकार आपके वात्सल्य की सुखद छाया हमें मिलती रहेगी।
अग्रज रूप पं० श्री हरेकान्त जी मिश्र का भी मैं परम आभारी हूँ जिनके सुन्दर पथ-प्रदर्शन के कारण ही मैं इस टीका को पूर्ण कर सका हूँ। सतीर्थ्य श्री बौआनन्द जी.झा एवं श्री राधारमण ठाकुर जी का भी उपकृत हूँ। अतः हृदय से आभारी हूँ। एवं जिनके वस्तुतत्त्वनिर्देशन एवं सदुत्साहवर्द्धन के कारण ही यह टीका सम्पूर्ण हो सकी और जिनके अमोघ आशीर्वाद का मैं आजीवन अभिलाषी हूँ उन पूज्य गुरुचरण पं० श्री रतिनाथ झा (रीडर का० हि० वि० वि०) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के अतिरिक्त मैं क्या निवेदन कर सकता हूँ ?
अन्त में प्रकाशक महोदय का भी आभारी हूँ जिनके सदुत्साहपूर्ण प्रेरणा के कारण ही, मैं सरस्वती की इस उपासना में लग सका हूँ। यद्यपि मेघदूत की अन्य बहुत-सी टीकाएँ उपलब्ध हैं परन्तु मैंने अपनी इस टीका में उन सब अभावों की पूर्ति का प्रयास किया है जिनका अन्य टीकाओं में अभाव रहा है या कठिनाई रही है। टीका के शब्द प्रायः सरल हैं, अतः यदि इसके माध्यम से छात्र-गण थोड़ा भी लाभान्वित हो सकेंगे तो मैं अपने परिश्रम को सफल समझूँगा। इस टीका में कतिपय अन्य टीका एवं ऐतिहासिक ग्रंथों की सहायता मुझे लेनी पड़ी है, अतः उन सब के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ।
प्रकाशन की भूल से या मेरे मतिभ्रम से यदि टीका में किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो तो—इस रीति से क्षमा करेंगे।
'गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः,
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
ग्राम—अलपुरा, पो०—रतुपाड़ (ताजपुर)
अनु०—झंझारपुर, जि०—मधुबनी (बिहार)
विनीत
—वैद्यनाथ झा